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Supreme Court: लोक सेवकों पर केस चलाने के लिए पूर्व मंजूरी जरूरी, पीएमएलए संबंधित मामलों में 'सुप्रीम' आदेश
Thu, 07 Nov 2024 05:49 AM IST
शुभम कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शुभम कुमार
Updated Thu, 07 Nov 2024 05:49 AM IST
सार
मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी किया है। जिसमें कहा गया है कि सरकारी कर्तव्य निभाने के दौरान मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में लोक सेवकों के खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले पूर्व मंजूरी लेनी होगी।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारी कर्तव्य निभाने के दौरान मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में लोक सेवकों के खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले पूर्व मंजूरी लेनी होगी।जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें तेलंगाना हाईकोर्ट के एक फैसले को चुनौती दी गई थी।
हाईकोर्ट ने आंध्र प्रदेश सरकार के दो वरिष्ठ नौकरशाहों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों पर ईडी की अभियोजन शिकायत पर संज्ञान लेने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया था। पीठ ने न्यायाधीशों और लोक सेवकों के अभियोजन से संबंधित सीआरपीसी की धारा 197(1) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 218 के अनुरूप) का उल्लेख किया।
पीठ ने कहा कि यह धारा कहती है, जब कोई व्यक्ति जो न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट या लोक सेवक है या था, जिसे सरकार की मंजूरी के बिना उसके पद से हटाया नहीं जा सकता, उस पर किसी ऐसे अपराध का आरोप लगाया जाता है जो उसके द्वारा अपने पदीय कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते समय या कार्य करने का प्रकल्पना करते समय किया गया है, तो कोई भी न्यायालय पूर्व मंजूरी के बिना ऐसे अपराध का संज्ञान नहीं लेगा।
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ईमानदार और निष्ठावान अधिकारियों की सुरक्षा के लिए प्रावधान
पीठ ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 197 (1) का उद्देश्य लोक सेवकों को अभियोजन से बचाना है और यह सुनिश्चित करता है कि अपने कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान उनके खिलाफ कोई मुकदमा न चलाया जाए। यह प्रावधान ईमानदार और निष्ठावान अधिकारियों की सुरक्षा के लिए है। हालांकि, यह सुरक्षा बिना किसी शर्त के नहीं है। संबंधित सरकार से पूर्व मंजूरी लेकर उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है। इसके साथ ही पीठ ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 197(1) के उद्देश्य पर विचार करते हुए इसके अमल तब तक खारिज नहीं किया जा सकता।
ईडी की दलील को नहीं माना
पीठ ने माना कि धारा के प्रावधान धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा 44(1)(बी) के तहत दायर शिकायत पर लागू थे, जबकि ईडी की इस दलील को खारिज कर दिया कि पीएमएलए की धारा 71 का अन्य कानूनों के प्रावधानों पर अधिभावी प्रभाव था।
एजेंसी का तर्क
एजेंसी ने तर्क दिया था कि पीएमएलए के उद्देश्य पर विचार करते हुए, सीआरपीसी की धारा 197(1) के तहत मंजूरी प्राप्त करने की आवश्यकता पीएमएलए की धारा 71 के साथ असंगत होगी। हालांकि, पीठ ने कहा कि पीएमएलए की धारा 65 के तहत सीआरपीसी के प्रावधान पीएमएलए के तहत सभी कार्यवाहियों पर लागू होते हैं, बशर्ते कि वे धन शोधन विरोधी कानून के साथ असंगत न हों।
क्या है पूरा मामला
ईडी ने लोक सेवकों बिभु प्रसाद आचार्य और आदित्यनाथ दास की याचिका पर हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। मामले में प्रतिवादी आईएएस अधिकारी बिभु प्रसाद आचार्य के खिलाफ भूमि आवंटन में आधिकारिक पद का दुरुपयोग करने, संपत्तियों का कम मूल्यांकन करने और अनुचित रियायत देने के आरोप हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने कथित तौर पर आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी से जुड़ी निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाया था। इससे सरकार को बड़े पैमाने पर वित्तीय नुकसान हुआ।
बता दें कि ईडी ने आरोप लगाया कि आचार्य ने इन लेन-देन को सुविधाजनक बनाने के लिए प्रमुख हस्तियों के साथ साजिश रची। जानकारी के अनुसार हाईकोर्ट में दी गई अपनी अर्जी में आचार्य ने तर्क दिया था कि उन्होंने आधिकारिक क्षमता के तहत ही कार्य किया है और उनके खिलाफ मुकदमे और अभियोजन के लिए सीआरपीसी की धारा 197 के तहत सरकार की पूर्व मंजूरी आवश्यक है।
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हाईकोर्ट ने आंध्र प्रदेश सरकार के दो वरिष्ठ नौकरशाहों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों पर ईडी की अभियोजन शिकायत पर संज्ञान लेने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया था। पीठ ने न्यायाधीशों और लोक सेवकों के अभियोजन से संबंधित सीआरपीसी की धारा 197(1) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 218 के अनुरूप) का उल्लेख किया।
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पीठ ने कहा कि यह धारा कहती है, जब कोई व्यक्ति जो न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट या लोक सेवक है या था, जिसे सरकार की मंजूरी के बिना उसके पद से हटाया नहीं जा सकता, उस पर किसी ऐसे अपराध का आरोप लगाया जाता है जो उसके द्वारा अपने पदीय कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते समय या कार्य करने का प्रकल्पना करते समय किया गया है, तो कोई भी न्यायालय पूर्व मंजूरी के बिना ऐसे अपराध का संज्ञान नहीं लेगा।
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ईमानदार और निष्ठावान अधिकारियों की सुरक्षा के लिए प्रावधान
पीठ ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 197 (1) का उद्देश्य लोक सेवकों को अभियोजन से बचाना है और यह सुनिश्चित करता है कि अपने कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान उनके खिलाफ कोई मुकदमा न चलाया जाए। यह प्रावधान ईमानदार और निष्ठावान अधिकारियों की सुरक्षा के लिए है। हालांकि, यह सुरक्षा बिना किसी शर्त के नहीं है। संबंधित सरकार से पूर्व मंजूरी लेकर उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है। इसके साथ ही पीठ ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 197(1) के उद्देश्य पर विचार करते हुए इसके अमल तब तक खारिज नहीं किया जा सकता।
ईडी की दलील को नहीं माना
पीठ ने माना कि धारा के प्रावधान धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा 44(1)(बी) के तहत दायर शिकायत पर लागू थे, जबकि ईडी की इस दलील को खारिज कर दिया कि पीएमएलए की धारा 71 का अन्य कानूनों के प्रावधानों पर अधिभावी प्रभाव था।
एजेंसी का तर्क
एजेंसी ने तर्क दिया था कि पीएमएलए के उद्देश्य पर विचार करते हुए, सीआरपीसी की धारा 197(1) के तहत मंजूरी प्राप्त करने की आवश्यकता पीएमएलए की धारा 71 के साथ असंगत होगी। हालांकि, पीठ ने कहा कि पीएमएलए की धारा 65 के तहत सीआरपीसी के प्रावधान पीएमएलए के तहत सभी कार्यवाहियों पर लागू होते हैं, बशर्ते कि वे धन शोधन विरोधी कानून के साथ असंगत न हों।
क्या है पूरा मामला
ईडी ने लोक सेवकों बिभु प्रसाद आचार्य और आदित्यनाथ दास की याचिका पर हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। मामले में प्रतिवादी आईएएस अधिकारी बिभु प्रसाद आचार्य के खिलाफ भूमि आवंटन में आधिकारिक पद का दुरुपयोग करने, संपत्तियों का कम मूल्यांकन करने और अनुचित रियायत देने के आरोप हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने कथित तौर पर आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी से जुड़ी निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाया था। इससे सरकार को बड़े पैमाने पर वित्तीय नुकसान हुआ।
बता दें कि ईडी ने आरोप लगाया कि आचार्य ने इन लेन-देन को सुविधाजनक बनाने के लिए प्रमुख हस्तियों के साथ साजिश रची। जानकारी के अनुसार हाईकोर्ट में दी गई अपनी अर्जी में आचार्य ने तर्क दिया था कि उन्होंने आधिकारिक क्षमता के तहत ही कार्य किया है और उनके खिलाफ मुकदमे और अभियोजन के लिए सीआरपीसी की धारा 197 के तहत सरकार की पूर्व मंजूरी आवश्यक है।