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विधानसभा चुनाव: मिशन में कामयाब रहे कैप्टन व शाह, यूपी में बदली हवा, सिद्धू को नहीं बनने दिया पंजाब का सीएम

Thu, 10 Mar 2022 04:57 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Thu, 10 Mar 2022 04:57 PM IST
सार

कैप्टन ने अपने वादे के मुताबिक न तो कांग्रेस की सरकार बनने दी और न ही नवजोत सिंह सिद्धू को मुख्यमंत्री बनने का मौका दिया। सिद्धू तो पंजाब में कांग्रेस के खलनायक बन गए हैं।

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Punjab, UP, Uttarakhand, Manipur, Goa Assembly Election results Captain Amarinder Singh and Amit Shah's mission succeeded
गृह मंत्री अमित शाह व कैप्टन अमरिंदर सिंह। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

पंजाब के पूर्व मुख्यमंंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह अपने मिशन में कामयाब हैं। पटियाला से चुनाव हारकर भी कैप्टन ने अपने वादे के मुताबिक न तो कांग्रेस की सरकार बनने दी और न ही नवजोत सिंह सिद्धू को मुख्यमंत्री बनने का मौका दिया। सिद्धू तो पंजाब में कांग्रेस के खलनायक बन गए हैं। दूसरा बड़ा मिशन केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने संभाला था। छह मार्च को पार्टी मुख्यालय में उन्होंने साफ कहा था कि पंजाब में दावा नहीं करते, लेकिन चार राज्यों (उ.प्र., उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर) में अपने दम पर सरकार बनाने जा रहे हैं। अमित शाह का यह आत्मविश्वास एक्जिट पोल के नतीजे के पहले दिखाई दिया था।

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उ.प्र. विधानसभा चुनाव-2022 एक मायने में और चौंका रहा है। पिछली बार 19 सीटें जीतने वाली बसपा इस बार महज एक सीट जीतती हुई दिख रही है। जबकि कांग्रेस पार्टी  का भी वही हाल नजर आ रहा है। पिछली बार सात सीटें पाने वाली कांग्रेस दो से आगे बढ़ती नहीं दिख रही है। भाजपा के अंदरखाने में भी बसपा को लेकर आ रहे रुझान पर चर्चा है। कुल मिलाकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पांच साल बाद दूसरी बार सत्ता में वापसी कर रहे हैं। इस चुनाव में गोरक्षपीठाधीश्वर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बुल्डोजर बाबा का उपनाम भी मिल गया है। योगी आदित्यनाथ यह रिकार्ड केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह की चुनाव प्रचार की रणनीति के बूते बना रहे हैं। अमित शाह ने चुनाव आचार संहिता के लागू होने के तत्काल बाद स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान के पार्टी छोड़ देने पर पार्टी प्रचार की कमान अपने हाथ में ले ली थी।
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चौथे चरण के बाद प्रधानमंत्री ने संभाली थी चुनाव प्रचार की कमान
भाजपा का चुनाव प्रचार तीन चरण तक केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह, योगी आदित्यनाथ और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के भरोसे चल रहा था। अमित शाह ने कैराना से घर-घर दस्तक देकर चुनाव प्रचार में जान डाली। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 10 मार्च बाद गर्मी शांत हो जाने वाले बयान ने खूब सुर्खियां बटोरी। चुनाव प्रचार में योगी आदित्यनाथ बुल्डोजर बाबा के रूप में प्रचारित ही नहीं हुए, बल्कि उनकी जनसभा में भी बुल्डोजर तक को लाकर खड़ा किया गया। उ.प्र. विधानसभा चुनाव प्रचार का सुखद अंत प्रधानमंत्री ने सातवें चरण में बनारस में रोड शो करके किया। अब भाजपा उ.प्र., उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में सरकार बनाने जा रही है। जबकि पंजाब में आम आदमी पार्टी की सुनामी चली है। जहां कांग्रेस के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी दोनों विधानसभा सीट से, मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा पाले नवजोत सिंह सिद्धू अमृतसर से, शिरोमणि अकालीदल के प्रकाश सिंह बादल लांबी से और कैप्टन अमरिंदर सिंह पटियाला से चुनाव हार रहे हैं।  
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उत्तराखंड: दो रावतों के आखिरी दौर की लड़ाई में रह गई कांग्रेस
उत्तराखंड में भी राजनीतिक लड़ाई काफी रोचक रही। भाजपा के रणनीतिकारों ने छह महीने के भीतर मुख्यमंत्री का तीन चेहरा बदल दिया। कांग्रेस से भाजपा में गए दिग्गज नेता हरक सिंह रावत को भी भाजपा ने पार्टी विरोधी गतिविधियों को देखकर निष्कासित कर दिया। लेकिन पार्टी के अंदरुनी घमासान ने कांग्रेस को न केवल पंजाब में बुरी तरह पटखनी देकर चित कर दिया, बल्कि उत्तराखंड में सरकार बनने के सपने पर पूरी तरह से पानी फेर दिया। कांग्रेस के एक महासचिव तो कहते हैं कि आखिर में दो रावतों के टकराव ने भी भारी नुकसान करा दिया। न हरक सिंह रावत के पार्टी में आने का फायदा मिल पाया और न ही हरीश रावत का मान रखने को पार्टी भुना सकी। उत्तराखंड के एक बड़े कांग्रेस नेता पांच मार्च को ही अमर उजाला से कहा था कि राज्य में हम भाजपा से नहीं, अपनों से हार रहे हैं।


राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, जयंत चौधरी को राजनीतिक भविष्य के लिए सोचना होगा
कांग्रेस पार्टी के किसी भी नेता से पूछ लिजिए कि पंजाब, गोवा, उत्तराखंड में हार के लिए कौन जिम्मेदार है? कांग्रेस के राज्यसभा में नेताजी तपाक से जबाव देते हैं कि दो के सिवा (राहुल गांधी और प्रियंका) आखिर कौन हो सकता है? नाम न छापने की शर्त पर एक पूर्व महासचिव का कहना है कि पंजाब में कांग्रेस ने जो प्रयोग किया था, उस पर उसे पश्चाताप करना चाहिए। इससे ज्यादा अब कुछ कहने की गुंजाइश नहीं है। जिस तरह से, जिन कारणों से कैप्टन हटाए गए और उन्हें हटाने के लिए जो तरीका, समय चुना गया, उसे कहीं से भी तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता। पार्टी के वरिष्ठ नेता ने कहा कि विधानसभा चुनाव-2022 ने राष्ट्रीय लोकदल को भी बड़ा अवसर दिया था। ऋषि पाल सिंह भी कहते हैं कि इस बार पश्चिम उ.प्र. चौधरी जयंत सिंह के साथ था, लेकिन जयंत ने जिस तरह से सूझ-बूझ दिखाई, उसका नतीजा सामने है। तमाम सीटों पर प्रत्याशियों के चयन और समाजवादी पार्टी से सीटों के समझौते तथा बंटवारे ने उनके भी राजनीतिक भविष्य पर भी बड़ा ग्रहण लगा दिया है।

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