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पर्यावरण नियमों में ढील हिमालयी राज्यों के लिए घातक, सरकार के खिलाफ 50 पर्यावरणविद और संगठनों ने खोला मोर्चा

Thu, 30 Jul 2020 01:16 AM IST
अवधेश कुमार अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: अवधेश कुमार Updated Thu, 30 Jul 2020 01:16 AM IST
सार

  • पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया ढीला बनाना घातक
  • केंद्र सरकार से अधिसूचना वापस लेने की मांग

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Relaxation in environmental regulations is fatal for Himalayan states
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

विस्तार

पर्यावरण प्रभाव आकलन-2020 को लेकर मची रार थमने का नाम नहीं ले रही है। अब हिमालयी राज्यों के 50 से ज्यादा पर्यावरणविद और संगठनों ने पर्यावरण मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2020 को तुरंत वापस लेने की मांग की है। इन संगठनों का आरोप है कि मंत्रालय का विवादास्पद कदम कंपनियों को फायदा पहुंचाने से प्रेरित है। ऐसे में विकास परियोजनाओं के लिए पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया को ढीला बनाने की दिशा में एक और प्रयास हिमालय राज्यों के लिए घातक है।

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संगठनों ने कहा कि हिमालय में वनों के दोहन के कारण जैव विविधता बड़े पैमाने पर कम हो रही है। नदियों के सूखने, खत्म होते भूजल स्रोतों, ग्लेशियरों के पिघलने, पहाड़ों के खोखले किए जाने, ठोस और संकटमय कचरे से संबंधित प्रदूषण जैसी समस्याएं आम हैं। यहां की पर्यावरणीय स्थिति अत्यंत संवेदनशील है। पर्यावरणीय नियम कानून के क्रियान्वयन में ढिलाई और उदासीनता के चलते आज पारिस्थितिकी संकट और भी विकट हो गया है। 
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पिछले कुछ सालों में पर्यावरणीय मानदंडों और सामाजिक जवाबदेही के प्रावधानों के बढ़ते उल्लंघन, विस्तृत वैज्ञानिक योजना और प्रभाव मूल्यांकन अध्ययनों के अभाव और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में कम होते लोकतांत्रिक जन-भागीदारी ने इस स्थिति को और गंभीर कर दिया है। इसलिए केंद्र द्वारा पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना के तहत कंपनियों और परियोजना डेवलपर्स के लिए पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया में अधिक छूट का नया प्रस्ताव और घातक है।

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प्रभावित समुदायों से परामर्श जरूरी

1986 पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत बनाई गई ईआईए कानूनी प्रक्रिया के अंतर्गत किसी भी प्रस्तावित परियोजना या विकास कार्य के संभावित पर्यावरण व सामाजिक, आर्थिक प्रभाव का मूल्यांकन करना अनिवार्य है। इस कानून के तहत परियोजना को मंजूरी लेने की निर्णय प्रक्रिया में प्रभावित समुदायों के साथ जन परामर्श व तकनीकी और वैज्ञानिक विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा भी शामिल है, ताकि परियोजना की कीमत उससे होने वाले लाभ से ज्यादा न हो। पिछले दो दशकों में व्यापार के लिए इन नियमों को लगातार ढीला कर इस अधिसूचना में संशोधन किया गया। अब यह नया मसौदा ईआईए प्रक्रिया को एक औपचारिकता मात्र बनाकर कमजोर छोड़ देने की दिशा में ही एक और कदम है।

292 बड़े बांध का निर्माण प्रस्तावित

115000 मेगावाट बिजली की क्षमता विकसित करने के लिए पूरे हिमालयी क्षेत्र में अंधाधुंध जलविद्युत विकास परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। यदि सभी प्रस्तावित 292 बड़े बांधों का निर्माण होता है, तो बांधों की वर्तमान वैश्विक संख्या के आधार पर इस क्षेत्र में दुनिया के सबसे ज्यादा बांधों का समूह वाला क्षेत्र होगा। भारतीय हिमालय की लगभग 90 फीसदी घाटियां, बांध निर्माण से प्रभावित होंगी और इनमें से 27 प्रतिशत बांध घने जंगलों को प्रभावित करेंगे। 

लद्दाख, कश्मीर, हिमाचल जैसे क्षेत्रों में बढ़ते व्यावसायिक पर्यटन और उत्तराखंड में तीर्थ पर्यटन का अर्थ है बुनियादी ढांचे, सड़क, होटल और रिसॉर्ट का अंधाधुंध व गैर योजनाबद्ध निर्माण। चार धाम सड़क परियोजना के पूरा होने के बाद इससे होने वाला पर्यटन आने वाले समय में बड़ी तबाही और आपदा का एक जीवित उदाहरण है।
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