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Rail Budget 2018- त्वरित विश्लेषण: बुलेट ट्रेन की तरह आया 4 मिनट में रेल बजट
अतुल सिन्हा, नई दिल्ली
Updated Fri, 02 Feb 2018 01:37 PM IST
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अब यह कहना तो मुश्किल है कि सरकार ने अपने बजट में रेल को हाशिए पर पहुंचा दिया है, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि 92 साल तक रेल बजट जिस धूमधाम और बड़े पैमाने पर पेश किया जाता रहा, वो पिछले दो सालों से आम बजट का एक छोटा सा हिस्सा बनकर महज एक औपचारिकता भर रह गया है। अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री जेटली ने रेलवे के लिए महज 4 मिनट का वक्त दिया और फटाफट कुछ खास बातें कहकर आगे बढ़ गए। उन खास बातों में मुंबई से वडोदरा तक शुरू होने वाली मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट बुलेट ट्रेन का जिक्र था, हाई स्पीड ट्रेनों के लिए फास्ट ट्रैक्स बनाने, पटरियों को ब्रॉड गेज में तब्दील करने, 600 रेलवे स्टेशनों को आधुनिक बनाने, ज्यादा रेल कोच बनाने, मानव रहित रेलवे क्रासिंग खत्म करने और मुंबई की लाइफलाइन यानी लोकल का विस्तार करने की बात थी। पास बैठे पूर्व रेल मंत्री सुरेश प्रभु जेटली को रेल बजट पढ़ते हुए निहारते रहे और इस तरह देश भर में करीब 1,15,000 किलोमीटर में फैली और 7,172 रेलवे स्टेशनों को समेटने वाली रेलवे का बजट तेजी से पढ़ दिया गया।
अब न तो नई ट्रेनों के बारे में विस्तार से जानकारी मिल पाई और न ही रेलवे सुरक्षा को लेकर कोई बात हुई। आधुनिकीकरण एक ऐसा शब्द है जिसमें तकनीकी तौर पर हर पहलू समा जाता है। जैसे वित्त मंत्री ने 600 स्टेशनों के आधुनिकीकरण की जब बात कही तो उसमें मुफ्त वाई-फाई सुविधा से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और स्वचालित सीढ़ियों की बात सामने आई, लेकिन रेल हादसे रोकने के बारे में या रेलवे में महिलाओं की सुरक्षा के बारे में या फिर वहां खान पान की क्वालिटी सुधारने के बारे में अगर आपको जानना है तो इसके लिए रेलवे मंत्रालय में अलग से संपर्क करना पड़ेगा।
दरअसल आम बजट की पूरी परिकल्पना मोदी सरकार ने इसलिए भी बदलने की कोशिश की है ताकि आम आदमी आंकड़ों के चक्रव्यूह से बच सके और बजट एक उत्सव न रहकर महज हर मंत्रालय, विभाग या योजनाओं के लिए बजटीय प्रावधानों की चर्चा तक सीमित रहे। शायद इसलिए रेल बजट को भी आम मंत्रालयों की तरह फटाफट अंदाज में निपटाने की प्रक्रिया पूरी की गई। वैसे भी अब आम लोगों के लिहाज से देखें तो सरकार साल भर के किसी भी दिन कोई भी फैसला लेकर उसे लागू करने की परंपरा शुरू कर चुकी है, इसके लिए परंपरागत तरीके से बजट का इंतजार करना अब किसी के लिए भी जरूरी नहीं रहा।
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अब देश की सबसे बड़ी परिवहन व्यवस्था और आम आदमी की जीवन रेखा यानी भारतीय रेल के 12 हजार ट्रेनों में रोजाना चलने वाले करीब ढाई करोड़ यात्रियों के लिए न तो रेल बजट में अलग से कोई उम्मीद होती है, न किराया घटने बढ़ने को लेकर कोई इंतजार और न ही नई सुविधाओं और नई ट्रेनों को लेकर बेकरारी। अब देश को इंतजार है तो बस बुलेट ट्रेन का और सपना है उन फास्ट ट्रैक्स पर दौड़ने वाली उन ट्रेनों का जो उनका सफर आसान और सुरक्षित बना सकें।
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अब न तो नई ट्रेनों के बारे में विस्तार से जानकारी मिल पाई और न ही रेलवे सुरक्षा को लेकर कोई बात हुई। आधुनिकीकरण एक ऐसा शब्द है जिसमें तकनीकी तौर पर हर पहलू समा जाता है। जैसे वित्त मंत्री ने 600 स्टेशनों के आधुनिकीकरण की जब बात कही तो उसमें मुफ्त वाई-फाई सुविधा से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और स्वचालित सीढ़ियों की बात सामने आई, लेकिन रेल हादसे रोकने के बारे में या रेलवे में महिलाओं की सुरक्षा के बारे में या फिर वहां खान पान की क्वालिटी सुधारने के बारे में अगर आपको जानना है तो इसके लिए रेलवे मंत्रालय में अलग से संपर्क करना पड़ेगा।
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दरअसल आम बजट की पूरी परिकल्पना मोदी सरकार ने इसलिए भी बदलने की कोशिश की है ताकि आम आदमी आंकड़ों के चक्रव्यूह से बच सके और बजट एक उत्सव न रहकर महज हर मंत्रालय, विभाग या योजनाओं के लिए बजटीय प्रावधानों की चर्चा तक सीमित रहे। शायद इसलिए रेल बजट को भी आम मंत्रालयों की तरह फटाफट अंदाज में निपटाने की प्रक्रिया पूरी की गई। वैसे भी अब आम लोगों के लिहाज से देखें तो सरकार साल भर के किसी भी दिन कोई भी फैसला लेकर उसे लागू करने की परंपरा शुरू कर चुकी है, इसके लिए परंपरागत तरीके से बजट का इंतजार करना अब किसी के लिए भी जरूरी नहीं रहा।
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अब देश की सबसे बड़ी परिवहन व्यवस्था और आम आदमी की जीवन रेखा यानी भारतीय रेल के 12 हजार ट्रेनों में रोजाना चलने वाले करीब ढाई करोड़ यात्रियों के लिए न तो रेल बजट में अलग से कोई उम्मीद होती है, न किराया घटने बढ़ने को लेकर कोई इंतजार और न ही नई सुविधाओं और नई ट्रेनों को लेकर बेकरारी। अब देश को इंतजार है तो बस बुलेट ट्रेन का और सपना है उन फास्ट ट्रैक्स पर दौड़ने वाली उन ट्रेनों का जो उनका सफर आसान और सुरक्षित बना सकें।