फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   profile of sarbananda sonowal

सर्बानंद सोनोवाल, वो चेहरा जिसने पांच साल में बदल दी भाजपा की किस्मत

Thu, 19 May 2016 06:27 PM IST
Updated Thu, 19 May 2016 06:27 PM IST
विज्ञापन
profile of sarbananda sonowal

पांच राज्यों के चुनावों में देशभर में सबसे ज्यादा निगाहें असम के चुनावों पर ही टिकी हुई थी। वजह भी खास थी, देश की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा की पहली बार पूर्वोत्तर में पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनने की उम्‍मीद जो की जा रही थी। 

विज्ञापन


चुनावी सर्वेक्षण भी इस बात का दावा कर रहे ‌थे और राजनीतिक पंडित भी। लेकिन कम ही लोग जानते होंगे कि जम्‍मू कश्मीर के बाद सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले राज्य में अगर भाजपा सरकार बनाने का दावा कर रही थी तो उसके पीछे एक ऐसे शख्स का नाम था जिसने पांच साल में असम में भाजपा के लिए सारे समीकरण ही पलट कर रख दिए। 
विज्ञापन


वो नाम था सर्बानंद सोनोवाल का, पार्टी के लिए उनकी अहमियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि लोकसभा चुनावों के बाद तमाम चुनाव मोदी के चेहरे पर लड़ने वाली भाजपा ने असम में उनके लिए सारी रणनीति बदल दी। 
विज्ञापन
विज्ञापन


चुनाव प्रबंधन की सारी जिम्मेदारी तो सोनोवाल को दी ही गई उन्हें मुख्यमंत्री उम्‍मीदवार घोषित करने में भी देर नहीं लगाई। ये सोनोवाल की लोकप्रियता और चुनावी कौशल का ही परिणाम है कि पिछले चुनाव में मात्र 5 सीट जीतने वाली भाजपा इस बार पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाती दिख रही है। 

स्‍थानीय कछारी समुदाय (आदिवासी) से आने वाले सोनोवाल का राजनीति में सफर एक जननेता का रहा है। 31 अक्टुबर 1962 में डिब्रूगढ़ में जन्मे सोनोवाल ने राजनीतिक जीवन की शुरूआत छात्र राजनीति से की और असम में काफी प्रभावी आल असम स्‍टूडेंट यूनियन का दामन थामकर आगे बढ़े। 

1992 से 1999 तक वह आसु के प्रदेश अध्यक्ष रहे। साल 2000 में आसु से वह असम गण परिषद में आ गए। 2001 में हुए विधानसभा चुनावों में बेशक उनकी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई लेकिन मोरन सीट से जीत दर्ज कर सोनोवाल पहली बार विधानसभा पहुंच गए।

घुसपैठ मुद्दे पर आंदोलन से बनी जातीय नायक की छवि

profile of sarbananda sonowal

अपनी जुझारू छवि और लोकप्रिय चेहरे के चलते सोनोवाल असम की राजनी‌ति में तेजी से आगे बढ़े और 2004 में हुए लोकसभा चुनावों में डिब्रूगढ़ सीट से पूर्व केन्द्रीय मंत्री पवन घाटोवर को हराकर लोकसभा पहुंच गए। 

इसके बाद असम की राजनीति में तेजी से बदलाव हुआ। राज्य में जहां कांग्रेस का जबरदस्त उभार हुआ वहीं उनकी पार्टी अगप और उसके मुखिया प्रफुल्ल महंत हाशिये पर चले गए। इसका असर सोनोवाल पर भी हुआ और वह भी नेपथ्य में पहुंच गए। 

इसी बीच असम में ‌बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ को लेकर विवादित आईएमडीटी एक्ट पर बहस शुरू हो गई। इस मुद्दे पर उनका अपनी पार्टी से विवाद हो गया। सोनोवाल ने आईएमडीटी एक्ट के विरोध में जबरदस्त आंदोलन चलाया जिससे असम में उनकी छवि एक जातीय नायक की बन गई। 

वह इसके विरोध में सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गए जहां 2005 में इस कानून को निरस्त कर दिया गया। असम की सबसे बड़ी समस्या भी बांग्लादेशी घुसपैठ को माना जाता है जिससे स्‍थानीय लोगों को हमेशा अपनी पहचान खोने का डर सताता रहा है। 

इसी मुद्दे को सोनोवाल ने भावनात्मक तौर आगे बढ़ाया। दूसरी ओर साल 2011 में उनका अपनी पार्टी से विवाद ज्यादा बढ़ गया जिसके बाद उन्होंने अगप को अलविदा कहकर भाजपा का दामन थाम लिया। 

असम में बढ़े और प्रभावी चेहरे की कमीं से जूझ रही भाजपा ने सोनोवाल को हाथों हाथ लिया और उन्हें पहले राज्य में पार्टी का महासचिव और ‌फिर 2012 में अध्यक्ष बना दिया गया। इसके बाद से ही राज्य में भाजपा के समीकरण तेजी से बदलने शुरू हो गए।

सोनोवाल के नेतृत्व में लगातार असम में बढ़ी भाजपा

profile of sarbananda sonowal

साल 2014 के चुनावों में वह लखीमपुर सीट से जीतकर खुद तो दूसरी बार लोकसभा पहुंचे ही उनके नेतृत्व में पार्टी ने सबसे ज्यादा 36.86 फीसदी वोट बटोरकर सात सीटों पर कब्जा जमाया। 

प्रधानमंत्री मोदी ने जब उन्हें अपने मंत्रीमंडल में जगह देकर खेल एंव युवा मामलों का महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंपा तो कुछ लोगों को आश्चर्य जरूर हुआ लेकिन राजनीतिक पंडित मानते हैं कि मोदी असम के लिए सोनोवाल की अहमियत को अच्छी तरह समझते थे। 

इसके बाद पार्टी ने असम को पूरी तरह सोनोवाल के हवाले ही कर दिया। जनवरी में उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्‍मीदवार घोषित कर दिया गया। सोनोवाल को आगे करने के परिणाम भी बेहतर रहे जब फरवरी में हुए निकाय चुनावों में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन कर कांग्रेस को पछाड़ दिया। 

असम के कुल 34 बोर्ड में से बीजेपी ने 23 बोर्डों पर कब्जा जमाया तो 42 टाउन कमेटियों के 477 वार्डों में से 269 कमेटियों पर भी पार्टी ने जीत दर्ज की। सोनोवाल का पार्टी में हैसियत का अंदाजा इससे भी लगा सकते हैं कि देशभर में मोदी के नाम पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा ने उनके लिए राज्य में अपनी सारी  रणनीति को बदल दिया। 

सत्ता विरोधी लहर से जूझ रहे तरुण गोगोई के सामने सोनोवाल को मुख्यमंत्री उम्‍मीदवार तो बनाया ही गया पूरा चुनाव भी उनके चेहरे पर लड़ा गया। यहां प्रधानमंत्री मोदी की चुनावी रैलियों के बजाय सोनोवाल और स्‍थानीय नेताओं की रैलियों को तरजीह दी गई। बदली रणनीति के परिणाम भी पूरी तरह अनुकूल रहे और पूर्वोत्तर में पहली बार कमल खिलने की राह तैयार हो गई।

खास बात ये है कि सर्बानंद आज तक कुंआरे हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि 'राजनीतिक व्यस्तता और असम की जनता के लिए  संघर्ष के कारण्‍ा उन्हें खुद के बारे में सोचने का मौका ही नहीं मिला।' शायद जीवन के इस दौर में आकर उन्हें खुद के बारे में सोचने का मौका मिल जाए।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed