Rajasthan: आखिर गहलोत क्यों नहीं बनते हैं विपक्ष के नेता, क्या अब फिर वही पुराना रिकॉर्ड दोहराएंगे?
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विस्तार
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तीन बार राज्य की सत्ता संभाली। लेकिन बारी जब विपक्ष में बैठने की आई, तो गहलोत ने खुद की जगह किसी और को चेहरा बना दिया। अब जब राजस्थान में कांग्रेस की सरकार जा चुकी है, तो बड़ा सवाल यही उठ रहा है क्या अशोक गहलोत विपक्ष के नेता बनेंगे या हमेशा की तरह किसी और चेहरे को आगे कर दिया जाएगा। राजस्थान में आज होने वाली कांग्रेस विधायक दल की बैठक में बहुत कुछ स्पष्ट होने का अनुमान लगाया जा रहा है।
राजस्थान में हर पांच साल बाद सरकार बदलने के रिवाज के अलावा एक रिवाज अशोक गहलोत ने भी बनाया है। यह रिवाज कुछ और नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद विपक्ष में आने पर नेता विपक्ष न बनने का है। राजस्थान के सियासी जानकार बताते हैं कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जब-जब सत्ता से बाहर होकर विपक्ष में आए, तब-तब नेता विपक्ष उनकी बजाय कोई और बना। इसीलिए संशय इस बात पर बना हुआ है कि इन परिणामों के बाद अब अशोक गहलोत अपने उस रिवाज को कायम रखेंगे या बदलेंगे। हालांकि राजस्थान में विधायक दल का नेता चुनने के लिए पार्टी के नेता मुकुल वासनिक और भूपेंद्र हुड्डा को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा गया है। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक पार्टी में नेता विपक्ष को लेकर असमंजस बरकरार है, क्योंकि पहले भी गहलोत नेता विपक्ष बनने से मना करते रहे हैं।
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक संतोष मीणा बताते हैं कि राजस्थान में इसीलिए कांग्रेस पार्टी के लिए नेता विपक्ष का चुनाव भी चुनौतीपूर्ण हो गया है। राजनीतिक गलियारों में जिन चार नामों की सबसे ज्यादा चर्चा है, उसमें अशोक गहलोत से लेकर सचिन पायलट और गोविंद सिंह डोटासरा समेत शांति धारीवाल का नाम आगे चल रहा है। मीणा कहते हैं कि अशोक गहलोत खुद नेता प्रतिपक्ष बनेंगे इसकी संभावना कम नजर आ रही है। क्योंकि उनके ट्रैक रिकॉर्ड में नेता विपक्ष का पद शामिल ही नहीं है। इसलिए गहलोत के बाद जो दूसरा सबसे ज्यादा नाम चर्चा में है वह सचिन पायलट का है। लेकिन सियासी जानकारों का कहना है कि अशोक गहलोत यह बिल्कुल नहीं चाहेंगे कि सचिन पायलट को नेता विपक्ष बनाया जाए। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर इस तरह की परिस्थितियों आती हैं तो एक बार फिर से राजस्थान कांग्रेस में अंदरूनी तौर पर बड़े सियासी द्वंद्व और युद्ध छिड़ सकते हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ऐसी दशा में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने किसी करीबी को ही नेता प्रतिपक्ष बनना चाहेंगे। ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा है कि वह पूर्व मंत्री शांति धारीवाल का नाम आगे कर सकते हैं। धारीवाल अशोक गहलोत के सबसे करीबी नेताओं में माने जाते हैं। लेकिन अशोक गहलोत की केंद्रीय आलाकमान अब कितनी मानेगा यह देखने वाली बात है। इसके अलावा एक नाम गोविंद सिंह डोटासरा का भी है। राजनीतिक जानकार और वरिष्ठ पत्रकार संतोष कहते हैं कि गोविंद डोटासरा, अशोक गहलोत के भी करीबी हैं और सचिन पायलट के लिए भी मुफीद चेहरे हैं। अगर डोटासरा का नाम बतौर नेता प्रतिपक्ष आगे किया जाता है, तो राजस्थान की सियासत में कम से कम आपसी विवाद की स्थितियों से बचा जा सकेगा।
दरअसल कहा यही जा रहा है कि अशोक गहलोत नेता प्रतिपक्ष भले ही न बनें, लेकिन राजस्थान में वह कमान अपने हाथ में ही रखना चाहते हैं। इसीलिए अशोक गहलोत कोशिश करेंगे कि अपने किसी करीबी को ही नेता प्रतिपक्ष के तौर पर प्रोजेक्ट करें। हालांकि पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि अगर परिस्थितियां डोटासरा के पक्ष में जाती हैं, तो सियासत का एक नया पहलू फिर से खुल जाएगा। उस नए समीकरण में डोटासरा के प्रदेश अध्यक्ष न रहने पर सचिन पायलट को यह जिम्मेदारी एक बार फिर से दी जा सकती है। वह मानते हैं कि राजस्थान में सियासी नजरिए से केंद्रीय आला कमान को यह सियासी गणित ज्यादा मुफीद लग सकती है। फिलहाल केंद्रीय पर्यवेक्षकों और विधायकों की अहम बैठक पर सब की निगाहें लगी हुई हैं।