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स्मृति शेष: विष्णु खरे ने कविता को कहानी के रूप में कहा, जिसे नए कवियों ने अपनाया
विष्णु नागर
Updated Wed, 19 Sep 2018 06:35 PM IST
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हम लोगों की पीढ़ी के सबसे महत्वपूर्ण कवि थे विष्णु खरे। उन्होंने कविताओं में जो बदलाव किया उसी का अनुसरण बाद वाली पीढ़ियों ने अपनी कविताओं में किया। दरअसल, उनका कविता लिखने का अंदाज थोड़ा अलग था। वह कहानियों के अंदाज में कविता या फिर कहें तो कविता में कहानी लिखा करते थे। वह कहानियां भी कहते थे। ऐसी कविता लिखना भी एक साधना है। विष्णु खरे की कविता के इस अंदाज को तमाम कवियों ने प्रयोग किया और वह खूब प्रसिद्ध हुए। एक पत्रकार के कविता लिखने के इस अंदाज ने उनकी छवि को अलग बना दिया।
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कविता में किए इन प्रयोगों से पहले उनकी छवि एक आलोचक की थी। इन सबके बीच मैं बताना चाहता हूं कि ज्ञान और जानकारियों की खान थे विष्णु खरे। उन्हें बॉलीवुड और अंतरराष्ट्रीय फिल्मों की भी बड़ी समझ थी वह फिल्मी दुनिया से भी बावस्ता थे। 78 साल की उम्र में भी वह मीडिया की दुनिया में सक्रिय थे। वह मुंबई के एक दैनिक समाचार पत्र में फिल्मों पर नियमित स्तंभ लिखा करते थे।
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वह लंबे अरसे तक पत्रकार रहे और कई मीडिया हाउस में अहम पद पर काम किया। यह बहुत कम लोगों को पता है कि वह पत्रकार, आलोचक, कवि और अनुवादक होने के साथ -साथ वह अंग्रेजी के व्याख्याता भी थे। उनका काम कई रूपों में जाना जाता है।
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मुझे वह दिन भी याद है जब उन्हें एक विदेशी महाकाव्य के अनुवाद करने का काम मिला था, तब वह मेरे घर के सामने यानी मयूर विहार फेज वन में ही रहते थे। वह दौर था जब सोसायटी कल्चर दिल्ली में आया ही था। पानी मोटर से नहीं बल्कि कुएं से खींचा जाता था। सारी रात पानी भरा जाता था और उस पानी भरे जाने के दौरान खूब शोर हुआ करता था। लेकिन विष्णु जी उस शोर को नजरअंदाज कर अनुवाद के काम में जुटे रहते थे और सारी-सारी रात जाग कर काम किया करते थे।
यह महज संयोग ही है कि जब उन्हें स्ट्रोक आया तब वह अकेले थे। विष्णु जी का पूरा परिवार मुंबई में है, लेकिन उन्हें मुंबई कभी रास नहीं आया। वह परिवार के साथ मुंबई चले जरूर गए थे लेकिन दिल्ली वापस आने का मौका तलाशते रहते थे। उन्होंने अपनी जिंदगी के 50 साल इसी शहर में गुजारे थे इसलिए गाहे-ब-गाहे वह दिल्ली आते जाते रहते थे।
वह बताते थे कि जब उन्हें दिल्ली सरकार ने हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनने की गुजारिश की तब उन्होंने इस विषय पर भी काफी सोचा था। परिवार वालों ने, बेटा और बेटी दोनों ने उन्हें दिल्ली आने के लिए मना किया था लेकिन दिल्ली का प्यार उन्हें यहां ले आया। विष्णु जी से हमारे करीबी रिश्ते रहे हैं।
(लेखक विष्णु खरे के मित्र व वरिष्ठ साहित्यकार हैं)