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जानें, केरल के मंदिर की प्रथा 'चूरल मूरियल' का खूनी सच
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Thu, 22 Feb 2018 11:00 AM IST
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चूरल मूरियल प्रथा के लिए 22 फरवरी को 'बलि' के लिए चुने गए दो बच्चे
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पर्यटकों से गुलजार रहने वाले केरल के एलेप्पी शहर में हर साल कुठियट्टम नाम की एक परंपरा निभाई जाती है, जिसमें सांकेतिक तौर पर इंसान की बलि दी जाती है। 'चूरल मूरियल' इस परंपरा का एक हिस्सा है और इस पर पाबंदी लगाने की हजारों लोग मांग कर चुके हैं।
क्या है चूरल मूरियल?
चूरल मूरियल कुठियट्टम नामक धार्मिक अनुष्ठान का एक हिस्सा है जिसके तहत आठ से 12 साल की उम्र के एक या दो गरीब लड़कों को खरीदा जाता है। जिसके बाद उनकी पसलियों को छेदकर उसमें सोने और चांदी के धागे या बांस की डंडी डाली जाती है। यह बलिदान चेट्टिकुलंगरा मंदिर में भगवान को प्रसन्न करने के लिए दिया जाता है। आपको इस बलिदान के पीछे की चाहतों के बारे में जानकर हैरत होगी। जिसमें इंजीनियरिंग में दाखिला होने से लेकर शादीशुदा लोगों के माता-पिता बनने की चाहत और नौकरी पाने की इच्छा तक शामिल होती है।
शुरुआत में यह बच्चे उन भक्तों के होते थे जो अपनी मुराद लेकर भगवान के दर पर जाते थे। लेकिन हर चीज की तरह, यह रस्म भी उन वंचित माता-पिता और रिश्तेदारों के बच्चों को आउटसोर्स कर दी गई जो तत्काल कुछ पैसा कमाना चाहते थे।
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चेट्टिकुलंगरा मंदिर उन प्रमुख मंदिरों में शामिल है जहां ढाई सौ साल पुरानी यह परंपरा अब भी निभाई जाती है। इसके शुरू होने के पीछे कई कहानियां हैं। इनमें सबसे मशहूर उस राजा की कहानी है जो देवी भद्रकाली को प्रसन्न करना चाहते थे। राजा की प्रार्थना से प्रसन्न होकर भद्रकाली ने राजा को वरदान दिया। राजा ने अपनी प्रजा की खुशहाली मांगी। किंवदंतियों के मुताबिक देवी ने राजा से कहा कि वह एक योग्य लड़के को खोजे, उसे पढ़ाए-लिखाए और जब वह 10 साल का हो जाए तो उसकी बलि चढ़ा दे।
चूरल मूरियल का खूनी सच
कुम्भम महीने में एक खास दिन पर, मालिक इन लड़कों की पसलियों को छेदते हैं और सोने या चांदी के तार या बांस की डंडी उन छेदों के जरिये पार करते हैं। इसके बाद इन बच्चों को हाथ उपर कर मंदिर तक नाचते हुए जाने को कहा जाता है, ताकि वे उन तारों को अपने हाथों से छू ना सकें। यह सब कुछ एक पूरे जलसे के रूप में होता है जिसमें बहुत से लोग, पारंपरिक संगीत और वाद्य यंत्र होते हैं।
इन बच्चों को मंदिर पहुंचने में घंटों का समय लगता है। उनके आसपास के लोग उनके रिसते घावों पर नारियल पानी डालते हैं, हाथों से हवा करते हैं। लेकिन इन बच्चों की चीखें और आंसू नहीं रुकते। मंदिर पहुंचने पर इन धागों को खींचकर निकाला जाता है और मंदिर में चढ़ाया जाता है। जिससे यह प्रतीत होता है कि मूर्ति के समक्ष उनका बलिदान दे दिया गया है और बलि पूरी मान ली जाती है।
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क्या है चूरल मूरियल?
चूरल मूरियल कुठियट्टम नामक धार्मिक अनुष्ठान का एक हिस्सा है जिसके तहत आठ से 12 साल की उम्र के एक या दो गरीब लड़कों को खरीदा जाता है। जिसके बाद उनकी पसलियों को छेदकर उसमें सोने और चांदी के धागे या बांस की डंडी डाली जाती है। यह बलिदान चेट्टिकुलंगरा मंदिर में भगवान को प्रसन्न करने के लिए दिया जाता है। आपको इस बलिदान के पीछे की चाहतों के बारे में जानकर हैरत होगी। जिसमें इंजीनियरिंग में दाखिला होने से लेकर शादीशुदा लोगों के माता-पिता बनने की चाहत और नौकरी पाने की इच्छा तक शामिल होती है।
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शुरुआत में यह बच्चे उन भक्तों के होते थे जो अपनी मुराद लेकर भगवान के दर पर जाते थे। लेकिन हर चीज की तरह, यह रस्म भी उन वंचित माता-पिता और रिश्तेदारों के बच्चों को आउटसोर्स कर दी गई जो तत्काल कुछ पैसा कमाना चाहते थे।
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चेट्टिकुलंगरा मंदिर उन प्रमुख मंदिरों में शामिल है जहां ढाई सौ साल पुरानी यह परंपरा अब भी निभाई जाती है। इसके शुरू होने के पीछे कई कहानियां हैं। इनमें सबसे मशहूर उस राजा की कहानी है जो देवी भद्रकाली को प्रसन्न करना चाहते थे। राजा की प्रार्थना से प्रसन्न होकर भद्रकाली ने राजा को वरदान दिया। राजा ने अपनी प्रजा की खुशहाली मांगी। किंवदंतियों के मुताबिक देवी ने राजा से कहा कि वह एक योग्य लड़के को खोजे, उसे पढ़ाए-लिखाए और जब वह 10 साल का हो जाए तो उसकी बलि चढ़ा दे।
चूरल मूरियल का खूनी सच
कुम्भम महीने में एक खास दिन पर, मालिक इन लड़कों की पसलियों को छेदते हैं और सोने या चांदी के तार या बांस की डंडी उन छेदों के जरिये पार करते हैं। इसके बाद इन बच्चों को हाथ उपर कर मंदिर तक नाचते हुए जाने को कहा जाता है, ताकि वे उन तारों को अपने हाथों से छू ना सकें। यह सब कुछ एक पूरे जलसे के रूप में होता है जिसमें बहुत से लोग, पारंपरिक संगीत और वाद्य यंत्र होते हैं।
इन बच्चों को मंदिर पहुंचने में घंटों का समय लगता है। उनके आसपास के लोग उनके रिसते घावों पर नारियल पानी डालते हैं, हाथों से हवा करते हैं। लेकिन इन बच्चों की चीखें और आंसू नहीं रुकते। मंदिर पहुंचने पर इन धागों को खींचकर निकाला जाता है और मंदिर में चढ़ाया जाता है। जिससे यह प्रतीत होता है कि मूर्ति के समक्ष उनका बलिदान दे दिया गया है और बलि पूरी मान ली जाती है।
कौन हैं वो जो 'बलि' के बच्चों को खरीदते हैं?
चूरल मूरियल प्रथा में पसली को छेद कर डाला गया सोना या चांदी का धागा
पारंपरिक तौर पर इस प्रथा में शामिल बच्चे उन्हीं भक्त के होने चाहिए (जो बलि देना चाहते हैं)। लेकिन हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां सभी चीजों के लिए पैसों अदा किए जा सकते हैं - यहां तक कि मासूम बच्चों पर जुल्म ढाने और उन्हें जीवन भर तक डरा देने के लिए भी। इस तरह वो अमीर जो इंसानों की बलि चढ़ाना चाहते हैं वे वंचित तबकों के बच्चों को इस अनुष्ठान के लिए महज 50 हजार रुपये तक में 'खरीद' लेते हैं।
कौन हैं यह भगवान जो, सोने की पलंग में सोने वालों को आशीर्वाद देने के लिए, उन लोगों के मांस और रक्त को स्वीकार करते हैं जिनके पास न तो जेब में पैसा है और न तन ढकने को कपड़ा?
साल 2016 दिसंबर में इस खबर को पहली बार दुनिया के सामने लाने वाले टी सुधीश कहते हैं, "'बलिदान' दे दिए गए इन बच्चों को मृत मान लिया जाता है। उन्हें स्कूलों और कॉलेजों में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। साथी ही उन्हें अपशगुन समझा जाता है। इन बच्चों के माता-पिता को तकलीफ होती है, लेकिन इनमें से ज्यादातर यह स्वीकार नहीं करते कि अपने बच्चों की इस दुर्दशा के बदले वे पैसे लेते हैं।"
आठ या नौ या 12 साल की उम्र में आप भगवान के बारे में क्या जानते थे? यह बच्चे शारीरिक और भावनात्मक आघात से गुजरते हैं और उनका नाबालिग मन इनके मायने नहीं समझ पाता। वे शायद एक ऐसे भगवान पर विश्वास करते हुए बड़े होते होंगे जो गुस्सैल और लालची है और उनकी तकलीफों को ही स्वीकार करता है। एक बच्चे को चोट पहुंचाना कोई धार्मिक काम नहीं होता और वह भी उस मूर्ति को खुश करने के लिए जिसे मां (देवी) माना जाता है।
केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (केएससीपीसीआर) ने चेट्टिकुलंगरा देवी मंदिर को ढाई सौ साल पुराने कुठियट्टम अनुष्ठान के हिस्से के रूप में चुरल मूरियल को रोकने के लिए कहा था। प्रतिबंध के बावजूद पिछले साल यह अनुष्ठान पूरे गौरव के साथ आयोजित किया गया था। मंदिर प्रबंधन के अधिकारियों ने इस प्रथा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। केरल हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार यह प्रथा गैर-जमानती अपराध है। लेकिन यह बदस्तूर जारी है और अधिकारियों ने इससे पीछे हटने का कोई संकेत नहीं दिया है।
कल सुबह भी यह प्रथा जारी रहेगी।
मासूम बच्चों को उस भगवान की स्तुति करने के लिए मजबूर किया जाएगा, जिसके बारे में वे कुछ भी नहीं जानते। भक्ति संगीत के बीच उनकी चीखें कहीं खो जाएंगी और उनके घावों को स्वर्ग के प्रति वफादारी के रूप में महिमामंडित किया जाएगा।
एक ऐसी दुनिया जो अपने बच्चों की रक्षा नहीं कर सकती है, जो उन्हें मारना मुनासिब समझती है - भले ही प्रतीकात्मक रूप से - वह ऐसी एक ऐसी दुनिया है जिसका भविष्य खून से सना है और उसी में डूबकर बर्बाद होने के लिए अभिशप्त है।
कौन हैं यह भगवान जो, सोने की पलंग में सोने वालों को आशीर्वाद देने के लिए, उन लोगों के मांस और रक्त को स्वीकार करते हैं जिनके पास न तो जेब में पैसा है और न तन ढकने को कपड़ा?
साल 2016 दिसंबर में इस खबर को पहली बार दुनिया के सामने लाने वाले टी सुधीश कहते हैं, "'बलिदान' दे दिए गए इन बच्चों को मृत मान लिया जाता है। उन्हें स्कूलों और कॉलेजों में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। साथी ही उन्हें अपशगुन समझा जाता है। इन बच्चों के माता-पिता को तकलीफ होती है, लेकिन इनमें से ज्यादातर यह स्वीकार नहीं करते कि अपने बच्चों की इस दुर्दशा के बदले वे पैसे लेते हैं।"
आठ या नौ या 12 साल की उम्र में आप भगवान के बारे में क्या जानते थे? यह बच्चे शारीरिक और भावनात्मक आघात से गुजरते हैं और उनका नाबालिग मन इनके मायने नहीं समझ पाता। वे शायद एक ऐसे भगवान पर विश्वास करते हुए बड़े होते होंगे जो गुस्सैल और लालची है और उनकी तकलीफों को ही स्वीकार करता है। एक बच्चे को चोट पहुंचाना कोई धार्मिक काम नहीं होता और वह भी उस मूर्ति को खुश करने के लिए जिसे मां (देवी) माना जाता है।
केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (केएससीपीसीआर) ने चेट्टिकुलंगरा देवी मंदिर को ढाई सौ साल पुराने कुठियट्टम अनुष्ठान के हिस्से के रूप में चुरल मूरियल को रोकने के लिए कहा था। प्रतिबंध के बावजूद पिछले साल यह अनुष्ठान पूरे गौरव के साथ आयोजित किया गया था। मंदिर प्रबंधन के अधिकारियों ने इस प्रथा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। केरल हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार यह प्रथा गैर-जमानती अपराध है। लेकिन यह बदस्तूर जारी है और अधिकारियों ने इससे पीछे हटने का कोई संकेत नहीं दिया है।
कल सुबह भी यह प्रथा जारी रहेगी।
मासूम बच्चों को उस भगवान की स्तुति करने के लिए मजबूर किया जाएगा, जिसके बारे में वे कुछ भी नहीं जानते। भक्ति संगीत के बीच उनकी चीखें कहीं खो जाएंगी और उनके घावों को स्वर्ग के प्रति वफादारी के रूप में महिमामंडित किया जाएगा।
एक ऐसी दुनिया जो अपने बच्चों की रक्षा नहीं कर सकती है, जो उन्हें मारना मुनासिब समझती है - भले ही प्रतीकात्मक रूप से - वह ऐसी एक ऐसी दुनिया है जिसका भविष्य खून से सना है और उसी में डूबकर बर्बाद होने के लिए अभिशप्त है।