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Nitish kumar: नीतीश के ‘एक सीट-एक उम्मीदवार’ फॉर्मूले की राह आसान नहीं, कई राज्यों में विपक्ष ही आमने-सामने
Fri, 14 Apr 2023 06:06 AM IST
Jeet Kumar
हिमांशु मिश्र, नई दिल्ली।
हिमांशु मिश्र, नई दिल्ली।
Published by: Jeet Kumar
Updated Fri, 14 Apr 2023 06:06 AM IST
सार
एक सीट-एक उम्मीदवार का फॉर्मूला उन राज्यों में तो चल सकता है, जहां भाजपा के खिलाफ एक ही विपक्षी दल मुख्य प्रतिद्वंद्वी है।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : Social Media
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विस्तार
आगामी लोकसभा चुनाव में विपक्ष साल 1977 और 1989 की तर्ज पर कांग्रेस की जगह इस बार भाजपा के खिलाफ एक होना चाहता है। बुधवार को बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने भाजपा के खिलाफ एक सीट-एक उम्मीदवार (ओएसओसी) का फॉर्मूला दिया है। हालांकि, कई राज्यों में भाजपा के इतर विपक्ष के ही आमने-सामने होने, कुछ क्षेत्रीय दलों का दूसरे राज्यों में हुए उभार और क्षत्रपों की बड़ी महत्वाकांक्षा के कारण इस फॉर्मूले को जमीन पर उतारना आसान नहीं है।
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एक सीट-एक उम्मीदवार का फॉर्मूला उन राज्यों में तो चल सकता है, जहां भाजपा के खिलाफ एक ही विपक्षी दल मुख्य प्रतिद्वंद्वी है। हालांकि, जिन राज्यों में भाजपा के इतर एक से अधिक विपक्षी दलों का प्रभाव है और जहां भाजपा के इतर विपक्षी दल ही एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं, वहां इस फॉर्मूले को लागू करना बेहद दुश्कर है।
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इन राज्यों में आसानी
महज कांग्रेस या किसी एक विपक्षी दल के प्रभाव वाले राज्यों में इसे लागू करना आसान होगा। मसलन, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड में कांग्रेस भाजपा की इकलौती प्रतिद्वंद्वी है। इसी प्रकार तमिलनाडु, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड, असम और कमोबेश उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस के इन राज्यों में मुख्य रूप से प्रभावी दलों के साथ बेहतर सहमति है। ऐसे में इन राज्यों में बात बन सकती है।
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यहां समझौता मुश्किल
केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में इस फॉर्मूले को लागू करना बेहद मुश्किल होगा। केरल में वाम दलों की मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस है। तेलंगाना में बीआरएस और कांग्रेस, पंजाब में आप और कांग्रेस ही प्रतिद्वंद्वी है।
इसके अलावा कर्नाटक में कांग्रेस के अतिरिक्त जदएस, आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के अतिरिक्त टीडीपी भी प्रभावी है। जम्मू-कश्मीर में एनसीपी-पीडीपी एक-दूसरे के कट्टर प्रतिद्वंद्वी हैं। हरियाणा में कांग्रेस के इतर इनेलो और आप जैसे दल प्रभावी हैं। यहां एक सीट पर एक उम्मीदवार तय करना दुश्कर है।
आप का बढ़ता प्रभाव भी चुनौती
आप को हाल ही में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला है। पंजाब में सरकार बनाने के साथ गुजरात में प्रभाव बढ़ा है। सवाल है कि पंजाब और दिल्ली में यह फॉर्मूला कैसे लागू होगा? क्या इन राज्यों में आप और कांग्रेस एक-दूसरे के लिए दिल बड़ा करेंगे? कांग्रेस गुजरात और हरियाणा में आप के साथ सीटों का समझौता कैसे करेगी?
आसान नहीं ममता को साधना
दिल्ली के सीएम की तरह पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी बेहद बड़ी है। तृणमूल भी कांग्रेस के प्रभाव वाले राज्यों में अपना विस्तार करने में जुटी है। ऐसे में सवाल है कि क्या ममता बंगाल में कांग्रेस को सीटें देने के लिए राजी होंगी और क्या कांग्रेस ममता के लिए दिल बड़ा कर सकेगी। यही स्थिति केसीआर और नवीन पटनायक के साथ है।