चीन से बड़ी उम्मीद लेकर वुहान से लौट आए प्रधानमंत्री मोदी
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कुछ महीने पहले तक चीन के संबंध को लेकर बना संस्पेंस अब उम्मीद में बदल गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वुहान में राष्ट्रपति शी जिन पिंग के साथ दो दिन बिताकर बड़ी उम्मीद के साथ लौटें हैं। इस उम्मीद की चमक चीन के पीपुल्स डेली में साफ दिखाई दे रही हैं।
दो दिन का साथ, चार प्रतिनिधि मंडल स्तरीय वार्ता, सात मुलाकातें और नौ घंटे साथ समय बिताना। वह भी चीन जैसे देश के राष्ट्रपति के साथ। काफी मायने रखता है। समझा जा रहा है कि इस उम्मीद का पहला टेस्ट करीब डेढ़ महीने बाद संघाई सहयोग संगठन(एससीओ) के शिखर सम्मेलन के दौरान होगा।
विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी को उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति जिनपिंग के बीच हुई अनौपचारिक मुलाकात की औपचारिकता जून महीने में एससीओ बैठक के दौरान दिखाई पड़नी चाहिए। फिलहाल अभी नई दिल्ली के सूत्र इसे दोनों देशों के बीच आपसी समझ बढ़ाने, सहयोग और विश्वास के कदम उठाने तथा टकराव कम करने की उम्मीद के रूप में देख रहे हैं।
खुद राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी भारत और चीन के अच्छे पड़ोसी देश होने के साथ अच्छे मित्र होने पर जोर दिया है। पूर्व विदेश सचिव सलमान हैदर को भी वुहान शहर में हुई अनौपचारिक बातचीत से काफी उम्मीदें हैं।
विजय गोखले और अजीत डोभाल
डोकलाम विवाद से लेकर अनौपचारिक बातचीत की यात्रा तक (एक वर्ष से कम समय में) भारत और चीन के रिश्ते ने कई उतार-चढ़ाव का दौर देखा। चीन ने जहां भारत के साथ खुले तौर पर युद्ध की धमकी दे दी थी, वहीं भारत ने एक बार भी धैर्य नहीं खोया।
चीन में भारत के राजदूत और अब विदेश सचिव विजय गोखले, तत्कालीन विदेश सचिव एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने इसे काफी गहराई से लिया। केवल डोकलाम विवाद पर स्थिति को सामान्य स्तर पर बनाए रखने के लिए ही दोनों देशों के राजनियकों, अधिकारियों के बीच 36 से अधिक बैठकें हुई।
इसका एक बड़ा श्रेय मौजूदा विदेश सचिव विजय गोखले को जाता है। गोखले कभी नाउम्मीद नहीं हुए। डोकलाम विवाद जब चरम पर था, तब वह चीन में भारत के राजदूत थे।
गोखले को चीन मामलों का विशेषज्ञ माना जाता है। पूर्व विदेश सचिव सलमान हैदर समेत गोखले के कई करीबी उनकी क्षमताओं से बखूबी वाकिफ हैं। सरल स्वभाव के कूटनीति में माहिर गोखले दूरदर्शी रणनीति के लिए जाने जाते हैं। अनौपचारिक वार्ता के फ्रेमवर्क को इसी का हिस्सा माना जा रहा है।
विदेश मामलों के जानकार फिलहाल इसे बड़ी कामयाबी मान रहे हैं। चीन के राष्ट्रपति का प्रोटोकाल तोड़कर दो दिन तक भारत के प्रधानमंत्री के साथ वुहान शहर में इस तरह से समय बिताना कोई सामान्य बात नहीं है।
चीन भी तैयार है
पूर्व विदेश सचिव सलमान हैदर भारत और चीन के शिखर नेताओं के बीच में हुई बैठक को जहां एक कूटनीतिक कामयाबी मान रहे हैं, वहीं उनको उम्मीद है कि जून में प्रधानमंत्री की चीन की यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कुछ समझौते होंगे।
हैदर का कहना है कि चीन के राष्ट्रपति जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी के साथ दिखाई दिए हैं, उससे चीन भी दुनिया को संदेश देता हुआ दिखाई दे रहा है। वह बताना चाह रहा है कि भारत के साथ मधुर, मैत्रीपूर्ण रिश्तों का पक्षधर है।
चीन ने इसके लिए लगातार कोशिश की है। चीन के राष्ट्रपति जताना चाह रहे हैं कि वह आगे बढ़ रहे हैं। दोनों देशों के बीच में अभी तक जो भी तनाव के मुद्दे रहे हों, वह उसे किनारे रखकर विश्वास बहाली को अहमियत दे रहे हैं। सलमान हैदर का कहना है कि इसे अच्छी शुरुआत के रुप में देखा जाना चाहिए।
जिओपालिटिक्स लाई साथ
चीन और भारत को साथ लाने में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की संरक्षण वादी नीति की काफी अहम भूमिका रही है। पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह के अनुसार इसके चलते दुनिया के समीकरण बदल रहे हैं।
भारत और चीन भी ऐसी स्थिति में साथ आने की अहमियत को महसूस कर रहे हैं। इसकी शुरुआत प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्पति शी जिनपिंग के बीच अनौपचारिक भेंट-मुलाकात और बातचीत से हो रही है।
यह काफी सफल रही है। इसका अच्छी नतीजा आएगा। नटवर सिंह का कहना है कि इससे सीमा पर शांति होगी, संबंधों में तनाव कम होंगे, डोकलाम जैसे विवाद फिलहाल ठंडे बस्ते में चले जाएंगे। दोनों देशों के बीच में तिजारत बढ़ेगी। बुनियादी तौर पर दोनों नेताओं की मुलाकात में कोई दिखावा नहीं है, बल्कि यह समय की जरूरत है।