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Politics: राहुल गांधी के स्मार्ट राजनीतिक गेम से भाजपा के सामने चुनौती, हिंदुत्व से टकराएगा समाजवाद-जातिवाद

Thu, 10 Apr 2025 07:50 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Thu, 10 Apr 2025 07:50 PM IST
सार

गुजरात में 64 साल के बाद कांग्रेस के अधिवेशन में राहुल गांधी समेत दिग्गज कांग्रेस नेताओं ने भाजपा को आड़े हाथों लिया। कांग्रेस ने 12 पेज का प्रस्ताव भी पारित किया, जिसमें अलग-अलग मुद्दों पर सरकार को घेरने का प्रयास किया गया। सियासी गलियारों में कांग्रेस का यह अधिवेशन इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि राहुल ने समाजवाद और जातिवाद का मुद्दा लेकर राजनीतिक आंदोलन छेड़ने का प्रयास किया है। जातिगत जनगणना और आरक्षण के मुद्दे को भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति की काट के तौर पर भी देखा जा रहा है।

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Rahul Gandhi smart political game poses challenge to BJP socialism-casteism will clash with Hindutva
राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, सोनिया गांधी - फोटो : PTI

विस्तार

दलित, ओबीसी, ईबीसी, अल्पसंख्यक कांग्रेस के वोट थे, लेकिन 90 के दशक से पार्टी से छिटकने लगे। 35 वर्ष बाद कांग्रेस को इनकी याद आई है। जातिगत गणना की मांग करने वाले कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने अहमदाबाद से इसका समग्र राजनीतिक आंदोलन छेड़ दिया है। कांग्रेस के नेता इसे पूर्व अध्यक्ष का स्मार्ट राजनीतिक गेम बता रहे हैं। देखना है कि भाजपा के हिन्दुत्व से टकराकर राहुल का यह समाजवाद, जातिवाद कैसे सफल होता है?

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कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने साफ कहा कि उनके रुख में कोई बदलाव नहीं आने वाला। उन्होंने देश के 90 प्रतिशत लोगों के लिए खड़े होने की घोषणा कर दी। उन्होंने प्रधानमंत्री को सीधा मत्था टेकने वाला, कमजोर बताया और कांग्रेस के नेताओं को फिर बब्बर शेर की संज्ञा दे दी।
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संविधान को बचाने की बात कर रहे राहुल गांधी
कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे हैं। दलित जाति से आते हैं। राहुल गांधी संविधान को बचाने की बात करते हैं। इसके पीछे वह बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के संविधान और महात्मा गांधी, पटेल, नेहरू, कबीर, नानक आदि को आगे रखकर अपना पक्ष रख रहे हैं। वह इसके बहाने दलित, आदिवासी, ओबीसी, ईबीसी (आर्थिक रूप से कमजोर तबके) और अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के ऐजेंडा को आगे बढ़ा रहे हैं। राहुल ने मंच से बंगाल, तमिलनाडु, केरल जैसे क्षेत्रीय राज्यों और भाषा के मुद्दे को भी हवा दे दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को उद्योगपतियों की सरकार कहना जारी रखा और बेरोजगारी, किसानों की दयनीय हालत को धार देना जारी रखा है। आरएसएस और भाजपा की नीतियों पर जमकर हमला बोला।
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बुहत दिनों से कांग्रेस खोज रही है भाजपा के हिन्दुत्व के मुद्दे की काट
2014 के चुनाव का नतीजा आने के बाद से कांग्रेस का ध्यान लगातार भाजपा के हिन्दुत्व के मुद्दे की काट ढूंढने पर रहा है। राहुल गांधी का मंदिर जाना, साफ्ट हिन्दुत्व का प्रयोग इसी का हिस्सा रहा। कांग्रेस ने पिछले दस सालों में कई प्रयोग किए, लेकिन उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव 2022 में उसे रोशनी दिखाई दी। 2024 के लोकसभा चुनाव में उसका यह प्रयोग सफल रहा। समाजवादी पार्टी के साथ तालमेल में चुनाव लड़ी कांग्रेस ने संविधान बचाओ का नारा छेड़ा। पीडीए की लड़ाई को पार्टी ने आगे किया। नतीजे चौकाने वाले आए। उत्तर प्रदेश के पिछले दो चुनावों में भाजपा को जबरदस्त वोट और सीट मिली थीं। सहयोगी भी फायदे में रहे, लेकिन 2024 के चुनाव में भाजपा की सीटों की संख्या में बुरी तरह गिरावट आई। राहुल को पता है कि उत्तर प्रदेश में बसपा का कार्ड नहीं चल रहा है। बिहार के विधानसभा चुनाव में जातिवाद का मुद्दा हावी रहता है। इसलिए अब वह नए बदलाव के अभियान पर हैं। वह चाहते हैं कि कांग्रेस के कार्यकर्ता भाजपा को केवल समाज के 10 प्रतिशत लोगों की पार्टी होने का संदेश जनता तक ले जाए।  

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शरद यादव कहते थे धर्म की राजनीति का मुकाबला जाति ही कर सकती है
पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने 'मंडल आयोग' की राजनीति से देश की राजनीतिक तस्वीर बदल दी थी। जनता दल के पुराने नेता शरद यादव इसका जिक्र करने से नहीं चूकते थे। वीपी सिंह कहते थे कि 'कास्ट इज द क्रिस्टलाइजेशन आफ क्लास'। शरद यादव कहते थे कि इससे दुरुस्त बात और क्या हो सकती है? 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में शरद यादव की पहल पर महागठबंधन के बैनर तले नीतीश और लालू प्रसाद साथ आए थे। बिहार में भाजपा छोटे दलों के साथ मुख्य मुकाबले में थी। शरद यादव का कहना था कि जाति के सामने हिन्दुत्व का जोर नहीं चलेगा और डंके की चोट पर जीत हमारी है और इसके बाद जनता दल परिवार को अन्य राज्यों में जोड़कर भाजपा को सत्ता से बाहर किया जाएगा। चुनाव बाद सरकार महागठबंधन की ही बनी। हालांकि बाद में नीतीश कुमार के पलटी मारने के बाद शरद यादव का सपना अधूरा रह गया। राजद के नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं कि इस देश में धर्म निरपेक्षता से बड़ी कोई चीज नहीं है। समाजवाद का मंत्र बड़ा है। दबे, कुचले, पीड़ितों, वंचितों को उनका हक मिलना चाहिए। कांग्रेस के अधिवेशन से निकले संदेश के बाद माना जा रहा है कि अब इस कोर तबके में वह अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की राजनीतिक लड़ाई लड़ना चाहती है।

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