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भारत की डिप्लोमेसी: 'पुतिन की कॉल' और 'करजई का साथ' अफगानिस्तान को लेकर बहुत मजबूत है ये कूटनीतिक रिश्ता

Wed, 25 Aug 2021 05:14 PM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Wed, 25 Aug 2021 05:14 PM IST
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सार
एशियाई मामलों के जानकार प्रोफेसर आर कुमार कहते हैं कि अफगानिस्तान में बदली सत्ता के साथ भारत के रिश्तों की मजबूत डोर रूस और करजई के माध्यम से मजबूत हो सकती है। क्योंकि दोनों का रुख भारत के लिए बहुत ही सॉफ्ट है और दोनों का दखल अफगानिस्तान के तालिबान में भी है...
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Russia and former afghanistan president Hamid karzai both in contact with taliban, could be benefited for india in Diplomacy
प्रधानमंत्री मोदी और अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई - फोटो : PTI (File Photo)

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की हुई बातचीत अफगानिस्तान के साथ नए रिश्तों की गर्माहट लेकर सामने आ रही है। सिर्फ पुतिन और मोदी की बातचीत ही नहीं बल्कि भारत के बहुत अच्छे दोस्त रहे हामिद करजई का तालिबान के साथ बातचीत करना भी भारत और अफगानिस्तान के नए रिश्ते की नींव में मजबूती डाल सकता है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि मोदी और पुतिन की बातचीत के साथ-साथ करजई के भारतीय रिश्ते अफगानिस्तान में बदले सत्ता परिवर्तन के बाद भी बहुत कुछ नया और पॉजिटिव देखने का अनुमान लगा सकते हैं।



एशियाई मामलों के जानकार प्रोफेसर आर कुमार कहते हैं कि अफगानिस्तान में बदली सत्ता के साथ भारत के रिश्तों की मजबूत डोर रूस और करजई के माध्यम से मजबूत हो सकती है। क्योंकि दोनों का रुख भारत के लिए बहुत ही सॉफ्ट है और दोनों का दखल अफगानिस्तान के तालिबान में भी है। हालांकि उनका कहना है कि भारत का रुख तालिबान को लेकर क्या है यह दिल्ली को तय करना है। प्रोफेसर कुमार का कहना है कि भारत के पास अभी अफगानिस्तान के साथ रिश्तों को चलाने के लिए बहुत मजबूत कड़ियां मौजूद हैं। इसके पीछे तर्क देते हुए प्रोफेसर कुमार कहते हैं कि भारत को लेकर रूस हमेशा से एक सॉफ्ट कॉर्नर रखता रहा है। हालांकि यह बात अलग है कि बीते कुछ दशकों में भारत की अमेरिका से बढ़ी नजदीकियां जरूर रूस को बीच-बीच में अखरती रही हैं। लेकिन दोनों देशों ने समझदारी दिखाते हुए अपने कूटनीतिक रिश्तों में कभी कोई दरार नहीं आने दी। वे कहते हैं कि मंगलवार को पीएम मोदी और पुतिन के बीच हुई टेलीफोन की बातचीत में अफगानिस्तान को लेकर हुई बातचीत इसी तरफ इशारा कर रही है कि अफगानिस्तान और भारत के रिश्तों की गर्माहट बनी रह सकती है।

भारत का पड़ोसी मुल्क अफगानिस्तान है। प्रोफेसर कुमार कहते हैं कि अगर कूटनीतिक नजरिये से देखा जाए तो भारत को अपने रिश्ते अफगानिस्तान से बेहतर ही रखने चाहिए। क्योंकि ऐसा करके वो पाकिस्तान और चीन पर बराबर अपनी नजर भी रख सकेगा। इसके अलावा वह पश्चिमी एशिया में भी अपना दखल बनाये रख सकेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि अफगानिस्तान में काबिज हुई तालिबानियों की सत्ता को लेकर भारत को अपनी रणनीति बदलनी चाहिए। क्योंकि रूस, चीन और पाकिस्तान तो लगातार तालिबानियों से न सिर्फ संपर्क में हैं बल्कि उन्हें भरोसा भी दिला रहा है कि दुनिया के प्लेटफॉर्म पर वह उसकी बदली हुई छवि को लेकर वकालत भी करेगा। बस शर्त तालिबानियों के साथ एक यही रखी है कि उन्हें अपना पुराना रुख नहीं अपनाना होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे में भारत को भी अफगानिस्तान की नई सत्ता के साथ राजनीतिक और सामरिक नजरिए से रिश्तों को देखना चाहिए। क्योंकि पूरी दुनिया के देश अगर तालिबान को कुछ वक्त परखने के बाद अफगानिस्तान से सामंजस्य स्थापित करते हैं तो भारत को भी ऐसा करने में एक देश के नाते कोई गुरेज नहीं करना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है जिस तरीके से अफगानिस्तान में तख्तापलट कर काबिज हुए तालिबान ने दुनिया के देशों से संपर्क स्थापित करना शुरू किया है उससे रुकों और देखो नीति का पालन करने में कोई बुराई नहीं है।

विदेश मामलों के जानकार कहते हैं कि जिस तरह रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बातचीत की और उसमें पड़ोसी मुल्क अफगानिस्तान का जिक्र किया। उससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि आने वाले दिनों में अफगानिस्तान की वकालत करने वाले बहुत से मुल्क अपने बेहतर संबंध वाले देशों के साथ बातचीत के दरवाजे न सिर्फ खोलेंगे बल्कि उसे आगे भी बढाएंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना का होना और भारत की अमेरिका से नजदीकी भी होना सैन्य दृष्टिकोण के लिहाज से दोनों के लिए बहुत फायदेमंद भी था। विदेशी मामलों के जानकार कहते हैं क्योंकि अब अमेरिकी सेना अफगानिस्तान में नहीं है, इसका फायदा पाकिस्तान और चीन उठाने की तैयारी में हैं।

ऐसे में बेहतर है कि भारत और अफगानिस्तान की सत्ता में अगर बातचीत का सिलसिला बढ़ता है तो यह भारत के लिहाज से कहीं से भी नुकसानदायक नहीं होगा। विशेषज्ञों का कहना है भारत और अफगानिस्तान में बातचीत का सिलसिला बढ़ाने के लिए पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई भी एक विशेष कड़ी के तौर पर सामने आ सकते हैं। करजई हमेशा से भारत के हितैषी रहे और जरूरत पड़ने पर वह भारत और पाकिस्तान की तुलना में भारत का ही साथ देंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि संभव है अफगानिस्तान की तालिबानी सत्ता आने वाले दिनों मे भारत समेत कई अन्य विकासशील देशों से बातचीत के लिए खुद आगे कदम बढ़ाए।

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