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PM Modi: पूर्व ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एबॉट बोले- पीएम मोदी ने खुद पर सत्ता के अहंकार को हावी नहीं होने दिया

Fri, 13 Mar 2026 11:16 PM IST
Devesh Tripathi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली/कैनबरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली/कैनबरा Published by: Devesh Tripathi Updated Fri, 13 Mar 2026 11:16 PM IST
सार

एबॉट ने भारत के लोकतांत्रिक ढांचे पर सवाल उठाने वाले आलोचकों को जवाब देते हुए कहा कि भारत को तानाशाही देश कहना पूरी तरह से बकवास है। उन्होंने तर्क दिया कि जिस देश में स्वतंत्र चुनाव, मुखर मीडिया और निष्पक्ष न्यायपालिका हो, वहां लोकतंत्र कभी खतरे में नहीं हो सकता।

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Prime Minister Modi did not allow arrogance of power to dominate him said former Australian PM Tony Abbott
टोनी एबॉट, पूर्व ऑस्ट्रेलियाई पीएम - फोटो : ANI

विस्तार

ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी एबॉट ने कहा है कि एक दशक से अधिक समय तक सत्ता में रहने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता के अहंकार को खुद पर हावी नहीं होने दिया है। वे ऐसे नेता हैं, जो न केवल नेतृत्व करते हैं, बल्कि दूसरों को सुनने में भी गर्व महसूस करते हैं।
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टोनी एबॉट ने शुक्रवार को भारत के प्रमुख भू-राजनीतिक सम्मेलन रायसीना डायलॉग की जमकर सराहना की। इस दौरान उन्होंने विशेष रूप से पीएम मोदी के नेतृत्व शैली की प्रशंसा करते हुए कहा कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली नेताओं में से एक होने के बावजूद पीएम मोदी में सुनने का धैर्य और सीखने की विनम्रता है। एबॉट ने एक खुले पत्र में लिखा कि पीएम मोदी उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि को सुनने के लिए खुद मौजूद रहते हैं, लेकिन भाषण नहीं देते।
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जहां स्वतंत्र चुनाव और निष्पक्ष न्यायपालिका, वहां तानाशाही का खतरा नहीं
एबॉट ने भारत के लोकतांत्रिक ढांचे पर सवाल उठाने वाले आलोचकों को जवाब देते हुए कहा कि भारत को तानाशाही देश कहना पूरी तरह से बकवास है। उन्होंने तर्क दिया कि जिस देश में स्वतंत्र चुनाव, मुखर मीडिया और निष्पक्ष न्यायपालिका हो, वहां लोकतंत्र कभी खतरे में नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि कोई भी तानाशाह देश ऐसे वैश्विक सम्मेलन की मेजबानी नहीं कर सकता, जहां हर मुद्दे पर बेबाक चर्चा हो और कोई भी विषय प्रतिबंधित न हो।
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दावोस और चीन से बेहतर बताया मंच
एबॉट ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर को इस आयोजन का सूत्रधार बताते हुए कहा कि रायसीना डायलॉग अब स्विट्जरलैंड के दावोस और चीन के बोआओ फोरम से भी बेहतर मंच बन चुका है। उनके अनुसार यहां चर्चाएं केवल औपचारिकता या मेजबान सरकार की प्रशंसा तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि कठिन सत्ता और आर्थिक शक्ति के वास्तविक संतुलन पर आधारित होती हैं।

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