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पंजाब-गोवा: चुनाव में ‘आप’ की ईमानदार राजनीति पर अपनों ने ही क्यों उठाए सवाल? अलग सियासत करने का दावा क्या पीछे छूट गया?

Fri, 24 Dec 2021 02:14 PM IST
Pratibha Jyoti प्रतिभा ज्योति
Updated Fri, 24 Dec 2021 02:14 PM IST
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सार
आम आदमी पार्टी आम वर्ग की राजनीतिक अभिव्यक्ति, उसकी आकांक्षाओं और उम्मीद का प्रतीक मानी गई। एक ऐसी पार्टी जो भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े किए गए आंदोलन से निकली, जिसने विकास को राजनीति का मॉडल बनाया क्या वह भी परंपरागत राजनीति के ढर्रे पर है?  
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punjab assembly election and goa assembly election 2022 why question raises on honest politics of aam aadmi party  former AAP leader and senior journalist Ashutosh accuses AAP of wasting money in elections
आप में शामिल होते आशुतोष (फाइल फोटो) - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

दिल्ली में कामयाबी से अपनी सरकार चलाने के बाद आम आदमी पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के विस्तार में जुटी है। इसी सिलसिले में पार्टी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और पंजाब में भी विधानसभा चुनाव लड़ रही है। पंजाब में वह पहले ही प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका में है और पार्टी को उम्मीद है कि पंजाब में भी वह इस बार सत्ता हासिल करने में सफल होगी। पार्टी गोवा में भी बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कर रही है।


हालांकि साफ-सुथरी राजनीति का दावा करने वाले आम आदमी पार्टी पर पंजाब और गोवा में पैसे बांटने का आरोप लगा है। यह आरोप किसी और ने नहीं बल्कि किसी वक्त आप के संयोजक रहे अरविंद केजरीवाल के करीबी  वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष ने लगाए हैं। आशुतोष ने ट्वीट करते हुए लिखा है कि एक समय में जनता से पैसे मांगने वाली आम आदमी पार्टी जिस कदर गोवा और पंजाब चुनावों में पैसे फेंक रही है वो हैरतअंगेज है। 


आम आदमी पार्टी पर आशुतोष का यह आरोप उस समय लगा जब चार दिसंबर को खुद केजरीवाल ने गोवा में यह आरोप लगाया कि पार्टियों ने गोवा में पैसे के दम पर चुनाव जीता है।  उन्होंने कहा कि गोवा बदलाव चाहता है। विधायकों की खरीद-फरोख्त करने वाली पार्टियों का समय गया। गंदी राजनीति का वक्त लद चुका है। गोवा विकास चाहता है और ईमानदार राजनीति चाहता है। 
 

आप के पूर्व नेता आशुतोष
आप के पूर्व नेता आशुतोष - फोटो : फाइल फोटो
इससे पहले भी आशुतोष कर चुके हैं विरोध
हालांकि यह पहली बार नहीं है आशुतोष ने आम आदमी पार्टी पर सवाल उठाया हो। उन्होंने इससे पहले भी अरविंद केजरीवाल को तीसरी बार पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक बनाए जाने को लेकर हैरत जताई थी। उन्होंने तब  ट्वीट करते हुए कहा ' इस देश में लोकतंत्र होगा कैसे?  आम आदमी पार्टी को देश को दिशा दिखानी थी। लेकिन परंपरागत दलों जैसी ही निकली। क्या अरविंद केजरीवाल की जगह नया नेशनल कन्वीनर बनता तो उनकी ताकत कम हो जायेगी या डर है कि दूसरा पार्टी पर कब्जा कर लेगा?'

अलग तरह की राजनीति का दावा पीछे छूट गया? 
आम आदमी पार्टी में पहले रह चुके अरविंद केजरीवाल के एक अन्य साथी के मुताबिक आप गोवा और पंजाब में जाकर देख लीजिए, लोगों से बात कीजिए, तस्वीर साफ हो जाएगी। अलग तरह की राजनीति का दावा करने वाली पार्टी पंरपरागत पार्टियों की तरह हो गई। वह उसी रास्ते पर चल रही है जिसे कोस-कोस कर आप यहां तक पहुंची हैं। अभी तक बस चुनाव में पैसा बहाना बांकी था, वो भी अब हो रहा है।

उनका कहना है, 'पार्टी गोवा और पंजाब में जितना ज्यादा पैसा खर्च कर रही है वह केवल चंदे से इकट्ठा नहीं किया जा सकता। दूसरी बात केजरीवाल ने मुख्य रूप से अपने भ्रष्टाचार विरोधी और विकास एजेंडे के कारण दिल्ली में समर्थकों के एक वर्ग पर जीत हासिल की थी, लेकिन बात चाहे चुनाव में पैसा झोंकने की बात हो या हिंदुत्व की ओर पार्टी का झुकाव सब चौंकाने वाला है।'
 

पंजाब में अरविंद केजरीवाल (फाइल फोटो)
पंजाब में अरविंद केजरीवाल (फाइल फोटो) - फोटो : PTI (File Photo)
पांच साल में कितना पैसा आया पार्टी इसका हिसाब दे
पार्टी छोड़ चुके एक और अन्य नेता भी आशुतोष की बात से सहमत नजर आते हैं। उनके मुताबिक दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 2017 के चुनाव में दावा किया था कि उनकी ‘ईमानदार’ पार्टी के पास पंजाब और गोवा में विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए पैसे नहीं हैं। उन्होंने यहां तक कहा था कि हमारा बैंक खाता खाली है। पांच साल में ऐसा क्या हो गया कि उनके पास इतना पैसा आ गया कि वे पंजाब के अलावा गोवा, यूपी और उत्तराखंड में भी विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। पार्टी को यह हिसाब देना चाहिए कि पांच साल में उसके पास कितना पैसा आया है? 

पंजाब में चुनाव की जरूरतें ही पूरी नहीं हो पा रहीं
पंजाब में आम आदमी पार्टी का काम देख रहे एक नेता के मुताबिक ‘आशुतोष ने जो भी कहा है वे उनके अपने विचार हैं। आप बिना सबूतों के जो चाहे आरोप लगा सकते हैं। ये सभी जानते हैं कि पार्टी का कामकाज लोगों से मिलने वाले चंदा से चलता है। चंदा से चलने वाली पार्टी चुनावों में बहाने के लिए पैसा कहां से लाएगी? यहां तो हम चुनाव की मूलभूत जरूरतों के लिए भी बजट की कमी से जूझ रहे हैं। कई जरुरतों में कटौती करनी पड़ रही है।'

अरविंद केजरीवाल
अरविंद केजरीवाल - फोटो : Twitter @AamAadmiParty
आरोप का प्रमाण क्या? 
पार्टी के अन्य नेता के मुताबिक यदि पार्टी चुनाव में पैसे बांट रही है तो आरोप लगाने वाले नेता के पास इसका प्रमाण भी होगा। हो सकता है वे महिलाओं के लिए किए गए चुनावी वादों को पैसा बांटना समझ रहे हों। जनता से वादा करना महिलाओं की जेब में कुछ पैसे रखना यह गलत तो नहीं। उन्होंने कहा ‘दरअसल साथ छोड़ने वाले नेताओं ने सोचा था कि पार्टी दिल्ली तक ही सिमट तक रह जाएगी, अब जब वे देख रहे हैं कि पार्टी का विस्तार हो रहा है तो पार्टी छोड़ने का दुख उन्हें सता रहा है, इसलिए इस तरह के आरोप लग रहे हैं।’ 

'आप' पर कई बार लग चुके हैं आरोप
आम आदमी पार्टी चंदों के दम पर सियासत में उतरी। पार्टी बनाने के वक्त आम आदमी पार्टी ने अपनी वेबसाइट पर 11.5 करोड़ रुपए के चंदे का ब्योरा दिया था। 2015 के विधानसभा चुनाव में पार्टी लोगों से अपील करती थी और उनके खाते में अच्छा खासा चंदा आ जाता था। केजरीवाल ने डिनर के जरिए भी चंदा जुटाया। उनके साथ साथ आप के सभी प्रत्याशी भी चंदा जुटाने के लिए लंच-डिनर कार्यक्रम आयोजित लगे।

चुनाव आयोग में आम आदमी पार्टी को ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक 2019-20 में पार्टी को लोगों और संस्थाओं से करीब साढ़े 37 करोड़ रुपये से अधिक का चंदा मिला। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पार्टी कोष में करीब 12 बार 10-10 हजार रुपये का योगदान दिया।

 'आप' पर कई बार यह आरोप लग चुके हैं उसने कानून को ताक पर रखकर विदेशों से फंड इकट्ठा किया था। हालांकि, 'आप' हमेशा कहती रही कि वह जांच के लिए तैयार है। इसी साल सितंबर में आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया गया कि नरेंद्र मोदी सरकार ने जांच एजेंसी का इस्तेमाल करते हुए पार्टी को प्रवर्तन निदेशालय को नोटिस भेजा है। 

शाजिया इल्मी
शाजिया इल्मी - फोटो : ट्विटर
कथनी और करनी में फर्क आने लगा इसलिए साथियों ने छोड़ा साथ
अरविंद केजरीवाल की नेतृत्व वाली पार्टी ने 2015 में 70 सीटों वाली दिल्ली विधानसभा में 67 सीटें जीतकर राज्य में सत्ता बरकरार रखने की कोशिश की थी। लेकिन, पांच साल के उनके सफर में कई साथियों ने साथ छोड़ दिया या वे बाहर कर दिए गए।

आशुतोष जन आंदोलन से निकले आम आदमी पार्टी की सरोकार और साफ-सुथरी राजनीति से प्रभावित होकर पत्रकारिता छोड़कर 2014 में पार्टी में शामिल हुए थे। उन्हें 2014 का लोकसभा चुनाव भाजपा के हर्षवर्धन के खिलाफ चांदनी चौक से लड़ा थे, लेकिन वे हार गए थे। बाद में धीरे-धीरे वे आम आदमी पार्टी से दूर होते गए। 2018 में उन्होंने पार्टी छोड़ दी और पत्रकारिता में वापसी की। 

आप के सह-संस्थापकों में से एक शाजिया इल्मी ने मई 2014 में यह कहते हुए पार्टी छोड़ दी कि वह अपने मूल मूल्यों से भटक गई है। बाद में वह भाजपा में शामिल हो गईं। वहीं सह-संस्थापकों में से एक अन्य नेता योगेंद्र यादव को मार्च 2015 में पार्टी विरोधी गतिविधियों  के कारण पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। बाद में उन्होंने चुनावी राजनीति में ईमानदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही लाने के मिशन के साथ एक अलग पार्टी 'स्वराज इंडिया' की स्थापना की।

कुमार विश्वास
कुमार विश्वास - फोटो : twitter.com/DrKumarVishwas
छूटे साथी बारी-बारी
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील 2012 में आप में इस उम्मीद के साथ शामिल हुए कि यह पार्टी भ्रष्टाचार से मुक्त होगी। हालांकि, उन्हें भी योगेंद्र यादव के साथ पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया था। बाद में प्रशांत भूषण ने खुद को राजनीति से दूर कर लिया।

इसी तरह कवि से नेता बने कुमार विश्वास ने भी आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल के साथ कथित मतभेदों के कारण खुद को पार्टी से दूर कर लिया। पार्टी के पूर्व नेता कपिल मिश्रा ने जब सीएम केजरीवाल और दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए खुद को दो करोड़ रुपये के घोटाले का चश्मदीद गवाह भी बताया तो आप की राजनीतिक मामलों की समिति पीएसी ने कपिल मिश्रा को मई 2017 में निलंबित कर दिया। इसी तरह किसी न किसी वजह से अल्का लांबा और अंजलि दमानिया भी पार्टी से दूर हो गईं। 
 
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