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Right to employment: 'रोजगार का अधिकार', देश में एक नए आंदोलन का आगाज, क्या होगा मौलिक अधिकारों में संशोधन?
सार
Right to employment: 'जन आयोग' की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में 15 से 29 साल की आयु वाले वर्ग को बेरोजगारी घेर रही है। जो अधिक शिक्षित हैं, उन्हें बेरोजगारी की चिंता ज्यादा सता रही है। युवा, सरकारी क्षेत्र से नौकरी की अधिक उम्मीद लगाए बैठे हैं...
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Right to employment: युवा सम्मेलन
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
देश में बढ़ रही बेरोजगारी से लोगों को निजात दिलाने के लिए एक बड़े आंदोलन की रूपरेखा तैयार की गई है। इस आंदोलन में कई सामाजिक संगठन हिस्सा लेंगे। देश बचाओ अभियान के अंतर्गत गठित 'जन आयोग' द्वारा रोजगार एवं बेरोजगारी की स्थिति पर कांस्टीट्यूशन क्लब में 11 अक्तूबर को रिपोर्ट पेश की गई है। जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर एवं प्रख्यात समाजशास्त्री डॉ. आनंद कुमार, इस आंदोलन के समन्वयक हैं। इस रिपोर्ट को तैयार करने में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार, अधिवक्ता प्रशांत भूषण और युवा हल्लाबोल के संस्थापक अनुपम सहित कई लोगों ने अपना योगदान दिया है। रिपोर्ट के साथ ही एक ड्राफ्ट तैयार किया गया है, जिसमें 'रोजगार के अधिकार', को मौलिक अधिकारों में शामिल कराने के लिए संविधान में संशोधन करने की मांग की जाएगी। इसके लिए देश के विभिन्न हिस्सों में आंदोलन शुरू होगा। सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक व युवा संगठनों से बातचीत कर फाइनल ड्राफ्ट तैयार होगा। उस पर कानून बनाने के लिए केंद्र सरकार से आग्रह किया जाएगा।
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केवल चार फीसदी रोजगार देता है पब्लिक सेक्टर: रिपोर्ट
रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में 15 से 29 साल की आयु वाले वर्ग को बेरोजगारी घेर रही है। जो अधिक शिक्षित हैं, उन्हें बेरोजगारी की चिंता ज्यादा सता रही है। युवा, सरकारी क्षेत्र से नौकरी की अधिक उम्मीद लगाए बैठे हैं। पब्लिक सेक्टर, जो केवल चार फीसदी रोजगार देता है, वह बेरोजगारी की समस्या को हल नहीं कर सकता। सरकारी क्षेत्र में लंबे समय तक खाली पड़े पद नहीं भरे जाते हैं। सांगठनिक क्षेत्र, छह फीसदी वर्क फोर्स को रोजगार दे सकता है, लेकिन 94 फीसदी असांगठनिक क्षेत्र की ओर किसी का ध्यान नहीं है। सांगठनिक क्षेत्र में लोगों को रोजगार देने की दर 3.32 फीसदी से 2.47 के स्तर पर पहुंच गई है। देश में छह हजार बड़े व्यवसाय हैं। छह लाख लघु एवं मध्यम यूनिट हैं। छह करोड़ माइक्रो यूनिट हैं। अधिकांश रोजगार माइक्रो यूनिट में मिल रहा है। सरकार की अधिकांश नीतियां एमएसएमई सेक्टर के लिए बन रही हैं। यही सेक्टर, सरकार के पैकेज एवं दूसरी योजनाओं का लाभ उठाता है।
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बेरोजगारी के लिए कई फैक्टर जिम्मेदार हैं
रोजगार एक अवशिष्ट है, मार्केटाइजेशन में सप्लाई साइड, नीतियां व श्रम कमजोर है। 94 फीसदी असांगठनिक क्षेत्र में कोई सुरक्षा भाव नहीं है। असमानता बढ़ रही है तो वहीं मांग संकुचित है। तकनीकी परिवर्तन तेजी से हो रहे हैं। ब्लैक इकोनॉमी का आकार बढ़ रहा है। आर्थिक मोर्चे पर लग रहे झटकों ने असांगठनिक क्षेत्र को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। देश में पूर्ण रोजगार नीति लागू हो। राइट टू वर्क के सामान्य आर्थिक पहलुओं पर गौर किया जाए। उत्पादन ढांचे में बदलाव हो। कृषि क्षेत्र, जो बड़े पैमाने पर रोजगार देता है, वहां सुधार अपेक्षित हैं। सोशल सेक्टर एवं सर्विस पर ध्यान देना होगा। शिक्षा पर जीडीपी का छह फीसदी खर्च बढ़ाया जाए। स्वास्थ्य पर तीन फीसदी खर्च हो। मनरेगा पर भी कम से कम जीडीपी का एक फीसदी खर्च हो। कंस्ट्रक्शन एवं ट्रेड सेक्टर उद्योग के साथ ही ट्राइबल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना होगा। अगले पांच साल में पूर्ण रोजगार के संसाधन जुटाने की जरूरत है। मौजूदा समय में सांगठनिक क्षेत्र में 30 मिलियन वर्कर हैं, जबकि असांगठनिक क्षेत्र में 398 मिलियन वर्कर हैं। 428 मिलियन वर्कर को काम मिल रहा है।
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