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RSS: 'भाईचारा ही हमारी परंपरा, झगड़ा करना हमारे स्वभाव में नहीं', संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान
Sat, 29 Nov 2025 01:03 PM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नागपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नागपुर
Published by: नितिन गौतम
Updated Sat, 29 Nov 2025 01:03 PM IST
सार
संघ प्रमुख ने कहा, 'हमारी किसी के साथ बहस नहीं होती। हम विवादों से दूर रहते हैं। झगड़ा करना हमारे देश का स्वभाव ही नहीं है। मिल-जुलकर रहना और भाईचारे को बढ़ावा देना ही हमारी परंपरा रहा है।'
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संघ प्रमुख मोहन भागवत
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि झगड़ा या विवाद करना हमारे देश का स्वभाव नहीं है और भाईचारा और सामूहिक सद्भाव हमेशा से भारत की परंपरा रहा है। नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने ये बात कही। उन्होंने कहा कि भारत का राष्ट्रवाद का विचार बुनियादी तौर पर पश्चिमी विचार से अलग है।
'झगड़ा करना हमारे देश का स्वभाव नहीं'
संघ प्रमुख ने कहा 'हमारी किसी के साथ बहस नहीं होती। हम विवादों से दूर रहते हैं। झगड़ा करना हमारे देश का स्वभाव ही नहीं है। मिल-जुलकर रहना और भाईचारे को बढ़ावा देना ही हमारी परंपरा रहा है।' भागवत ने कहा कि 'दुनिया के अन्य हिस्से संघर्षों से भरे हालात में बने। वहां जब एक राय बन जाती है तो उसके अलावा हर विचार को अस्वीकार कर दिया जाता है। वे दूसरे के विचारों के लिए दरवाजे बंद कर देते हैं और इसे '...इज्म' कहना शुरू कर देते हैं।'
मोहन भागवत ने कहा कि भारत का राष्ट्रवाद का विचार बुनियादी तौर पर पश्चिमी व्याख्या से अलग है। उन्होंने कहा 'वे (पश्चिमी देश) राष्ट्र को लेकर हमारे विचारों को नहीं समझते। इसलिए उन्होंने इसे राष्ट्रवाद कहना शुरू कर दिया, लेकिन हमारा राष्ट्र का विचार पश्चिम के विचार से अलग है। ये एक देश है या नहीं... हमारे बीच इसे लेकर कोई मतभेद नहीं हैं। हम मानते हैं कि ये एक राष्ट्र है, जो प्राचीन समय से मौजूद है।' भागवत ने कहा, 'हम राष्ट्रीयता शब्द का इस्तेमाल करते हैं, राष्ट्रवाद का नहीं। देश को लेकर बहुत ज्यादा गर्व दो विश्वयुद्ध करा चुका है, इसलिए कुछ लोग राष्ट्रवाद शब्द से डरते हैं। भारत का राष्ट्रीयता का बोध गर्व और अहंकार से नहीं निकला बल्कि गहन आत्मचिंतन और प्रकृति के साथ सहअस्तित्व से निकला है।'
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गांधी का विचार औपनिवेशिक शिक्षा की देन: भागवत
मोहन भागवत ने कहा कि महात्मा गांधी का यह मानना कि ब्रिटिश शासन से पहले भारतीयों में एकता का अभाव था, दरअसल औपनिवेशिक शिक्षाओं से गढ़ा गया एक मिथ्या आख्यान था। असल में एकजुट रहना और भाईचारे को बढ़ावा देना भारत की परंपरा में निहित है। भागवत ने कहा, गांधीजी ने (अपनी पुस्तक) हिंद स्वराज में लिखा है कि अंग्रेजों के आने से पहले हम एकजुट नहीं थे, लेकिन यह उनकी ओर से हमें सिखाया गया एक मिथ्या आख्यान है। गांधीजी ने 1908 में गुजराती में हिंद स्वराज लिखी थी और 1909 में उनकी ओर से इसे अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। हिंद स्वराज में 20 अध्याय हैं और यह एक पत्रिका/समाचार पत्र के पाठक और संपादक के बीच संवाद के रूप में लिखा गया है। भागवत ने कहा कि भारत की राष्ट्र की अवधारणा प्राचीन, जैविक है। भारत की परंपरा भाईचारे में निहित है। विवाद हमारे स्वभाव में नहीं आता। देश की परंपरा ने भाईचारे एवं सामूहिक सद्भाव पर हमेशा जोर दिया है।
ये भी पढ़ें- Interview: 'आतंकवाद का धर्म से कोई संबंध नहीं, यह भ्रम अब टूटा', दिल्ली धमाकों पर राम माधव का बड़ा बयान
'भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की जरूरत नहीं'
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में गुवाहाटी में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि जो भारत पर गर्व करता है, वह हिंदू है। भागवत ने हिंदू को सिर्फ एक धार्मिक नहीं बल्कि सभ्यतागत पहचान बताया। उन्होंने कहा कि भारत और हिंदू एक ही हैं। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि 'भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की कोई जरूरत नहीं है, इसकी सभ्यता पहले से ही इसे जाहिर करती है। हिंदू सिर्फ धार्मिक शब्द नहीं बल्कि एक सभ्यतागत पहचान है, जो हजारों साल की सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि 'भारत और हिंदू पर्यायवाची हैं। भारत को हिंदू राष्ट्र होने के लिए किसी आधिकारिक घोषणा की जरूरत नहीं है।'
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'झगड़ा करना हमारे देश का स्वभाव नहीं'
संघ प्रमुख ने कहा 'हमारी किसी के साथ बहस नहीं होती। हम विवादों से दूर रहते हैं। झगड़ा करना हमारे देश का स्वभाव ही नहीं है। मिल-जुलकर रहना और भाईचारे को बढ़ावा देना ही हमारी परंपरा रहा है।' भागवत ने कहा कि 'दुनिया के अन्य हिस्से संघर्षों से भरे हालात में बने। वहां जब एक राय बन जाती है तो उसके अलावा हर विचार को अस्वीकार कर दिया जाता है। वे दूसरे के विचारों के लिए दरवाजे बंद कर देते हैं और इसे '...इज्म' कहना शुरू कर देते हैं।'
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मोहन भागवत ने कहा कि भारत का राष्ट्रवाद का विचार बुनियादी तौर पर पश्चिमी व्याख्या से अलग है। उन्होंने कहा 'वे (पश्चिमी देश) राष्ट्र को लेकर हमारे विचारों को नहीं समझते। इसलिए उन्होंने इसे राष्ट्रवाद कहना शुरू कर दिया, लेकिन हमारा राष्ट्र का विचार पश्चिम के विचार से अलग है। ये एक देश है या नहीं... हमारे बीच इसे लेकर कोई मतभेद नहीं हैं। हम मानते हैं कि ये एक राष्ट्र है, जो प्राचीन समय से मौजूद है।' भागवत ने कहा, 'हम राष्ट्रीयता शब्द का इस्तेमाल करते हैं, राष्ट्रवाद का नहीं। देश को लेकर बहुत ज्यादा गर्व दो विश्वयुद्ध करा चुका है, इसलिए कुछ लोग राष्ट्रवाद शब्द से डरते हैं। भारत का राष्ट्रीयता का बोध गर्व और अहंकार से नहीं निकला बल्कि गहन आत्मचिंतन और प्रकृति के साथ सहअस्तित्व से निकला है।'
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गांधी का विचार औपनिवेशिक शिक्षा की देन: भागवत
मोहन भागवत ने कहा कि महात्मा गांधी का यह मानना कि ब्रिटिश शासन से पहले भारतीयों में एकता का अभाव था, दरअसल औपनिवेशिक शिक्षाओं से गढ़ा गया एक मिथ्या आख्यान था। असल में एकजुट रहना और भाईचारे को बढ़ावा देना भारत की परंपरा में निहित है। भागवत ने कहा, गांधीजी ने (अपनी पुस्तक) हिंद स्वराज में लिखा है कि अंग्रेजों के आने से पहले हम एकजुट नहीं थे, लेकिन यह उनकी ओर से हमें सिखाया गया एक मिथ्या आख्यान है। गांधीजी ने 1908 में गुजराती में हिंद स्वराज लिखी थी और 1909 में उनकी ओर से इसे अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। हिंद स्वराज में 20 अध्याय हैं और यह एक पत्रिका/समाचार पत्र के पाठक और संपादक के बीच संवाद के रूप में लिखा गया है। भागवत ने कहा कि भारत की राष्ट्र की अवधारणा प्राचीन, जैविक है। भारत की परंपरा भाईचारे में निहित है। विवाद हमारे स्वभाव में नहीं आता। देश की परंपरा ने भाईचारे एवं सामूहिक सद्भाव पर हमेशा जोर दिया है।
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'भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की जरूरत नहीं'
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में गुवाहाटी में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि जो भारत पर गर्व करता है, वह हिंदू है। भागवत ने हिंदू को सिर्फ एक धार्मिक नहीं बल्कि सभ्यतागत पहचान बताया। उन्होंने कहा कि भारत और हिंदू एक ही हैं। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि 'भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की कोई जरूरत नहीं है, इसकी सभ्यता पहले से ही इसे जाहिर करती है। हिंदू सिर्फ धार्मिक शब्द नहीं बल्कि एक सभ्यतागत पहचान है, जो हजारों साल की सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि 'भारत और हिंदू पर्यायवाची हैं। भारत को हिंदू राष्ट्र होने के लिए किसी आधिकारिक घोषणा की जरूरत नहीं है।'