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Quick Commerce: कानूनों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों के निशाने पर खुदरा व्यापार, क्विक कॉमर्स के खिलाफ बिगुल

Tue, 22 Apr 2025 03:38 PM IST
राहुल कुमार डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: राहुल कुमार Updated Tue, 22 Apr 2025 03:38 PM IST
सार

कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने देश के पारंपरिक खुदरा व्यापार को कानूनों का उल्लंघन करने वाले कंपनियों के निशाने पर बताया है। कैट ने मंगलवार को क्विक कॉमर्स व ई-कॉमर्स जैसी कंपनियों के खिलाफ विरोध का बिगुल बजा दिया है।

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Retail trade targets companies violating laws, bugle against quick commerce
क्विक कॉमर्स - फोटो : freepik

विस्तार

कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने देश के पारंपरिक खुदरा व्यापार को कानूनों का उल्लंघन करने वाले कंपनियों के निशाने पर बताया है। कैट ने मंगलवार को क्विक कॉमर्स व ई-कॉमर्स जैसी कंपनियों के खिलाफ विरोध का बिगुल बजा दिया है। कॉन्स्टिट्यूशन क्लब, नई दिल्ली में आयोजित 'क्विक कॉमर्स और ई-कॉमर्स का क्रूर चेहरा' विषय पर राष्ट्रीय कॉन्क्लेव आयोजित किया गया। सम्मेलन में सर्वसम्मति से यह बात कही गई है कि भारत का दूसरा सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता, 'पारंपरिक खुदरा व्यापार', आज उन कंपनियों के निशाने पर है, जो खुलेआम कानूनों का उल्लंघन कर रही हैं। बाजार को विकृत कर रही हैं और छोटे व्यापारियों को योजनाबद्ध तरीके से बर्बाद कर रही हैं। 
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कैट ने ऑल इंडिया मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन (एमरा), ऑल इंडिया कंज़्यूमर प्रोडक्ट्स डिस्ट्रीब्यूटर्स फेडरेशन (आईसीपीडीएफ) और ऑर्गनाइज़्ड रिटेलर्स एसोसिएशन (ओरा) के साथ मिलकर विदेशी फंड से संचालित ई-कॉमर्स कंपनियों और तथाकथित भारतीय क्विक कॉमर्स प्लेटफार्मों के बेलगाम, अनैतिक और कानून-विरोधी कार्यप्रणालियों के खिलाफ राष्ट्रव्यापी खतरे की घंटी बजाई। कैट के राष्ट्रीय महामंत्री और चांदनी चौक से सांसद प्रवीन खंडेलवाल ने कहा, जब हर गली-हर नुक्कड़ पर दुकानें हैं, तो 10 मिनट की डिलीवरी की क्या ज़रूरत है। उन्होंने एफडीआई के दुरुपयोग और उपभोक्ताओं की गणित आधारित मानसिकता से हो रही छेड़छाड़ पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि ये कंपनियां भारत को 'केले गणराज्य' समझती हैं जहां कानूनों की कोई अहमियत नहीं है।
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बतौर खंडेलवाल, बुनियादी ढांचा खड़ा करने की बजाए, एफडीआई का इस्तेमाल घाटा भरने, छोटे दुकानदारों को खत्म करने और पूरी आपूर्ति श्रृंखला पर कब्ज़ा करने के लिए किया जा रहा है। यह अब व्यापार नहीं रहा, बल्कि यह वैल्यूएशन की दौड़ है, जिसमें भारतीय खुदरा व्यापारी कुचले जा रहे हैं। 
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कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष बीसी भरतिया ने घोषणा की कि 1 मई 2025 से पूरे देश में एक निर्णायक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया जाएगा। इसमें हर राज्य और शहर की व्यापारिक संस्थाएं हिस्सा लेंगी। इस आंदोलन की रणनीति 25–26 अप्रैल को भुवनेश्वर में आयोजित कैट की नेशनल गवर्निंग काउंसिल मीटिंग में घोषित की जाएगी।

आईसीपीडीएफ के अध्यक्ष धैर्यशील पाटिल ने क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म को एक छिपा हुआ हमला बताया है। जेप्तो, बलिंकित और इंस्टामार्ट जैसे प्लेटफॉर्म ने ₹54,000 करोड़ से अधिक का एफडीआई प्राप्त किया है, जिसमें से मात्र 2.5% ही बुनियादी ढांचे पर खर्च हुआ है। शेष राशि का प्रयोग घाटा भरने, पसंदीदा विक्रेताओं को सब्सिडी देने और एक बंद इकोसिस्टम तैयार करने में किया गया है। इससे स्वतंत्र व्यापारी बाहर हो गए हैं और उपभोक्ताओं को गुमराह किया जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी है कि ये मार्केटप्लेस नहीं हैं, ये इन्वेंट्री आधारित कंपनियां हैं जो नकाब पहनकर काम कर रही हैं। 


एमरा के अध्यक्ष कैलाश लाखियानी ने कहा, विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियां, पुरानी चाल हैं। अमेजन और फ्लिपकार्ट पर तीखा प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि ये कंपनियां पिछले एक दशक से भारत के कानूनी ढांचे में छेद कर खुदरा प्रणाली को तहस-नहस कर रही हैं। ये कंपनियां समूह कंपनियों और पसंदीदा विक्रेताओं के जरिए एफडीआई नियमों को दरकिनार कर आपूर्ति श्रृंखला पर पूरी तरह से नियंत्रण स्थापित कर रही हैं। स्वतंत्र विक्रेताओं से भारी-भरकम कमीशन वसूला जाता है, जबकि पसंदीदा विक्रेताओं को वेयरहाउसिंग, लॉजिस्टिक्स और डिलीवरी जैसी सुविधाएं लगभग मुफ्त मिलती हैं। सम्मेलन में इस मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की गई है। 

सर्वसम्मति से पास किया गया ये नीति प्रस्ताव ... 
• एफडीआई और ई-कॉमर्स नीतियों का तत्काल और सख्त प्रवर्तन एवं उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत ई-कॉमर्स नियमों को तुरंत लागू किया जाए।
• ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स द्वारा किए जा रहे इन्वेंट्री-आधारित संचालन पर पूर्ण प्रतिबंध लगे, यदि वे स्वयं को मार्केटप्लेस बताते हैं।
• डिजिटल कॉमर्स के लिए एक स्वतंत्र और सक्षम नियामक संस्था का गठन किया जाए।
• प्लेटफार्मों के एल्गोरिद्म, मूल्य निर्धारण और विक्रेता चयन में पूर्ण पारदर्शिता अनिवार्य की जाए।
• छोटे किराना दुकानों और ऑफलाइन व्यापार को संरक्षण और प्रोत्साहन मिले।
• ई-कॉमर्स प्लेटफार्म से वस्तुओं की खरीद पर जीएसटी के अंतर्गत लग्ज़री टैक्स लगाया जाए।
• क्विक कॉमर्स और ई-कॉमर्स कंपनियों द्वारा किए जा रहे मानवाधिकार उल्लंघनों को रोका जाए।
• डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय की जाए।
• बैंकों को यह निर्देश दिया जाए कि वे क्रेडिट कार्ड कैशबैक ऑफर में ई-कॉमर्स और छोटे दुकानदारों के बीच भेदभाव न करें।
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