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पहले 21 जुलाई और अब 21 अगस्त: राहुल गांधी के दो धरने, मुद्दा एक; धरना करने की जगहों में क्या नया क्या पुराना?
Fri, 21 Aug 2026 05:25 PM IST
राकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Fri, 21 Aug 2026 05:25 PM IST
सार
20 जुलाई के छात्र प्रदर्शन से शुरू हुआ विवाद एक महीने बाद भी खत्म नहीं हुआ है। 21 जुलाई को राहुल गांधी प्रधानमंत्री आवास के बाहर पहुंचे थे और अब 21 अगस्त को पुलिस थाने के बाहर धरने पर बैठे। जगह बदल गई, लेकिन सवाल वही है, छात्रों के खिलाफ हुई कार्रवाई को लेकर आगे क्या होगा?
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राहुल गांधी का धरना प्रदर्शन
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
राहुल गांधी 21 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के बाहर धरने पर बैठे थे। ठीक एक महीने बाद 21 अगस्त को वह फिर धरने पर बैठे। इस बार जगह संसद मार्ग पुलिस थाना और डीसीपी कार्यालय। साथ में 19 वर्षीय छात्र साहिल लोचव था। मांग थी उसकी शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज करने की। दोनों घटनाओं के बीच एक महीना जरूर बीत गया, लेकिन राहुल गांधी का मुद्दा नहीं बदला। सवाल अब भी 20 जुलाई को दिल्ली में हुए छात्र आंदोलन और उसके बाद हुई पुलिस कार्रवाई का है।
लेकिन राहुल गांधी आखिर इस मुद्दे पर बार-बार सड़क पर क्यों उतर रहे हैं? इसकी कहानी सिर्फ पैलेट गन के आरोप या एक घायल छात्र तक सीमित नहीं है। इसके पीछे सीजेपी के नेतृत्व में शुरू हुआ बड़ा छात्र आंदोलन, नीट परीक्षा में कथित गड़बड़ियों को लेकर युवाओं का गुस्सा, पुलिस कार्रवाई, कांग्रेस की राजनीतिक एंट्री, संसद में लगातार विरोध और आखिरकार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक की पूरी कहानी जुड़ी है।
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सीजेपी आंदोलन ने कैसे बदला पूरा राजनीतिक माहौल?
सीजेपी यानी कॉकरेज जनता पार्टी का आंदोलन शुरुआत में पारंपरिक राजनीतिक दलों से अलग एक युवा आंदोलन के रूप में सामने आया। इसका केंद्र परीक्षा व्यवस्था, कथित पेपर लीक और युवाओं की नाराजगी थी। नीट-यूजी परीक्षा से जुड़े विवाद के बाद यह आंदोलन लगातार बड़ा होता गया। युवाओं के बीच परीक्षा में कथित अनियमितताओं और व्यवस्था के खिलाफ नाराजगी पहले से थी। सीजेपी ने इसी गुस्से को संगठित आंदोलन का रूप दिया।
सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल से धीरे-धीरे यह आंदोलन सिर्फ परीक्षा तक सीमित नहीं रहा। इसमें युवाओं के भविष्य, जवाबदेही और सरकारी व्यवस्था पर सवाल उठने लगे। आंदोलन को सोशल मीडिया से भी बड़ी ताकत मिली और दिल्ली समेत कई जगहों पर इसका असर दिखाई दिया। प्रसिद्ध शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर 28 जून से 24 जुलाई 2026 तक लगातार 26 दिनों तक भूख हड़ताल की।
20 जुलाई का 'संसद चलो', यहीं से बदली कहानी
आंदोलन का सबसे बड़ा मोड़ 20 जुलाई को आया। सीजेपी के नेतृत्व में बड़ी संख्या में छात्र और युवा दिल्ली में संसद की ओर मार्च के लिए पहुंचे। प्रदर्शन के दौरान हालात बिगड़ गए और पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ। पुलिस कार्रवाई में कई लोग घायल हुए। पुलिस ने भी प्रदर्शनकारियों पर हिंसा और कानून व्यवस्था बिगाड़ने के आरोप लगाए। यहीं से छात्र आंदोलन एक बड़े राजनीतिक मुद्दे में बदल गया।
प्रदर्शनकारियों और विपक्ष ने आरोप लगाया कि छात्रों के खिलाफ जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया गया। आंसू गैस, लाठीचार्ज और पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए। पुलिस ने पैलेट गन के इस्तेमाल के आरोप से इनकार किया। हालांकि, घायल लोगों की तस्वीरों और आरोपों के बाद विवाद लगातार बढ़ता गया।
कांग्रेस ने आंदोलन के बाद संभाला राजनीतिक मोर्चा!
20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई के बाद कांग्रेस ने इस मुद्दे को खुलकर उठाया। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने घायल छात्रों से मुलाकात की और सरकार पर हमला बोला। इसके अगले दिन यानी 21 जुलाई को राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता प्रधानमंत्री आवास के बाहर पहुंच गए। यह विरोध पहले से तय बड़े कार्यक्रम की तरह नहीं था। कांग्रेस नेताओं ने सरकार को सीधे उसके सबसे बड़े राजनीतिक केंद्र पर घेरने की कोशिश की। कांग्रेस की मांगें सिर्फ पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं थीं। पार्टी ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे, संसद में चर्चा, छात्रों की बात सुनने और पुलिस कार्रवाई की जांच की मांग उठाई। सरकार की ओर से कहा गया कि नीट और संबंधित मुद्दों पर संसद में चर्चा के लिए तैयार हैं, लेकिन कांग्रेस और विपक्ष मंत्री के इस्तीफे की मांग पर अड़े रहे।
राहुल का पहला धरना: पीएम आवास के बाहर सरकार को सीधी चुनौती
21 जुलाई को राहुल गांधी का धरना राजनीतिक रूप से इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि वह सीधे प्रधानमंत्री के आवास के बाहर पहुंचे थे। राहुल और प्रियंका गांधी समेत कई नेताओं को बाद में पुलिस ने वहां से हटा दिया। दोनों को कुछ समय के लिए हिरासत में भी लिया गया। इस कार्रवाई ने कांग्रेस को सरकार पर एक और हमला करने का मौका दिया। राहुल गांधी ने छात्र आंदोलन को सिर्फ परीक्षा विवाद नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य और लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार से जोड़कर पेश किया।
सड़क से संसद तक पहुंचा मामला
21 जुलाई के बाद कांग्रेस और विपक्ष ने इस मुद्दे को संसद के भीतर भी जोरदार तरीके से उठाया। लोकसभा और राज्यसभा में नीट पेपर लीक, छात्र आंदोलन और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को लेकर लगातार हंगामा हुआ। विपक्षी सांसदों ने संसद परिसर में प्रदर्शन किया। 23 जुलाई को संसद के मकर द्वार पर विपक्षी नेताओं ने विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव और कई अन्य विपक्षी नेता शामिल हुए।
संसद के भीतर सरकार का कहना था कि वह चर्चा के लिए तैयार है। दूसरी तरफ विपक्ष का तर्क था कि पहले शिक्षा मंत्री की जवाबदेही तय होनी चाहिए। 24 जुलाई तक दोनों सदनों में गतिरोध बना रहा। विपक्षी सांसद शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग करते हुए नारेबाजी करते रहे और कई बार कार्यवाही बाधित हुई। यानी कांग्रेस ने सीजेपी के आंदोलन से उठे मुद्दे को सिर्फ सड़क पर नहीं छोड़ा। पार्टी ने उसे संसद के भीतर भी सरकार के खिलाफ राजनीतिक हथियार बना दिया।
फिर राहुल ने क्यों दिखाया घायल छात्र?
पुलिस कार्रवाई के बाद पैलेट गन के इस्तेमाल का आरोप इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील हिस्सा बन गया। दिल्ली पुलिस ने पैलेट गन इस्तेमाल करने के आरोप से इनकार किया। इसके बाद राहुल गांधी ने जुलाई में छात्र साहिल लोचव को मीडिया के सामने पेश किया और दावा किया कि वह प्रदर्शन के दौरान पैलेट से घायल हुआ था। राहुल गांधी ने उसके आंख में चोट लगने का मुद्दा उठाया और गृह मंत्री अमित शाह से जवाब मांगा कि छात्रों के खिलाफ इस तरह के बल प्रयोग की अनुमति किसने दी। यहीं से राहुल गांधी की राजनीति का फोकस थोड़ा बदल गया। पहले कांग्रेस का मुख्य हमला पेपर लीक, शिक्षा मंत्री की जवाबदेही और पुलिस कार्रवाई पर था। बाद में पैलेट गन का आरोप और घायल छात्रों को न्याय दिलाने का मुद्दा भी केंद्र में आ गया।
संसद का दबाव, सड़क का आंदोलन और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा
सीजेपी आंदोलन और विपक्ष के लगातार दबाव के बीच 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे को आंदोलन की बड़ी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में देखा गया। हालांकि, मंत्री के इस्तीफे के बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ। कांग्रेस और राहुल गांधी का कहना है कि छात्रों के खिलाफ हुई कथित पुलिस कार्रवाई और पैलेट गन के आरोप की जवाबदेही अलग मुद्दा है। यानी शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से परीक्षा व्यवस्था और राजनीतिक जवाबदेही का एक सवाल जरूर शांत हुआ, लेकिन 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई को लेकर विवाद बना रहा।
यह भी पढ़ें: थाने में राहुल गांधी का धरना: कांग्रेस नेता ने कहा- जब तक एफआईआर दर्ज नहीं होगी, यहां से नहीं हिलेंगे
एक महीने बाद फिर साहिल के साथ थाने पहुंचे राहुल गांधी
यही वजह है कि 21 अगस्त को राहुल गांधी फिर उसी मुद्दे को लेकर सड़क पर उतरे। इस बार उनके साथ 19 वर्षीय साहिल लोचव भी थे। राहुल गांधी उसकी शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज कराने की मांग लेकर पहले पुलिस अधिकारियों के पास पहुंचे। रिपोर्टों के अनुसार, साहिल और उसके वकीलों ने इससे पहले भी पुलिस से संपर्क किया था। इसके बाद राहुल गांधी उसके साथ संसद मार्ग पुलिस थाने पहुंचे और डीसीपी से मुलाकात की।
जब उनकी मांग पूरी नहीं हुई तो राहुल गांधी धरने पर बैठ गए। बाद में प्रियंका गांधी भी उनके साथ धरने में शामिल हुईं। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित पुलिस बर्बरता गंभीर मामला है और इसकी जांच तथा जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
पहले पीएम आवास, अब पुलिस थाना; राहुल की रणनीति कैसे बदली?
दोनों धरनों में सबसे बड़ा फर्क यही है। 21 जुलाई को राहुल गांधी का निशाना राजनीतिक था। वह प्रधानमंत्री आवास के बाहर सरकार से जवाब, संसद में चर्चा और शिक्षा मंत्री की जवाबदेही मांग रहे थे। 21 अगस्त को लड़ाई कानूनी कार्रवाई की मांग तक पहुंच गई। राहुल गांधी घायल छात्र को साथ लेकर पुलिस के पास पहुंचे और उसकी शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज करने की मांग करने लगे। यानी पहले धरने में राहुल गांधी सरकार पर राजनीतिक दबाव बना रहे थे। दूसरे धरने में वह उसी घटना को जवाबदेही और पुलिस कार्रवाई के कानूनी सवाल से जोड़ रहे हैं।
भाजपा ने क्या कहा?
इस बीच केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने कहा कि राहुल गांधी का धरना केवल सुर्खियों में बने रहने के लिए किया गया 'कैमरा केंद्रित ड्रामा' है। उन्होंने कहा कि इस प्रदर्शन का उद्देश्य न्याय की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि मीडिया का ध्यान आकर्षित करना है। नड्डा के मुताबिक, जब मामला पहले से सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में है, तब इस तरह का प्रदर्शन करने का कोई औचित्य नहीं है।
तो क्या सिर्फ संयोग है 21 जुलाई और 21 अगस्त की तारीख?
दोनों बार तारीख 21 होना एक दिलचस्प संयोग जरूर है, लेकिन इसके पीछे की राजनीति एक महीने में काफी बदल चुकी है। 21 जुलाई को राहुल गांधी सीजेपी के छात्र आंदोलन पर हुई पुलिस कार्रवाई के बाद विपक्षी मोर्चे के साथ प्रधानमंत्री आवास तक पहुंचे थे। उस समय लड़ाई छात्र आंदोलन, पेपर लीक, शिक्षा मंत्री की जवाबदेही और पुलिस कार्रवाई के खिलाफ थी।
एक महीने बाद शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हो चुका है, लेकिन अब सवाल सीधे उस कथित पुलिस कार्रवाई और घायल छात्र की शिकायत पर आ गया है। यानी सीजेपी के आंदोलन ने जिस मुद्दे को जन्म दिया था, कांग्रेस ने उसे पहले सड़क पर उठाया, फिर संसद तक पहुंचाया और अब राहुल गांधी उसे कानूनी जवाबदेही के सवाल तक ले आए हैं।
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लेकिन राहुल गांधी आखिर इस मुद्दे पर बार-बार सड़क पर क्यों उतर रहे हैं? इसकी कहानी सिर्फ पैलेट गन के आरोप या एक घायल छात्र तक सीमित नहीं है। इसके पीछे सीजेपी के नेतृत्व में शुरू हुआ बड़ा छात्र आंदोलन, नीट परीक्षा में कथित गड़बड़ियों को लेकर युवाओं का गुस्सा, पुलिस कार्रवाई, कांग्रेस की राजनीतिक एंट्री, संसद में लगातार विरोध और आखिरकार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक की पूरी कहानी जुड़ी है।
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सीजेपी आंदोलन ने कैसे बदला पूरा राजनीतिक माहौल?
सीजेपी यानी कॉकरेज जनता पार्टी का आंदोलन शुरुआत में पारंपरिक राजनीतिक दलों से अलग एक युवा आंदोलन के रूप में सामने आया। इसका केंद्र परीक्षा व्यवस्था, कथित पेपर लीक और युवाओं की नाराजगी थी। नीट-यूजी परीक्षा से जुड़े विवाद के बाद यह आंदोलन लगातार बड़ा होता गया। युवाओं के बीच परीक्षा में कथित अनियमितताओं और व्यवस्था के खिलाफ नाराजगी पहले से थी। सीजेपी ने इसी गुस्से को संगठित आंदोलन का रूप दिया।
सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल से धीरे-धीरे यह आंदोलन सिर्फ परीक्षा तक सीमित नहीं रहा। इसमें युवाओं के भविष्य, जवाबदेही और सरकारी व्यवस्था पर सवाल उठने लगे। आंदोलन को सोशल मीडिया से भी बड़ी ताकत मिली और दिल्ली समेत कई जगहों पर इसका असर दिखाई दिया। प्रसिद्ध शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर 28 जून से 24 जुलाई 2026 तक लगातार 26 दिनों तक भूख हड़ताल की।
20 जुलाई का 'संसद चलो', यहीं से बदली कहानी
आंदोलन का सबसे बड़ा मोड़ 20 जुलाई को आया। सीजेपी के नेतृत्व में बड़ी संख्या में छात्र और युवा दिल्ली में संसद की ओर मार्च के लिए पहुंचे। प्रदर्शन के दौरान हालात बिगड़ गए और पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ। पुलिस कार्रवाई में कई लोग घायल हुए। पुलिस ने भी प्रदर्शनकारियों पर हिंसा और कानून व्यवस्था बिगाड़ने के आरोप लगाए। यहीं से छात्र आंदोलन एक बड़े राजनीतिक मुद्दे में बदल गया।
प्रदर्शनकारियों और विपक्ष ने आरोप लगाया कि छात्रों के खिलाफ जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया गया। आंसू गैस, लाठीचार्ज और पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए। पुलिस ने पैलेट गन के इस्तेमाल के आरोप से इनकार किया। हालांकि, घायल लोगों की तस्वीरों और आरोपों के बाद विवाद लगातार बढ़ता गया।
कांग्रेस ने आंदोलन के बाद संभाला राजनीतिक मोर्चा!
20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई के बाद कांग्रेस ने इस मुद्दे को खुलकर उठाया। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने घायल छात्रों से मुलाकात की और सरकार पर हमला बोला। इसके अगले दिन यानी 21 जुलाई को राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता प्रधानमंत्री आवास के बाहर पहुंच गए। यह विरोध पहले से तय बड़े कार्यक्रम की तरह नहीं था। कांग्रेस नेताओं ने सरकार को सीधे उसके सबसे बड़े राजनीतिक केंद्र पर घेरने की कोशिश की। कांग्रेस की मांगें सिर्फ पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं थीं। पार्टी ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे, संसद में चर्चा, छात्रों की बात सुनने और पुलिस कार्रवाई की जांच की मांग उठाई। सरकार की ओर से कहा गया कि नीट और संबंधित मुद्दों पर संसद में चर्चा के लिए तैयार हैं, लेकिन कांग्रेस और विपक्ष मंत्री के इस्तीफे की मांग पर अड़े रहे।
राहुल का पहला धरना: पीएम आवास के बाहर सरकार को सीधी चुनौती
21 जुलाई को राहुल गांधी का धरना राजनीतिक रूप से इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि वह सीधे प्रधानमंत्री के आवास के बाहर पहुंचे थे। राहुल और प्रियंका गांधी समेत कई नेताओं को बाद में पुलिस ने वहां से हटा दिया। दोनों को कुछ समय के लिए हिरासत में भी लिया गया। इस कार्रवाई ने कांग्रेस को सरकार पर एक और हमला करने का मौका दिया। राहुल गांधी ने छात्र आंदोलन को सिर्फ परीक्षा विवाद नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य और लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार से जोड़कर पेश किया।
सड़क से संसद तक पहुंचा मामला
21 जुलाई के बाद कांग्रेस और विपक्ष ने इस मुद्दे को संसद के भीतर भी जोरदार तरीके से उठाया। लोकसभा और राज्यसभा में नीट पेपर लीक, छात्र आंदोलन और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को लेकर लगातार हंगामा हुआ। विपक्षी सांसदों ने संसद परिसर में प्रदर्शन किया। 23 जुलाई को संसद के मकर द्वार पर विपक्षी नेताओं ने विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव और कई अन्य विपक्षी नेता शामिल हुए।
संसद के भीतर सरकार का कहना था कि वह चर्चा के लिए तैयार है। दूसरी तरफ विपक्ष का तर्क था कि पहले शिक्षा मंत्री की जवाबदेही तय होनी चाहिए। 24 जुलाई तक दोनों सदनों में गतिरोध बना रहा। विपक्षी सांसद शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग करते हुए नारेबाजी करते रहे और कई बार कार्यवाही बाधित हुई। यानी कांग्रेस ने सीजेपी के आंदोलन से उठे मुद्दे को सिर्फ सड़क पर नहीं छोड़ा। पार्टी ने उसे संसद के भीतर भी सरकार के खिलाफ राजनीतिक हथियार बना दिया।
फिर राहुल ने क्यों दिखाया घायल छात्र?
पुलिस कार्रवाई के बाद पैलेट गन के इस्तेमाल का आरोप इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील हिस्सा बन गया। दिल्ली पुलिस ने पैलेट गन इस्तेमाल करने के आरोप से इनकार किया। इसके बाद राहुल गांधी ने जुलाई में छात्र साहिल लोचव को मीडिया के सामने पेश किया और दावा किया कि वह प्रदर्शन के दौरान पैलेट से घायल हुआ था। राहुल गांधी ने उसके आंख में चोट लगने का मुद्दा उठाया और गृह मंत्री अमित शाह से जवाब मांगा कि छात्रों के खिलाफ इस तरह के बल प्रयोग की अनुमति किसने दी। यहीं से राहुल गांधी की राजनीति का फोकस थोड़ा बदल गया। पहले कांग्रेस का मुख्य हमला पेपर लीक, शिक्षा मंत्री की जवाबदेही और पुलिस कार्रवाई पर था। बाद में पैलेट गन का आरोप और घायल छात्रों को न्याय दिलाने का मुद्दा भी केंद्र में आ गया।
संसद का दबाव, सड़क का आंदोलन और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा
सीजेपी आंदोलन और विपक्ष के लगातार दबाव के बीच 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे को आंदोलन की बड़ी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में देखा गया। हालांकि, मंत्री के इस्तीफे के बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ। कांग्रेस और राहुल गांधी का कहना है कि छात्रों के खिलाफ हुई कथित पुलिस कार्रवाई और पैलेट गन के आरोप की जवाबदेही अलग मुद्दा है। यानी शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से परीक्षा व्यवस्था और राजनीतिक जवाबदेही का एक सवाल जरूर शांत हुआ, लेकिन 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई को लेकर विवाद बना रहा।
यह भी पढ़ें: थाने में राहुल गांधी का धरना: कांग्रेस नेता ने कहा- जब तक एफआईआर दर्ज नहीं होगी, यहां से नहीं हिलेंगे
एक महीने बाद फिर साहिल के साथ थाने पहुंचे राहुल गांधी
यही वजह है कि 21 अगस्त को राहुल गांधी फिर उसी मुद्दे को लेकर सड़क पर उतरे। इस बार उनके साथ 19 वर्षीय साहिल लोचव भी थे। राहुल गांधी उसकी शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज कराने की मांग लेकर पहले पुलिस अधिकारियों के पास पहुंचे। रिपोर्टों के अनुसार, साहिल और उसके वकीलों ने इससे पहले भी पुलिस से संपर्क किया था। इसके बाद राहुल गांधी उसके साथ संसद मार्ग पुलिस थाने पहुंचे और डीसीपी से मुलाकात की।
जब उनकी मांग पूरी नहीं हुई तो राहुल गांधी धरने पर बैठ गए। बाद में प्रियंका गांधी भी उनके साथ धरने में शामिल हुईं। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित पुलिस बर्बरता गंभीर मामला है और इसकी जांच तथा जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
पहले पीएम आवास, अब पुलिस थाना; राहुल की रणनीति कैसे बदली?
दोनों धरनों में सबसे बड़ा फर्क यही है। 21 जुलाई को राहुल गांधी का निशाना राजनीतिक था। वह प्रधानमंत्री आवास के बाहर सरकार से जवाब, संसद में चर्चा और शिक्षा मंत्री की जवाबदेही मांग रहे थे। 21 अगस्त को लड़ाई कानूनी कार्रवाई की मांग तक पहुंच गई। राहुल गांधी घायल छात्र को साथ लेकर पुलिस के पास पहुंचे और उसकी शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज करने की मांग करने लगे। यानी पहले धरने में राहुल गांधी सरकार पर राजनीतिक दबाव बना रहे थे। दूसरे धरने में वह उसी घटना को जवाबदेही और पुलिस कार्रवाई के कानूनी सवाल से जोड़ रहे हैं।
भाजपा ने क्या कहा?
इस बीच केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने कहा कि राहुल गांधी का धरना केवल सुर्खियों में बने रहने के लिए किया गया 'कैमरा केंद्रित ड्रामा' है। उन्होंने कहा कि इस प्रदर्शन का उद्देश्य न्याय की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि मीडिया का ध्यान आकर्षित करना है। नड्डा के मुताबिक, जब मामला पहले से सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में है, तब इस तरह का प्रदर्शन करने का कोई औचित्य नहीं है।
तो क्या सिर्फ संयोग है 21 जुलाई और 21 अगस्त की तारीख?
दोनों बार तारीख 21 होना एक दिलचस्प संयोग जरूर है, लेकिन इसके पीछे की राजनीति एक महीने में काफी बदल चुकी है। 21 जुलाई को राहुल गांधी सीजेपी के छात्र आंदोलन पर हुई पुलिस कार्रवाई के बाद विपक्षी मोर्चे के साथ प्रधानमंत्री आवास तक पहुंचे थे। उस समय लड़ाई छात्र आंदोलन, पेपर लीक, शिक्षा मंत्री की जवाबदेही और पुलिस कार्रवाई के खिलाफ थी।
एक महीने बाद शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हो चुका है, लेकिन अब सवाल सीधे उस कथित पुलिस कार्रवाई और घायल छात्र की शिकायत पर आ गया है। यानी सीजेपी के आंदोलन ने जिस मुद्दे को जन्म दिया था, कांग्रेस ने उसे पहले सड़क पर उठाया, फिर संसद तक पहुंचाया और अब राहुल गांधी उसे कानूनी जवाबदेही के सवाल तक ले आए हैं।