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Politics: आरपीएन सिंह के सीने में चुभते कांटों का क्या कांग्रेस कभी दे पाएगी जवाब?

Tue, 25 Jan 2022 09:50 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Tue, 25 Jan 2022 09:50 PM IST
सार

कांग्रेस के नेता और झारखंड में पार्टी के प्रभारी की जिम्मेदारी संभाल रहे आरपीएन सिंह मंगलवार को कांग्रेस से नाता तोड़ भाजपा के खेमे में शामिल हो गए।

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RPN Singh resignation raises questions over situation in congress news in Hindi
आरपीएन सिंह - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले और पडरौना के कुर्मी राजपरिवार से ताल्लुक रखने वाले आरपीएन सिंह भी भाजपाई हो गए हैं। लंबी गाड़ी और राजशाही अंदाज में सिगरेट पीने के शौकीन आरपीएन ने आखिर कांग्रेस क्यों छोड़ी? उनके पास तो झारखंड का प्रभार था और झारखंड में कांग्रेस-झामुमो गठबंधन वाली सरकार है। अमर उजाला से बातचीत के दौरान कांग्रेस के कुछ नए और कुछ पार्टी छोड़ चुके नेताओं ने आरपीएन का दर्द बताया। दो नेता ऐसे भी हैं, जिनसे आरपीएन की पिछले काफी समय से पार्टी की दशा और दिशा को लेकर बात भी होती थी।

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आरपीएन का दर्द और चिंता
आरपीएन सिंह की पहली और बड़ी चिंता उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को फिर से खड़ा करने की रही थी। लेकिन उन्हें लगने लगा कि अगले 20 सालों में इसकी कोई संभावना नहीं है। वह दो बार लोकसभा और एक बार समाजवादी पार्टी से गठबंधन के बाद भी विधानसभा का चुनाव हार चुके थे। आरपीएन के करीबी सूत्र के मुताबिक उन्हें भाजपा में लाने के लिए भाजपा के कुछ नेता तीन-चार महीने से सक्रिय थे, लेकिन आरपीएन को कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी से काफी उम्मीदें थीं।

बताते हैं कि राज्य विधानसभा चुनाव 2022 की अधिसूचना जारी होने और कांग्रेस की राज्य में चाल देखने के बाद आरपीएन ने आखिरी समय में पार्टी छोड़ने का मन बनाया। कांग्रेस छोड़ चुकी एक नेता ने बताया कि झारखंड में पार्टी को सफलता दिलाने के बाद आरपीएन सिंह को कुछ उम्मीदें थीं। उन्हें लग रहा था कि राज्य के प्रभारी से उन्हें प्रमोशन देकर पार्टी महासचिव बना दिया जाएगा। सूत्र का कहना है कि उन्हें दूसरी ठेस अजय कुमार को पार्टी में लाने के बाद पहुंची।

उन्होंने खुद एक कांग्रेस के नेता को बताया कि वह प्रभारी थे। उन्हें तकलीफ है कि अजय कुमार की कांग्रेस में वापसी से पहले उनकी कोई राय ही नहीं ली गई। कहीं न कहीं परोक्ष रूप से उनकी यह नाराजगी राहुल गांधी की कार्यशैली को लेकर थी। आरपीएन को तीसरा झटका तब लगा जब झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की राहुल गांधी से चर्चा हुई। इस चर्चा के बाद राहुल गांधी के कार्यालय ने सलाह दी कि हेमंत सोरेन उनके कार्यालय के संपर्क में रहें। इस तरह से आरपीएन सिंह पार्टी प्रभारी होते हुए भी साइड लाइन हो गए।

बताते हैं इस दर्द और चिंता ने आरपीएन सिंह के भविष्य की राह तय कर दी। इसमें भाजपा के ही एक लोकसभा सांसद ने अहम भूमिका निभाई।

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आरपीएन के दर्द पर क्या कहते हैं कांग्रेस नेता
आरपीएन सिंह के कांग्रेस छोड़ने के सवाल पर कांग्रेस के प्रवक्ता गौरव बल्लभ पंत ने पार्टी के फोरम से अपनी प्रतिक्रिया दे दी है। पार्टी महासचिव (संगठन) केसी वेणु गोपाल ने पार्टी अध्यक्ष के निर्देश पर आरपीएन सिंह के स्थान पर झारखंड का प्रभार पार्टी महासचिव अविनाश पांडे को सौंपने का पत्र जारी कर दिया है। लेकिन 24 अकबर रोड का माहौल आज थोड़ा गरम था। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि अपनी सुविधानुसार कोई भी नेता कांग्रेस छोड़ सकता है। उसे आखिर पार्टी में रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

पार्टी के एक पूर्व महासचिव का कहना है कि वह 10 साल पहले यूपी में काफी सक्रिय थे। उन्हें पता है कि यूपी में तब भी पार्टी को मजबूती देने के लिए आरपीएन सिंह कुछ नहीं करते थे और बाद में भी कुछ नहीं किया। सूत्र का कहना है कि यह उनकी जानकारी में है कि पिछड़े वर्ग से आने के कारण भी आरपीएन सिंह को यूपी में बड़ी जिम्मेदारी देने का प्रस्ताव किया गया था। यह प्रस्ताव जितिन प्रसाद के पास भी भेजा गया था। दोनों नेताओं ने जिम्मेदारी निभाने से मना करते हुए इसमें हमेशा अरुचि दिखाई।

पार्टी के भीतर आरपीएन सिंह के ही एक दरबारी नेता का कहना है कि राजनीति में सबकुछ होता है। आरपीएन सिंह ने झारखंड में कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा की सत्ता में वापसी के लिए बहुत अच्छा काम किया। हालांकि वह बाद में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के पास अपना भरोसा खो बैठे थे।

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...लेकिन इस सवाल का कांग्रेस नेताओं के पास कोई जवाब नहीं  
आरपीएन सिंह, सुष्मिता देव सरीखे तमाम कांग्रेस छोड़ने वाले नेता अलवर के कांग्रेसी नेता जितेंद्र सिंह को मिलने वाली तवज्जो से खासे नाराज हैं। कांग्रेस के कई नेता जितेंद्र सिंह की भूमिका पर भी सवाल उठाते हैं। जितेन्द्र सिंह पार्टी के नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से करीबी रखते हैं। राहुल गांधी की पहल पर असम के प्रभारी बनाए गए। राहुल गांधी ने जितेंद्र सिंह पर काफी भरोसा किया और कांग्रेस असम का चुनाव हार गई।

कांग्रेस के कई युवा नेताओं का कहना है कि जितेंद्र सिंह कई राज्यों में असफल रहे। कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति को संभाल नहीं पाए, खराब किया। लेकिन पार्टी के भीतर उनके रुतबे में कभी कोई कमी नहीं आई। कांग्रेस के गुजरात के एक नेता कहते हैं कि राजनीति में सब ठीक चल रहा है तो इसका मतलब है कि आपके सलाहकार और कोटरी दुरुस्त है। बस इतने से ही समझ लीजिए कि कांग्रेस की मौजूदा समस्या आखिर क्या है।

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