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Study: बच्चों की लंबाई-वजन मापने के नियम बदलने की तैयारी, गर्भावस्था से पांच साल तक के बच्चों पर होगा अध्ययन
Wed, 17 Dec 2025 04:57 AM IST
नितिन गौतम
परीक्षित निर्भय, अमर उजाला ब्यूरो
परीक्षित निर्भय, अमर उजाला ब्यूरो
Published by: नितिन गौतम
Updated Wed, 17 Dec 2025 04:57 AM IST
सार
आईसीएमआर के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने कहा कि भारतीय परिस्थितियों पर आधारित ग्रोथ स्टैंडर्ड तैयार होने से कुपोषण की पहचान और इलाज अधिक प्रभावी हो सकेगा। अभी कई बार अंतरराष्ट्रीय मानकों के कारण बच्चों को जरूरत से ज्यादा कमजोर या सामान्य से अधिक वजन वाला बताया जाता है।
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बच्चों की सेहत को लेकर होगा अध्ययन
- फोटो : फ्रीपिक
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विस्तार
भारतीय बच्चों की सेहत और विकास को बेहतर ढंग से समझने के लिए अब उनकी लंबाई और वजन के नए नियम बनाए जाएंगे। ताकि उनका शारीरिक विकास देश की सामाजिक, पोषण और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप किया जा सकेगा। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने बड़े राष्ट्रीय अध्ययन की तैयारी की है। इसमें गर्भावस्था से पांच वर्ष तक के बच्चों को शामिल किया जाएगा।
आईसीएमआर का कहना है कि फिलहाल बच्चों के विकास को मापने के लिए जिन मानकों का उपयोग किया जाता है, वे अधिकतर अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों पर आधारित हैं। कई बार ये मानक भारतीय बच्चों के लिए पूरी तरह उपयुक्त साबित नहीं होते, जिससे कुपोषण या सामान्य विकास को लेकर भ्रम की स्थिति बनती है। नए मानक तैयार होने से बच्चों की सेहत का आकलन सटीक तरीके से हो सकेगा। उदाहरण के तौर पर भारत में अभी डॉक्टर 2006 के मानकों पर गर्भ में शिशु के विकास का आकलन करते हैं जिन्हें विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जारी किया। गर्भावस्था के 33 वें सप्ताह में एक औसत भ्रूण का वजन लगभग दो से 2.16 किलोग्राम और लंबाई लगभग 44-44.1 सेंटीमीटर होनी चाहिए जबकि कई मामलों में भारतीय महिलाओं की गर्भावस्था में यह पैमाना सटीक नहीं बैठता। इस शोध में शामिल परिवार के बच्चे और मां के स्वास्थ्य की नियमित निगरानी के अलावा समय-समय पर विशेषज्ञ सलाह, बच्चे के विकास से जुड़ी सही और भरोसेमंद जानकारी मिलेगी।
गर्भावस्था से बचपन तक विकास पर नजर
अध्ययन केवल बच्चे के जन्म के बाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गर्भावस्था के दौरान मां की सेहत और पोषण को भी शामिल करेगा। विशेषज्ञ यह समझने की कोशिश करेंगे कि गर्भावस्था के समय मां का खान-पान, स्वास्थ्य और जीवनशैली बच्चे की लंबाई-वजन और समग्र विकास को कैसे प्रभावित करती है।
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स्वास्थ्य योजनाओं को मिलेगा वैज्ञानिक आधार
आईसीएमआर के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने कहा कि भारतीय परिस्थितियों पर आधारित ग्रोथ स्टैंडर्ड तैयार होने से कुपोषण की पहचान और इलाज अधिक प्रभावी हो सकेगा। अभी कई बार अंतरराष्ट्रीय मानकों के कारण बच्चों को जरूरत से ज्यादा कमजोर या सामान्य से अधिक वजन वाला बताया जाता है। नए मानकों से आंगनबाड़ी सेवाएं, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रम, पोषण अभियान और सरकारी योजनाएं को वैज्ञानिक और व्यावहारिक आधार मिलेगा, जिससे संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा।
ये भी पढ़ें- FSSAI Special Drive: दूध-पनीर में मिलावट की बढ़ती शिकायतों पर सख्ती, सभी राज्यों में चलेगा विशेष जांच अभियान
गोपनीय रखी जाएगी जानकारी
इस अध्ययन को सफल बनाने के लिए आईसीएमआर ने गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों के माता-पिता से भागीदारी की अपील की है। शोध में शामिल परिवारों को यह भरोसा दिया है कि उनकी सभी जानकारियां पूरी तरह गोपनीय रखी जाएंगी और अध्ययन से किसी तरह का जोखिम नहीं होगा। पोस्टर और जागरूकता अभियानों के जरिए बताया जा रहा है कि शोध में शामिल होने वाले बच्चों और माताओं की नियमित स्वास्थ्य जांच की जाएगी।
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आईसीएमआर का कहना है कि फिलहाल बच्चों के विकास को मापने के लिए जिन मानकों का उपयोग किया जाता है, वे अधिकतर अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों पर आधारित हैं। कई बार ये मानक भारतीय बच्चों के लिए पूरी तरह उपयुक्त साबित नहीं होते, जिससे कुपोषण या सामान्य विकास को लेकर भ्रम की स्थिति बनती है। नए मानक तैयार होने से बच्चों की सेहत का आकलन सटीक तरीके से हो सकेगा। उदाहरण के तौर पर भारत में अभी डॉक्टर 2006 के मानकों पर गर्भ में शिशु के विकास का आकलन करते हैं जिन्हें विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जारी किया। गर्भावस्था के 33 वें सप्ताह में एक औसत भ्रूण का वजन लगभग दो से 2.16 किलोग्राम और लंबाई लगभग 44-44.1 सेंटीमीटर होनी चाहिए जबकि कई मामलों में भारतीय महिलाओं की गर्भावस्था में यह पैमाना सटीक नहीं बैठता। इस शोध में शामिल परिवार के बच्चे और मां के स्वास्थ्य की नियमित निगरानी के अलावा समय-समय पर विशेषज्ञ सलाह, बच्चे के विकास से जुड़ी सही और भरोसेमंद जानकारी मिलेगी।
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गर्भावस्था से बचपन तक विकास पर नजर
अध्ययन केवल बच्चे के जन्म के बाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गर्भावस्था के दौरान मां की सेहत और पोषण को भी शामिल करेगा। विशेषज्ञ यह समझने की कोशिश करेंगे कि गर्भावस्था के समय मां का खान-पान, स्वास्थ्य और जीवनशैली बच्चे की लंबाई-वजन और समग्र विकास को कैसे प्रभावित करती है।
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स्वास्थ्य योजनाओं को मिलेगा वैज्ञानिक आधार
आईसीएमआर के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने कहा कि भारतीय परिस्थितियों पर आधारित ग्रोथ स्टैंडर्ड तैयार होने से कुपोषण की पहचान और इलाज अधिक प्रभावी हो सकेगा। अभी कई बार अंतरराष्ट्रीय मानकों के कारण बच्चों को जरूरत से ज्यादा कमजोर या सामान्य से अधिक वजन वाला बताया जाता है। नए मानकों से आंगनबाड़ी सेवाएं, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रम, पोषण अभियान और सरकारी योजनाएं को वैज्ञानिक और व्यावहारिक आधार मिलेगा, जिससे संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा।
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गोपनीय रखी जाएगी जानकारी
इस अध्ययन को सफल बनाने के लिए आईसीएमआर ने गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों के माता-पिता से भागीदारी की अपील की है। शोध में शामिल परिवारों को यह भरोसा दिया है कि उनकी सभी जानकारियां पूरी तरह गोपनीय रखी जाएंगी और अध्ययन से किसी तरह का जोखिम नहीं होगा। पोस्टर और जागरूकता अभियानों के जरिए बताया जा रहा है कि शोध में शामिल होने वाले बच्चों और माताओं की नियमित स्वास्थ्य जांच की जाएगी।