राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कोई विचारक नहीं, पूरी तरह से जानने का दावा करना गलत : मोहन भागवत
- संघ का कोई विचारक नहीं, शब्द का इस्तेमाल गलत
- कोई संघ को पूरी तरह समझने का दावा नहीं कर सकता
- हिंदू और हिंदू राष्ट्र को छोड़कर सब बदल सकता है
- संघ में विचार जैसा कुछ नहीं, सब अनुभव से आई दृष्टि है
विस्तार
आइडियोलॉग जैसी कोई चीज नहीं
सर संघचालक मोहन राव भागवत ने अपनी यह राय प्रचारक सुनील आंबेकर की लिखी पुस्तक 'द आरएसएस: रोडमैप्स फॉर द 21 सेंचुरी' के लोकार्पण पर कही। उन्होंने साफ कहा कि संघ में आइडियोलॉग जैसी कोई चीज नहीं होती। हालांकि भागवत ने कहा कि किताब ने संघ के बारे में लोगों की समझ बढ़ाने के लिए आरएसएस को काफी सहूलियत दी है। यह एक अच्छी पुस्तक है, लेकिन इस पुस्तक के बारे में भी स्वयंसेवक अपनी राय रखने के लिए स्वतंत्र हैं।
विदेशी भाषा (अंग्रेजी) में संघ के विचार रखना कठिन
सर संघचालक ने कहा कि संघ की नितांत राष्ट्रीयता के कारण इसके तमाम अवयवों को किसी भी विदेशी भाषा में व्यक्त करना कठिन है। इसे किसी विदेशी भाषा में समझाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि विचारों का किला बनाकर संघ को उसके भीतर बंद भी नहीं किया जा सकता। इसलिए देश, काल, परिस्थिति के माध्यम से संघ में बातें बदलती रहती हैं। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र है, इसको छोड़कर बाकी सब बदल सकता है, क्योंकि संघ को हिंदू और हिंदू राष्ट्र ही विरासत में मिला है।
संघ का मकसद व्यक्ति का निर्माण करना
सर संघ चालक मोहन राव भागवत ने कहा कि संघ का मतलब संघ के संस्थापक, पहले सर संघचालक डा. केशव बलिराम हेडगेवार का जीवन है। सर संघचालक ने कहा कि जो हैं वह हमारे हैं। लोगों की विभिन्नता में एकता ही संघ के साथ नितांत राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद ही संघ की अवधारणा है। उन्होंने संघ के उद्देश्य के बारे में बताते हुए कहा कि संघ का मकसद व्यक्ति का निर्माण करना है। व्यक्ति को बदलने का काम संघ करता है। पूरे समाज को गुणवान बनाना ही संघ का लक्ष्य है।
उन्होंने सर संघचालक के बारे में कहा कि सर संघचालक वही बोलते हैं, जो स्वयंसेवकों के मन की बात होती है। संघ में सहमति सबसे महत्वपूर्ण है और सभी स्वयंसेवक सोचने, समझने, विचार करने, विचार व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र हैं।