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रूस-यूक्रेन जंग से क्यों चिंतित है भारत: अधिकांश हथियार रूसी, एक पुर्जा नहीं मिला तो खिलौना बन जाएगी 'तोप'

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Fri, 11 Mar 2022 04:33 PM IST
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सार
एआईडीईएफ के महासचिव सी. श्रीकुमार ने बताया, हाल ही में भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में कई टिप्पणियां की हैं। उन्होंने स्वदेशी रक्षा उपकरणों के निर्माण एवं महत्व पर खास जोर दिया है। जिस भंवर में यूक्रेन आज फंसा है, वह यूरोपीय संघ के देशों, विशेष रूप से नाटो और निश्चित रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में अति उत्साह व अटूट विश्वास का परिणाम है...
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Russian-Ukraine war may impact on Indian defense sector, india should self dependent for futue warfare
ऑर्डिनेंस फैक्टरी बोर्ड - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

रूस-यूक्रेन युद्ध का असर भारत की रक्षा तैयारियों पर पड़ सकता है। इसके लिए भारतीय रक्षा उद्योग चिंतित है। अधिकांश युद्ध मशीनें रूसी मूल की हैं, अगर वहां से एक पुर्जा नहीं मिला तो 'तोप' और दूसरे उपकरणों के खिलौना बनने में देर नहीं लगेगी। अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ के महासचिव सी. श्रीकुमार ने कहा, यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में भारतीय सेनाध्यक्ष की टिप्पणी पर ध्यान देना सार्थक होगा। हमें स्वदेशी हथियारों के साथ भविष्य के युद्ध लड़ने की तैयारी करनी पड़ेगी। रक्षा में आत्मनिर्भरता, भारत को इस दिशा में तत्काल कदम उठाने होंगे। भविष्य के युद्ध अपनी हथियार प्रणाली से लड़े जाने चाहिए। केंद्र सरकार इसके विपरित चल रही है। आयुध कारखानों को सात निगमों में परिवर्तित कर दिया है। सरकार के फैसले के खिलाफ और वर्तमान हालात के प्रभाव को लेकर रक्षा कर्मचारी महासंघ भी एक युद्ध क्षेत्र में है। केंद्र की निजीकरण पॉलिसी के खिलाफ 28-29 मार्च को 41 आयुध कारखानों में बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन होगा। इस बाबत महासंघ द्वारा रक्षा सचिव को अवगत करा दिया गया है।

क्या नाटो ने यूक्रेन के विश्वास को तोड़ा?

एआईडीईएफ के महासचिव सी. श्रीकुमार ने बताया, हाल ही में भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में कई टिप्पणियां की हैं। उन्होंने स्वदेशी रक्षा उपकरणों के निर्माण एवं महत्व पर खास जोर दिया है। जिस भंवर में यूक्रेन आज फंसा है, वह यूरोपीय संघ के देशों, विशेष रूप से नाटो और निश्चित रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में अति उत्साह व अटूट विश्वास का परिणाम है। यूक्रेन को यह भरोसा था कि युद्ध में यूरोपीय संघ उसका बचाव करेगा। युद्ध का सामना करने की अपनी क्षमताओं का आकलन किए बिना वह रूस से टकरा गया। हालांकि, वास्तव में हम जो देखते हैं, वह एक पूरी तरह से अलग कहानी है, जो यूक्रेन को रूस द्वारा शुरू किए गए युद्ध के खिलाफ खुद को ठीक करने के लिए प्रेरित करती है। यह कहानी यूक्रेन के विश्वास को तोड़ती है कि नाटो और अमेरिका रूस के साथ युद्ध की स्थिति में उसके बचाव में आएंगे। मदद के लिए यूक्रेन द्वारा कई बार आग्रह किया गया, मगर जरूरत पर किसी ने सुध नहीं ली।

लड़ाकू क्षमताओं पर विपरित असर पड़ सकता है

बतौर श्रीकुमार, यह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आदि लाने की दलील पर डीडीपी के तहत राज्य के स्वामित्व वाले भारतीय आयुध कारखानों और अन्य इकाइयों के खिलाफ वर्तमान सरकार द्वारा शुरू किए गए निगमीकरण और निजीकरण के भारतीय संदर्भ में एक दिलचस्प अंतर्दृष्टि देता है। यूक्रेन की गाथा हमारे लिए एक अनुस्मारक है कि अपनी रक्षा तैयारियों के लिए निजीकरण, एफडीआई और विदेशी संस्थाओं के साथ सहयोग करने वाले देशों के लिए स्टॉक में क्या है। भारत के 41 आयुध कारखाने, जिन्हें अब सात निगमों में बदल दिया गया है, वे दो सौ साल से भी अधिक पुराने संगठन हैं। सरकार ने उनके विघटन का मार्ग प्रशस्त किया है। प्रत्येक भारतीय के लिए यह अत्यंत चिंता का विषय है। चूंकि भारत के पास अधिकांश युद्ध मशीनें रूसी (यूएसएसआर) मूल की हैं। रूस या पहले के रूसी संघ के देशों से बहुत आवश्यक पुर्जों की आपूर्ति में कोई भी खराबी हमारे सशस्त्र बलों की लड़ाकू क्षमताओं को गंभीर रूप से प्रभावित करेगी। अगर भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना है तो उसे रक्षा उद्योग को निगम से सरकारी क्षेत्र में वापस लाना होगा। कर्मचारियों की मांगें माननी होंगी।

जल्दबाजी में तैयार की गई थी निगमीकरण की योजना

क्या यह सरकार का अंतिम उद्देश्य था, जब उन्होंने आयुध कारखानों के सबसे अवैज्ञानिक और अतार्किक निगमीकरण की जल्दबाजी में योजना बनाई थी। श्रीकुमार कहते हैं, हमें यह भी डर है कि इस स्थिति का उपयोग देश में बेईमान तत्वों/उद्योगपतियों द्वारा बिना जिम्मेदारी के लाभ कमाने और देश को भुगतने देने के लिए किया जाएगा। सरकार के पास आधुनिकीकरण, कार्यात्मक स्वायत्तता के साथ आयुध कारखानों को सरकारी संस्थाओं के रूप में पुनर्गठित करने और डीआरडीओ द्वारा विकसित सुविधाओं व उत्पादों के साथ एकीकृत करने का समय है। अगर सरकार अभी भी यही सोच रही है कि तथाकथित निजी क्षेत्र, रक्षा उत्पादन में आधुनिक युद्ध के उपकरणों जैसे हथियारों और गोला-बारूद की आपूर्ति समय रहते कर पाएगा तो यह एक गलत धारणा है। दुनिया भर के देशों में ये धारणा कई बार साबित हुई है। सरकार से अनुरोध है कि यूक्रेन युद्ध से सबक ले। भारतीय आयुध कारखानों की मूल स्थिति यानी उन्हें सरकारी इकाई के रूप में बहाल करने के लिए गंभीरता से विचार करे। भारतीय सशस्त्र बलों की मौजूदा जरुरत इसका समर्थन करती है।

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