पश्चिम बंगाल से रायसीना हिल्स तक प्रणव दा का ऐसा रहा सफर
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पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के मिराठी गांव में स्कूल जाने के लिए उन्हें बचपन में नदी को पार करना पड़ता था। बारिश के दिनों में वे अपने साथ एक गमछा रखते थे ताकि बारिश से भरे खेत को पार कर सात किलोमीटर दूर स्कूल पहुंचने के बाद वे अपने कपड़े बदल सकें। चौंकिए नहीं पर ऐसी स्थिति से निकलने वाला वो छोटा सा लड़का भारत के राष्ट्रपति के तौर पर रायसीना हिल्स तक पहुंचने में कामयाब रहा। ऐसा राष्ट्रपति जिसका सम्मान सभी राजनीतिक दलों में था। वो हैं भारत के तेरहवें राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी। भारत के शीर्ष पद तक पहुंचने की उन्होंने कभी इच्छा नहीं की थी और ना ही उन्होंने कभी सोचा था कि वे एक दिन भारत के पहले नागरिक बनेंगे।
लेकिन राजनीतिक गणित ने उन्हें राष्ट्रपति का पद स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया। ये वैसी कहानी है जिसके बारे में शायद उन्होंने अपनी गोपनीय लाल डायरी में लिखा होगा, जिस डायरी में वे दिन का काम खत्म होने के बाद रोजाना लिखते रहे हैं। उनकी इस डायरी में समकालीन भारतीय राजनीति का इतिहास दर्ज होगा, लेकिन इसे वे छपवाना नहीं चाहते। उनके मुताबिक उनकी ये डायरी उनके अंतिम संस्कार के साथ ही जाएगी। सच्चाई यही है कि वे हर दिन अपने बीते दो दिनों के अनुभवों के बारे लिखते रहे हैं। यही वजह है कि उनकी याददाश्त बेहतरीन है।
सरकार के काम में व्यस्त रहे हों या राजनीतिक व्यस्तता रही हो, आधी रात के बाद वे अपनी डायरी में रोजनामचा लिखते रहे। जब वे केंद्रीय मंत्री थे तो आधी रात में अपना काम खत्म करने के बाद वे सुबह डेढ़ बजे स्नान किया करते थे, उसके बाद रात का खाना खाते थे। इस खाने में चावल, दाल, आलू पोस्तो और मछली शामिल होती थी। इसके बाद सुबह में वे जल्दी उठ जाते थे। उठने के बाद वे चार किलोमीटर तक मार्निंग वॉक करते थे। उनकी दिनचर्या आज भी वैसी ही है।
अब पूर्व राष्ट्रपति के तौर पर 10, राजाजी मार्ग वाले बंगले में जाने के चलते मार्निंग वॉक का उनका अंदाज बदल जाएगा। राष्ट्रपति भवन में वे रोजाना मुगल गार्डेन में टहलने के लिए जाते रहे लेकिन राजाजी मार्ग में उन्हें उस रास्ते पर ज्यादा चक्कर लगाने होंगे जो खास तौर पर उनको ध्यान में रखकर तैयार की गई हैं। मुखर्जी के पास राजनीति, संविधान और इतिहास का बहुत अनुभव रहा है और भारत के राष्ट्रपति के तौर पर भी उन्होंने अपने उन सिद्धांतों को कायम रखा।
एक बार अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को राज्यसभा में पेटेंट एक्ट में संशोधन वाला बिल पास कराना था, ये डब्ल्यूटीओ में भारत के बने रहने के लिए जरूरी था। उस वक्त कांग्रेस विपक्ष में थी। उस वक्त पार्टी के अंदर ये राय बनी कि एनडीए सरकार का विरोध करना चाहिए ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वाजपेयी सरकार को पेटेंट एक्ट पास कराने का क्रेडिट नहीं मिल पाए। लेकिन ये प्रणब मुखर्जी ही थे जिन्होंने कांग्रेस वर्किंग कमेटी और कांग्रेस संसदीय दल के अंदर सरकार का साथ देने के लिए बहस किया था। उस वक्त पार्टी के कई युवा नेताओं को ये लगा था कि प्रणब मुखर्जी बीजेपी सरकार के नजदीक जा रहे हैं। लेकिन उनका तर्क था कि डब्ल्यूटीओ में शामिल होने की प्रक्रिया कांग्रेस पार्टी की सरकार के समय शुरू हुई थी। ऐसे में अब विपक्ष में होने के चलते इसका विरोध नहीं करना चाहिए। उनके मुताबिक देश के लिए डब्ल्यूटीओ से जुड़ना जरूरी था। बाद में ये बिल संसद में कांग्रेस पार्टी के सहयोग से पास हुआ।
अपने सिद्धांतों के प्रति उनका ये रुझान राष्ट्रपति बनने के बाद भी कायम रहा। राष्ट्रपति के तौर पर उनके कार्यकाल के दौरान दो अलग-अलग विचारधाराओं वाली सरकार रही। लेकिन जब जब उनकी मंजूरी का वक्त आया तब तब उनका रवैया एक समान रहा।
2014 के लोकसभा चुनाव से पहले गणतंत्र दिवस के मौके पर देश के नाम अपने संबोधन में उन्होंने देश के लोगों से वोट डालकर बहुमत वाली सरकार चुनने की अपील की थी। उनका भरोसा गठबंधन वाली सरकारों पर नहीं रहा। उनके मुताबिक एक पार्टी की बहुमत वाली सरकार ही देश के लिए अच्छी होती है। 2004 में जब कांग्रेस पार्टी ने सहयोगियों के साथ मिलकर सरकार बनाई थी, तब उन्होंने एक पार्टी मीटिंग में कहा था कि उन्होंने सोनिया गांधी के सामने गठबंधन सरकार बनाने के विचार का विरोध किया था और ऐसा करने वाले वे अकेले थे।
2014 में लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनसे मिलने आए और अपनी इस मुलाकात में मोदी ने प्रणब मुखर्जी के उस संबोधन के प्रति आभार जताया जिसमें उन्होंने लोगों से एक पार्टी की सरकार को चुनने की अपील की थी। उस दिन से मोदी और मुखर्जी का रिश्ता, खास बन गया, जिसे सार्वजनिक तौर पर प्रधानमंत्री ने स्वीकार भी किया। राष्ट्रपति ने उन्हें प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ लेने वाले समारोह के लिए सार्क देशों के नेताओं को आमंत्रित करने में मदद की। क्योंकि दूसरे देशों के शासनाध्यक्षों को आमंत्रित करने के लिए कुछ प्रोटोकाल होते हैं, और उस वक्त भारत में किसी पूर्णकालिक प्रधानमंत्री के नहीं होने के चलते उनमें कुछ कमी की गई थी।
लेकिन प्रणब मुखर्जी ने एक बात स्पष्ट रखी कि प्रधानमंत्री को वे अध्यादेश के जरिए कानून बनाने में मदद नहीं करेंगे। जब जब सरकार ने अध्यादेश पारित किया, राष्ट्रपति के तौर पर प्रणब मुखर्जी ने संबंधित विभाग के मंत्री को तलब किया। ज्यादातर मौकों पर उन्हें मनाने के लिए वित्त मंत्री अरुण जेटली आते रहे। कई नेता ये सवाल पूछते हैं कि प्रणब मुखर्जी ने सरकार को अध्यादेश लौटा क्यों नहीं दिया? अपने नजदीकी मित्रों को उन्होंने इसका जवाब भी दिया, "मैं एक दिन के लिए मीडिया की सुर्खियां नहीं बटोरना चाहता। क्योंकि सरकार के पास पर्याप्त बहुमत है और संविधान के मुताबिक अगर कैबिनेट दोबारा पास कर दे तो मुझे हस्ताक्षर करना ही होता। इससे बेहतर तो सरकार से बहस करना है। आखिरकार हमने असहमति पर सहमत होने का फैसला किया।"
वैसे 13वें राष्ट्रपति की एक कमजोरी भी रही है। वे दुर्गापूजा के दौरान अपने गांव नियमित तौर पर जाते रहे हैं। वे खुद पूजा भी करते हैं। इंदिरा गांधी से लेकर मनमोहन सिंह के मंत्री के तौर पर वे इस पूजा के लिए अपने शेड्यूल से समझौता करते रहे। एक बार अमेरिकी रक्षा मंत्री डोनल्ड रम्सफेल्ड उनसे बात करना चाहते थे, तब वे अपने गांव में थे। उनके अधिकारी उनसे बात करने से बचते थे खासकर तब जब वे पूजा पर होते थे। एक अधिकारी ने साहस दिखाते हुए कागज के टुकड़े पर लिखा कि रम्सफेल्ड उनसे बात करना चाहते हैं, तो उन्होंने पेंसिल से लिखा कि इंतजार करने को कहिए।
जब न्यूक्लियर डील पर वाशिंगटन में हस्ताक्षर होना था, तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनसे कहा कि अमेरिका वो दिन तय कर रहा है जब आप पूजा के लिए अपने गांव में होंगे। प्रणब ने उनसे कहा कि उन्हें इंतजार करने को कहिए। उन्होंने अपनी पूजा पूरी की और विशेष विमान से दिल्ली आए और उसी रात न्यूयार्क के लिए रवाना हो गए। वहां से वे वाशिंगटन गए और समझौते पर हस्ताक्षर किया। एक संक्षिप्त प्रेस कांफ्रेंस करके वे एयरपोर्ट पहुंचे, ताकि वे अगले दिन होने वाली कैबिनेट की बैठक में शामिल हो सकें। लेकिन जब वे राष्ट्रपति बने तो उन्होंने अपने इस रूटीन में बदलाव किया, क्योंकि भारत के राष्ट्रपति को दशहरा पर रावण वध में हिस्सा लेना होता है।
देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इस परंपरा की शुरुआत की थी और प्रणब इसका पालन करते रहे। राष्ट्रपति रहने के दौरान वे नवमी के दिन दिल्ली पहुंच जाते थे और अपने बेटे को पूजा का बाकी काम करने की हिदायत दे कर आते थे। लेकिन अब वे खुश हैं। 48 साल बाद सरकारी फाइल देखने की बाध्यता जो नहीं रहेगी और वे पूजा के दिनों में बिना किसी बाधा के पूजा कर पाएंगे।