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काली कोठरी से बेदाग निकल गए रघुवंश प्रसाद सिंह

Sun, 13 Sep 2020 01:36 PM IST
Tanuja Yadav शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Tanuja Yadav Updated Sun, 13 Sep 2020 01:36 PM IST
सार

  • देश ने एक खांटी बिहारी, जमीनी नेता खो दिया
  • जाते-जाते बिहार की राजनीति में हड़कंप मचा गए सादगी के प्रतिमूर्ति रघुवंश प्रसाद सिंह

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Raghuvansh Prasad singh died at the age of 74 years its a demise for bihar election
पू्र्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

विस्तार

पूर्व केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह बिहार के कर्पूरी ठाकुर के अनुयायी, ठेठ, सादगी, ईमानदारी की प्रतिमूर्ति, जमीनी और ज्ञानी नेता थे। पिछले 32 साल से राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के साथ खुद को झोंक देने वाले रघुवंश प्रसाद ने अंतिम समय में महज दो लाइन लिखकर अपना साथ छोड़ दिया।

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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र लिखकर अपने कोमल भावों का इजहार करके वह बिहार की राजनीति में जाते-जाते हड़कंप मचा गए। रघुवंश प्रसाद ने लालू और नीतीश को ऐसे समय में चिट्ठी लिखी जब कुछ ही महीने बाद राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं।
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रघुवंश प्रसाद का जाना बहुत दु:खद है। संसद में भी वह यूपीए सरकार के मंत्री, सांसद के तौर पर अलहदा दिखते थे। संवाद और कार्यशैली में गजब की ठेठैती भरी ठसक थी। ग्रामीण विकास मंत्रालय का जब उनके पास पदभार था तो कई बार रघुवंश बाबू से मिलना हुआ। कई बार देखने में आया की जमीनी समझ, आंकड़ों की बारीकियां और व्यावहारिक दृष्टिकोण के आगे मंत्रालय के सचिव और अधिकारियों का ज्ञान धरा का धरा रह जाता था।
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काली कोठरी में रहकर नहीं लगा कोई दाग
जनता दल के तमाम नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे लेकिन दुधिया सफेद खद्द के कपड़े के शौकीन रघुवंश बाबू पर एक भी छींटा नहीं लग पाया। 74 साल के रघुवंश प्रसाद ने 1977 में अपने राजनैतिक करियर को धार दी थी।

वह विधायक बने और कर्पूरी ठाकुर के मंत्रिमंडल में ऊर्जामंत्री का पदभार संभाला। इसके बाद से रघुवंश प्रसाद ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। केंद्र सरकार में भी तीन बार केंद्रीय मंत्री बने। उन्हें मनरेगा को आधुनिक ढांचा देने का शिल्पी माना जाता है।

शिक्षा से गणितज्ञ, डॉक्टरेट के उपाधिधारी रघुवंश को सही माने में ग्रामीण विकास और भारतीय कृषि व्यवस्था के जानकारों में गिना जाता है। कृषि भवन में कई अधिकारी यह कहते हुए पाए जाते थे कि भले ही रघुवंश बाबू दिल्ली में हैं लेकिन उन्हें पता रहता है कि मोतिहारी, वैशाली, दरभंगा, पटना से लेकर राजगीर तक का किसान कितना पसीना बहा रहा है।

बिहार की राजनीति में मचा गए हड़कंप
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अगली पारी खेलने के लिए गोटियां बिछा रहे हैं तो लालू प्रसाद यादव राजनीति में अपना वजूद कायम रखने की लड़ाई लड़ रहे हैं। नीतीश के सामने आगामी विधानसभा चुनाव जहां प्रतिष्ठा का प्रश्न बनने वाला है, वहीं लालू के लिए राजनैतिक अस्तिव बचाने में अहम रहने वाला है।

ऐसे में रघुवंश प्रसाद का दोनों नेताओं को अलग-अलग एजेंडे पर लिखा पत्र मायने रखता है। यह लालू प्रसाद के लिए जहां निजी क्षति है, वहीं नीतीश कुमार के लिए उनके अंतिम सांस लेने के मायने हैं। इसे दोनों नेताओं के पत्रों से सहज समझा जा सकता है।

इलाज के लिए एम्स, दिल्ली में प्रवेश करने से पहले रघुवंश प्रसाद ने 32 साल के साथ की याद दिलाते हुए लालू प्रसाद से क्षमा मांग ली। इस्तीफा दे दिया। जवाब में लालू प्रसाद ने पत्र लिखकर कहा कि आप कहीं नहीं जा रहे हैं। पहले इलाज कराइए। लालू का पत्र कई पंक्तियों का है, लेकिन यह पत्र रघुवंश प्रसाद से आत्मीयता का बोध कराता है।


खांटी बिहारी, ठेठ भाषा, सादा जीवन, सच्ची ईमानदारी
जनप्रतिनिधि की कोई परिभाषा गढऩी हो तो रघुवंश बाबू का जीवन चरित्र पर्याप्त है। धोती, कुर्ता, मारकीन की देशी गंजी से खद्दर की गंजी। पैर में साधारण सा चप्पल। बातचीत का लहजा बिल्कुल ठेठ दिहाती। कुछ ऐसे रहे रघुवंश बाबू। गणित जैसे विषय में पीएचडी।

जमीनी धरातल का अच्छे तरीके से ज्ञान रखने वाले लेकिन योग्यता का रुआब नहीं। कोई घमंड नहीं। रघवंश बाबू की जीवन शैली ऐसी थी कि दूर से जानने वाला कई बार उन्हें अनपढ़ दिहाती समझने की गलती कर जाता था। संसद में राष्ट्रीय जनता दल के कार्यालय में एक बार बहुत कुरेदने पर उन्होंने 1996-97 में केंद्रीय मंत्री रहने के दौरान अपना अनुभव बताया था। रघुवंश बाबू के अनुसार लोगों को उनके साथ धोखा हो जाता था।

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