बेहतर अनुभव के लिए एप चुनें।
INSTALL APP

कुरुक्षेत्र: शांत रहने वाले प्रशांत किशोर आखिर क्यों हुए आक्रामक

Vinod Agnihotri विनोद अग्निहोत्री
Updated Sat, 26 Dec 2020 07:31 PM IST
विज्ञापन
प्रशांत किशोर
प्रशांत किशोर - फोटो : फाइल
ख़बर सुनें
पश्चिम बंगाल के राजनीतिक घमासान में अब सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और उसे चुनौती दे रही केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने एक दूसरे पर हमले तेज कर दिए हैं। इसकी ताजा कड़ी में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के बंगाल दौरे को राष्ट्रीय मीडिया में मिले अत्याधिक प्रचार को चुनौती देता हुआ तृणमूल कांग्रेस के चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर का ट्वीट भी खासा चर्चा में है। इसमें उन्होंने दावा किया है कि भाजपा नेताओं के दौरों का मीडिया चाहे कितना भी जरूरत से ज्यादा प्रचार करे लेकिन पश्चिम बंगाल में भाजपा दहाई के आंकड़े में ही सिमट कर रह जाएगी।
विज्ञापन


अगर ऐसा नहीं हुआ तो वह चुनावी रणनीतिकार का काम छोड़ देंगे। इसके जवाब में भाजपा के पश्चिम बंगाल प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने तंज कसते हुए कहा कि चुनावों के बाद देश को एक चुनाव रणनीतिकार खोना पड़ेगा।



दोनों खेमों के अपने अपने दावे हैं और उन दावों के आधार हैं। भाजपा नेता और कार्यकर्ता 2019 में मिली आशातीत सफलता से उत्साहित हैं तो तृणमूल को अपनी नेता मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जमीनी पकड़ और बंगाल अस्मिता की उनकी छवि पर भरोसा है। लेकिन इन चुनावों के पहले की राजनीतिक परिस्थितियों का आकलन करने के लिए कुछ जमीनी तथ्यों पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। अप्रैल 2016 के विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने राज्य की कुल 294 सीटों में से 44.91 मत प्रतिशत के साथ 211 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत प्राप्त किया था और अब उसे चुनौती देने वाली भाजपा को 10.16 फीसदी मत प्रतिशत के साथ महज तीन सीटें मिली थीं।


जबकि कांग्रेस ने 12.25 मत प्रतिशत के साथ 44 और कभी राज्य में 34 सालों तक एकछत्र शासन करने वाले वाम मोर्चा ने 19.75 मत प्रतिशत के साथ 28 सीटें जीती थीं। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को राज्य में अपना प्रभाव विस्तार करने में जबर्दस्त कामयाबी मिली। पार्टी न सिर्फ राज्य की कुल 42 लोकसभा सीटों में से 18 सीटों पर कब्जा किया बल्कि उसका मत प्रतिशत भी बढ़कर 40 फीसदी हो गया। जबकि 22 सीटें जीतने वाली तृणमूल कांग्रेस का मत प्रतिशत खासा गिर गया। लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस और वाम मोर्चे को हुआ जिनके जनाधार का बहुत बड़ा हिस्सा खिसक कर भाजपा की तरफ चला गया। लोकसभा चुनावों के नतीजों से उत्साहित भाजपा ने बंगाल में पूरी ताकत झोंक दी है।

विजयवर्गीय की टिप्पणी
भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय लोकसभा चुनावों के भी काफी पहले से बंगाल में सक्रिय हैं। लोकसभा चुनावों में जिस तरह भाजपा ने आक्रामक तरीके से चुनाव प्रचार किया था और उसके नतीजे भी आए। इससे बंगाल में लड़ाई अब सीधे तृणमूल कांग्रेस बनाम भाजपा हो गई है। भाजपा ने तृणमूल के विधायकों और नेताओं को तोड़ने में भी खासी कामयाबी पाई है। विधानसभा चुनावों से ठीक पहले तृणमूल के बेहद मजबूत नेता माने जाने और ममता सरकार में ताकतवर मंत्री शुभेंदु अधिकारी और कुछ विधायकों का भाजपा में जाना कोलकाता से लेकर दिल्ली तक भाजपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं का हौसला बढ़ा रहा है।

राजनीतिक हिंसा बंगाल की सियासत का एक ऐसा पहलू है जिसके आरोपों की जद में हर सत्ताधारी दल आता रहा है और यह एक मुद्दा भी बनता रहा है। कभी सिद्धार्थ शंकर रे के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सरकार के कार्यकाल में भी पुलिस और सत्ताधारी दल पर राजनीतिक हिंसा के आरोप लगे और उसके बाद वाम मोर्चे की सरकार बनी। करीब 34 वर्षों तक राज्य में निर्बाध शासन करने वाले वाम मोर्चा की अगुआ पार्टी माकपा के कैडरों पर राज्य में अपने विरोधियों के खिलाफ हिंसा और हत्या के आरोप लगातार लगते रहे। यहां तक कि खुद ममता बनर्जी इसे एक बड़ा मुद्दा बनाकर सत्ता में पहुंची थीं।

अब उसी तर्ज पर तृणमूल कांग्रेस हिंसा और राजनीतिक हत्याओं के आरोपों के घेरे में है और भाजपा इसे चुनावी मुद्दा बना रही है। हाल ही में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के दौरे के दौरान उनके काफिले पर हुए हमले ने मामला और गरमा दिया। इस हमले के बाद भाजपा बेहद हमलावर हो गई और केंद्र सरकार ने राज्य के तीन अधिकारियों को केंद्र में बुलाने का आदेश दिया। लेकिन राज्य सरकार ने उस पर अमल करने से मना कर दिया है। इससे केंद्र और राज्य के संबंधों में भी तनाव और बढ़ गया है। राज्यपाल जगदीप धनखड़ की सक्रियता भी ममता को लगातार असहज कर रही है।

राष्ट्रपति शासन की चर्चा
इसी बीच भाजपा द्वारा राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग पर ममता बनर्जी ने चुनौती दी कि अगर केंद्र में हिम्मत है तो राष्ट्रपति शासन लगाकर दिखाएं बंगाल की जनता उसका जवाब देगी। लेकिन भाजपा ने अपना दबाव बढ़ाते हुए गृह मंत्री अमित शाह को मैदान में उतारा और शाह के दो दिन के बंगाल दौरे से राज्य की सियासत बेहद गर्म हो गई। शाह ने ही शुभेंदु अधिकारी और उनके समर्थकों को भाजपा में शामिल किया।

इसका जवाब देते हुए तृणमूल कांग्रेस की स्थानीय इकाई ने अधिकारी के गढ़ कांथी में एक विशाल रैली की। जवाब में शुभेंदु अधिकारी जिनके भाई और पिता तृणमूल सांसद हैं, ने अपने क्षेत्र में रोड शो किया। इस बीच अपने दल में सेंधमारी रोकने के लिए तृणमूल के संकट प्रबंधक सक्रिय हुए और पश्चिम बंगाल भाजपा युवा मोर्चे की पत्नी ने भाजपा छोड़कर तृणमूल का दामन थाम लिया। भाजपा की तरफ चल चुके तृणमूल नेता जितेंद्र तिवारी वापस तृणमूल में लौट आए। कुल मिलाकर शह और मात का यह खेल लगातार जारी है और चुनाव तक और तेज होगा।
विज्ञापन
आगे पढ़ें

धार्मिक ध्रुवीकरण

आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है। खबरों को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।

खबर में दी गई जानकारी और सूचना से आप संतुष्ट हैं?
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
  • Downloads

Follow Us

X

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00
X