गरीबी से हारा नेशनल जिमनास्टस, बीपीएड में पढ़ाई के लिए फीस जमा करने का संकट
बचपन में बड़े भाई ने जिमनास्टिक में इस सपने के साथ ज्वाइन कराया था कि आगे इसी खेल में छोटा भाई नाम रोशन करेगा, लेकिन हालात उल्टे हो गए। आल इंडिया चैंपियनशिप खेल चुके सुमित कुमार को कोच और सहयोग न मिलने से उसने पढ़ाई छोड़ दी और खेल भी। सरकारी नौकरी नहीं मिली तो बीपीएड पढ़ने की ख्वाहिश जताई, लेकिन फीस सुनकर ही सुमित हिम्मत हार गया है।
यूपी के बरेली जिले में स्थित कालीबाड़ी के रहने वाले सुमित कुमार के पिता नारायण दास स्पेयर पार्ट्स की दुकान चलाते थे। दो साल पहले उनकी दुकान को ट्रांसपोर्ट नगर में शिफ्ट किया गया तो तंगी के चलते उन्होंने दुकान पर ताला डालना बेहतर समझा।
अब पिता फलों का ठेला लगाते हैं। सुमित ने कक्षा छह में पढ़ते हुए डोरी लाल अग्रवाल स्पोर्ट्स स्टेडियम में जिमनास्टिक सीखना शुरू किया था। यहां उस समय जिमनास्टिक के कोच तैनात थे।
'जहां फीस कम हैं वहां ट्राई करें'
बारहवीं तक जिमनास्टिक खेली और प्रदेश स्तरीय प्र्रतियोगिता में टॉप 8 में रहे। इन्हें कांस्य पदक मिला। बरेली कॉलेज से बीए किया और आल इंडिया यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप में भी शामिल होने का मौका मिला। सुमित ने अब तक सात प्रदेश स्तरीय और आल इंडिया चैंपियनशिप खेला है।
सुमित ने वर्ष 2006 में कोच न मिलने की वजह से सुमित ने जिमनास्टिक छोड़ी थी। पिता के ऊपर दो भाई और दो बहन की भी जिम्मेदारी है। सुमित ने अपने प्रमाण पत्र तक फाड़ डाले हैं। परीक्षा में पास होने के बावजूद सरकारी नौकरी न मिलने पर उसने बीपीएड करने की सोची लेकिन दो साल की फीस 80 हजार रुपये सुनकर कदम पीछे खींच लिये।
खेल में काफी गरीब बच्चे आते हैं, लेकिन हालात से डरना नहीं चाहिए। अगर एक कॉलेज में अधिक फीस से एडमिशन नहीं मिल रहा तो देश के अन्य कॉलेज में ट्राई करें। कई जगह कम फीस है।
-डा. सीरिया एसएम, सचिव, बरेली जिमनास्टिक एसोसिएशन