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Supreme Court: 'युवा जीवन की कीमत और परिवार की पीड़ा की भरपाई पैसे नहीं कर सकते', मुआवजे पर 'सुप्रीम' टिप्पणी
Tue, 23 Jun 2026 07:47 PM IST
Pavan
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: Pavan
Updated Tue, 23 Jun 2026 07:47 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने दिल्ली में साल 2013 में सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले 20 वर्षीय युवक के माता-पिता को दिए गए मुआवजे में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा- किसी युवा जीवन की कीमत और उसके परिवार की पीड़ा को पैसों में पूरी तरह नहीं आंका जा सकता।
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सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तार वकील को तुरंत रिहा करने के आदेश दिए
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि मोटर वाहन अधिनियम (एमवी एक्ट) के तहत दिए जाने वाले 'उचित मुआवजे' का सिद्धांत केवल गणितीय आंकड़ों पर आधारित नहीं होता, बल्कि यह उन लोगों को कुछ हद तक राहत और सांत्वना देने का प्रयास है, जिन्होंने अपूरणीय क्षति झेली है। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने दिल्ली में वर्ष 2013 में सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले 20 वर्षीय युवक के माता-पिता को दिए गए मुआवजे में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। युवक चार्टर्ड अकाउंटेंसी (सीए) फाइनल की पढ़ाई कर रहा था और उसके उज्ज्वल भविष्य की संभावना थी।
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मुआवजे के निर्धारण पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में मुआवजे का निर्धारण केवल सूखे गणितीय आंकड़ों के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके पीछे मानवीय संवेदनाएं और परिवार की पीड़ा भी जुड़ी होती है। अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य किसी व्यक्ति के जीवन का सटीक आर्थिक मूल्य तय करना नहीं, बल्कि पीड़ित परिवार को यथासंभव न्याय दिलाना है। यह फैसला दिल्ली हाईकोर्ट के अगस्त 2022 के उस निर्णय के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनाया गया, जिसमें मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी) द्वारा दिए गए 81.21 लाख रुपये के मुआवजे को बरकरार रखा गया था। मृतक के माता-पिता ने अपने बेटे की असमय मौत के बाद मुआवजे की मांग करते हुए याचिका दायर की थी।
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'माता-पिता की क्षति का सही आर्थिक मूल्यांकन संभव नहीं'
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिकरण ने मृतक की शैक्षणिक प्रगति, पेशेवर संभावनाओं और सीए बनने की संभावना को ध्यान में रखते हुए उसकी मासिक आय 55,500 रुपये आंकी थी। यह आकलन केवल रिकॉर्ड पर उपलब्ध स्टाइपेंड के आधार पर नहीं, बल्कि उसके संभावित करियर और भविष्य की कमाई को ध्यान में रखकर किया गया था। पीठ ने कहा कि मृतक एक ऐसे युवा छात्र थे, जो अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत करने वाले थे। ऐसे में केवल तकनीकी आधार पर मुआवजा कम करना न्याय के उद्देश्य को पूरा नहीं करेगा। अदालत ने माना कि माता-पिता की क्षति का सही-सही आर्थिक मूल्यांकन संभव नहीं है और दिया गया मुआवजा उचित मुआवजे की सीमा से बाहर नहीं जाता।
'परिवार की पीड़ा को पैसों में नहीं आंका जा सकता'
अदालत ने यह भी कहा कि मुआवजा तय करते समय यह मान लेना उचित नहीं होगा कि किसी युवा को भविष्य में निश्चित रूप से असाधारण पेशेवर सफलता मिलती। साथ ही, उसकी तुलना अन्य सफल पेशेवरों के वेतनमान से भी नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी युवा जीवन की कीमत और उसके परिवार की पीड़ा को पैसों में पूरी तरह नहीं आंका जा सकता। इसलिए उचित मुआवजा का निर्धारण पूर्ण गणितीय सटीकता के साथ संभव नहीं है।
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परिजन अतिरिक्त मुआवजे के हकदार- सुप्रीम कोर्ट
पीठ ने यह भी माना कि मृतक अविवाहित था, इसलिए उसके माता-पिता 'फिलियल कंसोर्टियम' (संतान के स्नेह और साथ के नुकसान) के तहत अतिरिक्त मुआवजे के हकदार हैं। अदालत ने दोनों माता-पिता को 40-40 हजार रुपये अतिरिक्त देने का आदेश दिया। इसके साथ ही कुल मुआवजा राशि 81,21,900 रुपये से बढ़ाकर 82,01,900 रुपये कर दी गई। यह राशि अधिकरण द्वारा निर्धारित ब्याज के साथ अदा की जाएगी।
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मुआवजे के निर्धारण पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में मुआवजे का निर्धारण केवल सूखे गणितीय आंकड़ों के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके पीछे मानवीय संवेदनाएं और परिवार की पीड़ा भी जुड़ी होती है। अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य किसी व्यक्ति के जीवन का सटीक आर्थिक मूल्य तय करना नहीं, बल्कि पीड़ित परिवार को यथासंभव न्याय दिलाना है। यह फैसला दिल्ली हाईकोर्ट के अगस्त 2022 के उस निर्णय के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनाया गया, जिसमें मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी) द्वारा दिए गए 81.21 लाख रुपये के मुआवजे को बरकरार रखा गया था। मृतक के माता-पिता ने अपने बेटे की असमय मौत के बाद मुआवजे की मांग करते हुए याचिका दायर की थी।
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'माता-पिता की क्षति का सही आर्थिक मूल्यांकन संभव नहीं'
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिकरण ने मृतक की शैक्षणिक प्रगति, पेशेवर संभावनाओं और सीए बनने की संभावना को ध्यान में रखते हुए उसकी मासिक आय 55,500 रुपये आंकी थी। यह आकलन केवल रिकॉर्ड पर उपलब्ध स्टाइपेंड के आधार पर नहीं, बल्कि उसके संभावित करियर और भविष्य की कमाई को ध्यान में रखकर किया गया था। पीठ ने कहा कि मृतक एक ऐसे युवा छात्र थे, जो अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत करने वाले थे। ऐसे में केवल तकनीकी आधार पर मुआवजा कम करना न्याय के उद्देश्य को पूरा नहीं करेगा। अदालत ने माना कि माता-पिता की क्षति का सही-सही आर्थिक मूल्यांकन संभव नहीं है और दिया गया मुआवजा उचित मुआवजे की सीमा से बाहर नहीं जाता।
'परिवार की पीड़ा को पैसों में नहीं आंका जा सकता'
अदालत ने यह भी कहा कि मुआवजा तय करते समय यह मान लेना उचित नहीं होगा कि किसी युवा को भविष्य में निश्चित रूप से असाधारण पेशेवर सफलता मिलती। साथ ही, उसकी तुलना अन्य सफल पेशेवरों के वेतनमान से भी नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी युवा जीवन की कीमत और उसके परिवार की पीड़ा को पैसों में पूरी तरह नहीं आंका जा सकता। इसलिए उचित मुआवजा का निर्धारण पूर्ण गणितीय सटीकता के साथ संभव नहीं है।
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परिजन अतिरिक्त मुआवजे के हकदार- सुप्रीम कोर्ट
पीठ ने यह भी माना कि मृतक अविवाहित था, इसलिए उसके माता-पिता 'फिलियल कंसोर्टियम' (संतान के स्नेह और साथ के नुकसान) के तहत अतिरिक्त मुआवजे के हकदार हैं। अदालत ने दोनों माता-पिता को 40-40 हजार रुपये अतिरिक्त देने का आदेश दिया। इसके साथ ही कुल मुआवजा राशि 81,21,900 रुपये से बढ़ाकर 82,01,900 रुपये कर दी गई। यह राशि अधिकरण द्वारा निर्धारित ब्याज के साथ अदा की जाएगी।