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Hindi News ›   India News ›   Raju Srivastava Memory : Comedians Last Rite Today, He Had Courage To Fill Universe In A Small Laughing Box

Raju Srivastava स्मृति शेष : राजू श्रीवास्तव में था ब्रह्मांड को छोटी-सी हंसी की डिबिया में भरने का साहस

Thu, 22 Sep 2022 06:53 AM IST
योगेश साहू देव प्रकाश चौधरी, नई दिल्ली।
देव प्रकाश चौधरी, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Thu, 22 Sep 2022 06:53 AM IST
सार

लोग हंसते रहे हैं। लोग आगे भी हंसते रहेंगे, लेकिन राजू श्रीवास्तव के साथ हंसने का मजा ही कुछ और था । उनके पास जो हंसी की खुराक थी, उसमें सादगी भी थी और ऊंचाई भी । जिंदगी से जुड़े थे, इसलिए हंसी का उनका खजाना भरा-पूरा था । उन्हें कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है, क्योंकि हम जब भी हंसेंगे, वे याद आएंगे।

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Raju Srivastava Memory : Comedians Last Rite Today, He Had Courage To Fill Universe In A Small Laughing Box
raju srivastav - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

एक छोटा सा लड़का था सत्य प्रकाश श्रीवास्तव। उसे अपने शहर कानपुर में उदास आदमी की तलाश रहती थी, जिसे हंसाया जा सके। कुछ दिनों के बाद उस लड़के ने अपना नाम बदल लिया। फिर पूरे ब्रह्मांड को एक छोटी-सी हंसी की डिबिया में भरने का साहस लेकर, अपने बदले हुए नाम के साथ उस लड़के ने अपना शहर भी बदल लिया।

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सत्य प्रकाश श्रीवास्तव अपने नए नाम राजू श्रीवास्तव के साथ मुंबई पहुंच गया था। फिर प्याज की छौंक की तरह खींचते हुए, उस नाम ने हम सब को, एक ही समय अपने-अपने घरों में टीवी के आगे बैठने की लत लगा दी। जो हंसी पहले सिर्फ सुनाई पड़ती थी, राजू श्रीवास्तव की वजह से हम सब को दिखाई देने लगी। 
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खबरिया चैनल भी अचानक हंसने-हंसाने पर उतारू हो गए। हर चैनल के पास थी हंसी की खुराक। कहीं हंसी के शहंशाह, तो कहीं बादशाह। कहीं हंसी के अवतार, तो कहीं भगवान। कोई हंसा कर एहसान कर रहा था, तो कोई कह रहा था राज मैं ही करूंगा। राजू श्रीवास्तव ने सचमुच राज किया। मंच पर भी और लोगों के दिलों पर भी।
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हंसी के अलग-अलग चेहरे से कराया परिचय
इंसान पहली बार कब हंसा होगा? हंसी खुद पर आई होगी या दूसरों पर, यह सदियों से बहस का विषय है, आगे भी रहेगा, लेकिन हंसी के गोलगप्पे, हंसी के छींटे, हंसी की बौछार, हंसी की फुहार, हंसी की मार, हंसी की दहाड़, हंसी के आर-पार, होश उड़ा देने वाली हंसी और कई बार रूलाने वाली हंसी लेकर राजू श्रीवास्तव हमारे सामने होते थे, बात तो उस पर भी होगी।

वे कहते थे-फुदकती रहती हैं इच्छाएं
कॉमेडी स्क्रिप्ट के सिलसिले में ढेर सारी मुलाकातों की स्मृतियां हैं। अक्सर कहते थे-‘शहर में कितनी इच्छाएं रहती हैं ? मुंबई में तो चप्पे-चप्पे पर बिखरी पड़ी हैं इच्छाएं। तेज-तेज कदमों की शामों और चेहरे पर उड़ते से भावों की रातों में भी फुदकती रहती हैं इच्छाएं।’

टिफिन बॉक्स और साइकिल में ढूंढ लेते थे हंसी
‘ऑब्जर्वेशनल कॉमेडी’ उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। वर्षों पुराने आपके पंखे में हंसी है, टायर पंक्चर हो चुके साइकिल में हंसी है या आपके टिफिन बॉक्स में हंसी है, यह सब हमने राजू श्रीवास्तव को देखकर जाना। 

हर घर का मेहमान हो गया गजोधर भैया का किरदार
लोकप्रियता का सफर संघर्ष भरा था, लेकिन वे मंच पर हंसी को उस मोड़ तक ले जाने में सफल रहे, जहां दाग अच्छे लगते हैं, बीमार होने का मजा ही कुछ और है और जहां सब कुछ ठंडा-ठंडा कूल-कूल है। ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज की सफलता ने राजू श्रीवास्तव को बड़ी ताकत दी थी। प्रसिद्धि मिली तो पैसा भी आया। फिर कई फिल्मों भी आईं। उनके कई अवतार भी आए, जिसमें गजोधर भैया का किरदार तो हर घर का मेहमान हो गया।

उनके जाने के बाद...हम खाली हो गए
लोग हंसते रहे हैं, लोग हंसते रहेंगे। लेकिन क्या हम गजोधर भैया को भूल पाएंगे? शामें होती रहेंगी सुबहें और सुबहें धीरे-धीरे होती रहेंगी शाम, लेकिन क्या उनके जाने के बाद, जो हम हो गए हैं खाली, क्या और नहीं होते जाएंगे खाली?

अमिताभ के ड्राइवर से मिलकर खुश हो जाता था
शुरू-शुरू में अमिताभ बच्चन से मिलना तो मुश्किल था, लेकिन खुशी उनके ड्राइवर से मिलकर भी बहुत होती थी। मैं अपने दोस्तों को फोन करके बताता था कि आज अमिताभ के ड्राइवर से हाथ मिलाया, अमिताभ के बंगले की दीवार भी छुई। -राजू श्रीवास्तव

द्रौपदी मुर्मू ने जताया शोक
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राजू श्रीवास्तव के निधन पर शोक जताया। उन्होंने ट्वीट किया, प्रख्यात हास्य कलाकार राजू श्रीवास्तव के असामयिक निधन से बेहद दुखी हूं। अपनी हास्य प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने की उनमें विलक्षण प्रतिभा थी। उनके प्रभाव से भारत में हास्य के मंचन को नई पहचान मिली। उनके परिवार व प्रशंसकों को मेरी सांत्वना।

राजू का निधन कला जगत के लिए बड़ी क्षति है। उन्होंने अपनी खास अदा से वर्षों तक लोगों का मनोरंजन किया। -अमित शाह, गृह मंत्री

राजू श्रीवास्तव ने अपनी कड़ी मेहनत और हुनर से हास्य को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। मैं ईश्वर से दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करने की प्रार्थना करता हूं। -योगी आदित्यनाथ, सीएम, यूपी

राजू श्रीवास्तव के निधन से स्तब्ध हूं। मंझे हुए कलाकार के साथ वह जिंदादिल इंसान भी थे। उनके परिवार के प्रति सांत्वना व्यक्त करता हूं। -राजनाथ सिंह, रक्षा मंत्री

मिमिक्री किंग और शानदार कलाकार राजू श्रीवास्तव के असामयिक निधन से दुखी हूं। उनके परिवार व प्रशंसकों को मेरी सांत्वना। -रामनाथ कोविंद, पूर्व राष्ट्रपति

टॉकीज, टीवी, सोशल मीडिया राजू ने हर जगह खूब हंसाया

राजू श्रीवास्तव ने अपने चाहने वालों की मुस्कान का भरपूर ख्याल रखा। टॉकीज के पर्दे पर फिल्में हों, टीवी पर कॉमेडी शो या सोशल मीडिया पर रील व वीडियो क्लिप का जमाना, उन्होंने अपने प्रशंसकों को खूब हंसाया। दूरदर्शन के लोकप्रिय धारावाहिक शक्तिमान में भी काम किया। इसमें रिपोर्टर धुरंधर सिंह के किरदार में उनकी डायलॉग डिलीवरी और अंदाज की खूब सराहना हुई थी।

अंतिम साक्षात्कार : वे हंसाते रहे... हम हंसते रहे

राजू श्रीवास्तव ने अस्पताल में भर्ती होने से कुछ ही दिन पहले आखिरी साक्षात्कार ‘अमर उजाला’ को दिया था, जो 7 अगस्त, 2022 को समाचार पत्र के साप्ताहिक परिशिष्ट मनोरंजन में प्रकाशित हुआ था। आज जब वे नहीं हैं, तो उस बातचीत को पढ़ना इसलिए भी जरूरी है कि हम जान सकें कि लोगों को हंसाने के लिए कितना संघर्ष किया था उन्होंने। ऋषभ सक्सेना से हुई बातचीत के खास अंश...

चेहरों पर मुस्कान लाने का बचपन से शौक था
मेरी कहानी की शुरुआत होती है कानपुर से, जहां मेरा बचपन बीता। छोटी उम्र में यह तो नहीं सोचा था कि कॉमेडी को ही कॅरिअर बनाना है। हां, लोगों के चेहरों पर मुस्कान लाने का शौक था। स्कूल में किसी शिक्षक की नकल उतार दी या चुटकुलों से किसी को हंसा दिया। कुछ समय जीवन ऐसे ही कट रहा था, इसमें मजा भी आ रहा था। यह बात करीब 45 साल पुरानी है, जब देश में स्टैंड-अप कॉमेडी नाम की चीज ही नहीं थी। लोग केवल फिल्म के हास्य कलाकारों को जानते थे। मेरी हरकतों को देखकर कुछ खुश होते थे, तो कुछ नहीं। स्कूल के प्रिंसिपल दबी जुबान तारीफ जरूर करते थे। वह कहते थे, ‘स्कूल में 300-400 छात्र हैं, आखिर यह लड़का ही क्यों सबकी नकल कर पाता है।

1982 में पहुंचा सपनों के शहर : हमारे साथ शुरू हो रही थी स्टैंड-अप कॉमेडी
दरअसल, तब तक स्टैंड-अप कॉमेडी का विकास नहीं हुआ था। हम इस कला के साथ अपना कॅरिअर शुरू कर रहे थे और यह कला हमारे साथ शुरू हो रही थी। घरवालों की बातें सुनते-सुनते एक दिन ख्याल आया कि जब मैं घर में रहकर भी अकेला हूं, तो क्यों न बाहर निकल किस्मत को आजमाऊं। 1982 में बैग पैक कर मैं सपनों के शहर मुंबई पहुंच गया।

कैसेट्स से कम हुई किल्लत
1986-87 में मेरी ‘हंसो-हंसाओ’, ‘हंसते रहो’ और ‘हंसना मना है’ जैसी ऑडियो कैसेट्स आईं। इन कैसेट्स की मांग खूब थी, लेकिन दायरा सीमित था। लोग आवाज सुनते थे, चेहरे से कोई नहीं पहचानता था। फायदा सिर्फ यह हुआ कि पहले एक कार्यक्रम के 500-1000 रुपये मिलते थे, कैसेट से अब 10 से 15 हजार रुपये तक मिलने लगे।

‘मैंने प्यार किया’ पहली फिल्म
पहली फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ थी, फिर ‘बाजीगर’, ‘मिस्टर आजाद’, ‘आमदनी अट्ठनी खर्चा रुपैया’ व ‘वाह तेरा क्या कहना’ जैसी फिल्में कीं। यह वो दौर था, जब स्टैंड-अप कॉमेडी में मजा आ रहा था। पैसा भी अच्छा-खासा मिल रहा था। शो देखने के लिए टिकट बिकने लगी थीं। इसका कुछ श्रेय महानायक अमिताभ बच्चन को भी जाता है।

मेरे लिए तो अमिताभ बच्चन भगवान सरीखे
मेरे लिए तो अमिताभ बच्चन भगवान हैं, उनके नाम से हमारा मजाक उड़ाया जाता था। 14-15 साल की उम्र से ही मैं अमिताभ का फैन बन गया था। ‘शोले’ देखने के बाद से ही अमिताभ का भक्त-सा हो गया। चलना, उठना-बैठना और हेयरस्टाइल सब अमिताभ जैसा। लोग मुझे जूनियर अमिताभ कहकर बुलाने लगे।

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