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Poonia Vs Scindia: सतीश पूनिया ने जयपुर में दिखाई ताकत, सालासर से वसुंधरा ने दिए सुलह के संकेत
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सतीश पूनिया और वसुंधराराजे सिंधिया।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
इस साल के अंत में होने वाले राजस्थान विधानसभा के चुनावी रण में भाजपा या कांग्रेस में कौन विजयी रहेगा, यह दोनों दलों की ताकत से ज्यादा इस बात पर निर्भर करेगा कि किसने अपनी पार्टी में गुटबाजी को ज्यादा बेहतर तरीके से संभाला। कांग्रेस अशोक गहलोत और सचिन पायलट खेमे की गुटबाजी से जूझ रही है तो भाजपा में वसुंधरा राजे सिंधिया और सतीश पूनिया में रस्साकशी जारी है। शनिवार को भाजपा के दोनों दिग्गजों का तनाव एक बार फिर सड़कों पर दिखाई पड़ा जब पार्टी के दोनों दिग्गजों ने एक ही दिन बड़े कार्यक्रम आयोजित कर एक-दूसरे को चुनौती दी।
राजस्थान भाजपा के अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनिया ने चार मार्च को अशोक गहलोत सरकार के खिलाफ 'युवा आक्रोश रैली' आयोजित कर सरकार की नीतियों पर जमकर हमला बोला। इस कार्यक्रम में पार्टी के ज्यादा सांसदों-विधायकों और कार्यकर्ताओं को लाकर उन्होंने पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत होने का दावा किया। कार्यक्रम के दौरान राजधानी जयपुर में बड़ा विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया और सरकार को प्रदर्शन संभालने में बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। पार्टी के केंद्रीय नेता अरुण सिंह भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए। इसे सतीश पूनिया के ऊपर केंद्रीय नेतृत्व के 'आशीर्वाद' के रूप में देखा जा रहा है।
भाजपा युवा मोर्चा, राजस्थान के अध्यक्ष हिमांशु शर्मा ने अमर उजाला से कहा कि उनका कार्यक्रम पूर्व निर्धारित था। प्रदेश में कोई भी परीक्षा बिना लीक हुए नहीं हो पा रही है। इससे परीक्षाएं रद्द करनी पड़ रही हैं और युवाओं को नौकरी नहीं मिल पा रही है। उन्होंने दावा किया कि इस विरोध प्रदर्शन में राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों से आए लगभग 50 हजार युवा कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया और सरकार को युवाओं के विषयों के प्रति गंभीर होने की चेतावनी दी। पार्टी के शानदार कार्यक्रम को लेकर केंद्र से मिल रहे संकेत पूनिया गुट का 'उत्साह' बढ़ाने वाले हैं।
वसुंधरा के संकेत
वहीं, राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधराराजे सिंधिया ने अपने जन्मदिन (8 मार्च) का कार्यक्रम चार मार्च को सालासर धाम, चूरू में रख दिया। वसुंधराराजे के जन्मदिन के कार्यक्रम में पार्टी के 10 सांसदों के साथ-साथ राज्य के 30 से ज्यादा विधायक पहुंचे। इसे वसुंधरा गुट की तरफ से पार्टी नेतृत्व को अपनी उपेक्षा न किए जाने की 'चेतावनी' के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, अपना 70वां जन्मदिन मना रहीं वसुंधरा ने सीधे तौर पर तलवार खींचने की बजाय सुलह के ही संकेत देने की कोशिश की।
उन्होंने कहा कि वे पार्टी की एक सिपाही हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जेपी नड्डा के नेतृत्व में पार्टी कार्यकर्ताओं को साथ लेकर आगे बढ़ रही हैं। इस तरह वसुंधराराजे ने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से जल्द कोई बगावत न करने के संकेत दिए। वहीं, जयपुर के विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने के बाद चूरू पहुंचे अरुण सिंह ने वसुंधराराजे सिंधिया को भी जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने पार्टी में किसी तरह की गुटबाजी होने से इनकार करते हुए सबको साथ लेकर आगे बढ़ने की बात कही।
लेकिन यहां है पेंच
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनिया ने कुछ समय पहले कहा था कि 70 वर्ष से ज्यादा के नेताओं को राजनीति से सन्यास ले लेना चाहिए। चूंकि, उनकी प्रतिद्वंदी वसुंधराराजे सिंधिया इस साल अपना 70वां जन्मदिन मना रही हैं, उनके इस बयान को सीधे उनसे जोड़कर देखा गया और प्रदेश की राजनीति में भूकंप आ गया। बाद में इसे अपना व्यक्तिगत मत बताकर सतीश पूनिया ने मामले को ठंडा कर दिया, लेकिन उनके इस बयान को वसुंधरा पर हमले की तौर पर ही देखा गया।
पार्टी की नीति
मामला यहीं तक सीमित नहीं है। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व 70 वर्ष से अधिक उम्र के नेताओं को प्रदेश की राजनीति से 'रिटायर' करने के मूड में दिखाई पड़ रहा है। इसी नीति को ध्यान में रखते हुए गुजरात सहित दूसरे प्रदेशों में 70 वर्ष से ज्यादा उम्र के नेताओं को चुनाव में टिकट नहीं दिया गया। पूनिया के बयान को भी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की नीति के अनुसार ही देखा जा रहा है। संभवतः इसी नीति को ध्यान में रखते हुए वसुंधराराजे सिंधिया को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाकर प्रदेश से दूर करने की कोशिश की गई, लेकिन वसुंधरा केंद्र में सक्रिय नहीं हुईं।
इसे उनकी प्रदेश की राजनीति में एक और पाली खेलने की इच्छा के तौर पर देखा जाता है। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के सामने 'वसुंधरा फैक्टर' को संभालते हुए आगे बढ़ने की कड़ी चुनौती है।