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जब अपनी चुराई गई साइकिल लेने नामी दादा के अखाड़े पर पहुंच गए थे कर्नल आशुतोष

Sat, 09 May 2020 07:03 PM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amit Mandal Updated Sat, 09 May 2020 07:03 PM IST
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Rahul Sharma shares stories of Bravery of Colonel Ashutosh Sharma with AU digital
कर्नल आशुतोष शर्मा और राहुल शर्मा - फोटो : अमर उजाला

जम्मू कश्मीर में शहीद हुए कर्नल आशुतोष शर्मा की शहादत का किस्सा आज हर किसी की जुबान पर है। अमर उजाला डॉट कॉम के साथ उनके करीबी दोस्त राहुल शर्मा से खास बातचीत का यह आखिरी अंश है। इस बातचीत के दौरान उन्होंने कर्नल आशुतोष के बहादुरी के कुछ और किस्से सुनाए। 

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राहुल शर्मा ने कहा कि इस तरह की गाथाएं लोगों तक पहुंचाने का अमर उजाला डिजिटल का ये प्रयास बहुत सराहनीय है। आने वाली पीढ़ी को इस तरह के वीरों की गाथाएं सुनाना बहुत जरूरी है क्योंकि ये बहुत प्रेरणादायक हैं। हमारा जो बैच था उसमें कारगिल युद्ध के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा और मनोज पांडे जैसे योद्धाओं से हमें प्रेरणा मिलती थी। 
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युवा पीढ़ी जो भविष्य में सेना में जाना चाहती है उन्हें कर्नल आशुतोष, कर्नल पांडे, मेजर महाडिक की गाथाएं सुनाना बहुत जरूरी है। आपका डिजिटल माध्यम इनकी कहानियां सभी तक पहुंचा सकता है। जिस तरह कश्मीर में आतंकी नायकू का अंत हुआ, कई चैनल दिखाने लगे थे कि वह कैसे खाना बनाता था, कहां टीचर था। इन्हें महिमामंडित करने की जरूरत नहीं है। 
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सेना में जाने की कैसी जिद थी कर्नल आशुतोष की...दोस्त ने सुनाए कुछ पुराने किस्से

कर्नल आशुतोष ने जान के बलिदान का अपना रास्ता खुद चुना था। मौत तो सभी को आनी है, यह अटल सत्य है। लेकिन अपनी मौत का चयन कुछ ही लोग धरती पर कर पाते हैं और ये सौभाग्य कर्नल आशुतोष को मिला। उन्होंने देश के लिए अपना बलिदान दिया। 



नामी पहलवान के अखाड़े पर पहुंचने का किस्सा

मैं एक किस्सा सुनाता हूं जो बहुत कम लोगों को मालूम है। हम दोनों ही फौज के लिए कोशिश कर रहे थे। एक बार मैं मेरठ से बुलंदशहर गया उसके घर पर। वह जिम में था, शाम का वक्त था। पिता ने उसे रेसिंग साइकिल दिलाई थी वो चोरी हो गई थी। उसे पता चला कि जिसने चोरी की है वो बुलंदशहर का बहुत नामी दादा पहलवान है। 


उसने मुझे बस स्टैंड से लिया और कहा कि कहीं चलना है किसी से मिलकर आते हैं। हम रिक्शा से उसके घर गए और देखा कि साइकिल 10-12 लोगों के बीच खड़ी की हुई थी। वह सीधे अखाड़े में गया और कहा कि मैं अपनी साइकिल लेने आया हूं। प पहलवान ने कहा कि तू अंदर आ गया यही बहुत बड़ी हिम्मत की बात है। आशुतोष ने कहा कि मेरी पिताजी की दी हुई चीज के लिए किसी भी हद तक जा सकता हूं। 

ये मेरा बर्थडे गिफ्ट है जो मेरे पिताजी ने मुझे दिया था और इसके लिए किसी भी हद तक जा सकता हूं। यह सुनकर पहलवान ने खुशी खुशी साइकिल लौटा दी और अपने लड़कों से दोबारा ऐसा न करने को कहा। तो इस तरह से उसमें पहले से ही जोश और बहादुरी थी।  

देश के जो युवा सेना में जाना चाहते हैं, उन्हें क्या करना चाहिए, किस तरह की तैयारी करनी चाहिए, ताकि राष्ट्र की बेहतर सेवा कर सकें, इस पर आप क्या कहेंगे। इस सवाल पर राहुल शर्मा ने कहा- पहले तो वे अच्छा इंसान बनें, अच्छा साहित्य पढ़ें। अच्छी सोच विकसित करें। जानें की देश व विदेश में क्या चल रहा है। लक्ष्य के प्रति मूलभूत योजना होनी चाहिए। आपको ईमानदारी से अपना काम करना होगा। चाहे रनिंग हो, जिमिंग हो, जो भी कमी हो उसे मेहनत करके पूरा करें।   

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