Politics: सामाजिक समीकरणों को साधने के लिए मोदी ने अपनाया ये तरीका, विपक्ष के लिए वजूद बचाना बड़ी चुनौती
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विस्तार
नब्बे के दशक में जब भाजपा ने राम मंदिर आंदोलन चलाया था, उसके बढ़ते राजनीतिक कद को रोकने के लिए मुलायम, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और कांशीराम जैसे नेताओं ने सामाजिक समीकरणों का दांव खेला। दलितों-पिछड़ों और अल्पसंख्यक मतदाताओं को मिलाकर ऐसा राजनीतिक समीकरण तैयार किया गया, जिसमें भाजपा फंसकर रह गई। बाबरी ढांचा गिराने जैसी बड़ी घटना घटने के बाद भी वह सत्ता तक नहीं पहुंच सकी। इसके बाद यही माना गया कि इस देश की जनता पर उसकी जातीय पकड़ उसकी धार्मिक भावनाओं से ज्यादा मजबूत है। इसी जातीय समीकरणों के बूते ये नेता यूपी-बिहार में लगभग एकछत्र राज करते रहे।
बदले राजनीतिक परिदृश्य में आज जब विपक्ष के लिए अपना वजूद बचाना एक चुनौती बन गया है, विपक्ष ने मोदी के विजय अभियान को रोकने के लिए एक बार फिर वही पुराना फॉर्मूला अपनाया। नीतीश कुमार-तेजस्वी यादव ने जातिगत जनगणना और पिछड़ों की भागीदारी का मुद्दा जोरशोर से उठाया, तो बाद में इंडिया गठबंधन ने भी केंद्र से मोदी को हटाने के लिए इसे अपना मूल मंत्र बना लिया। राहुल गांधी ने पूरी ताकत के साथ पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान इस मुद्दे को उठाया।
माना यही जा रहा था कि इस आजमाए हुए फॉर्मूले के सहारे विपक्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी के सामने चुनौती पेश करने में सफल रहेगा। खुद भाजपा के नेताओं में इस मुद्दे को लेकर जिस तरह की हड़बड़ाहट दिखाई पड़ रही थी, माना जाने लगा था कि विपक्ष का तीर बिल्कुल सटीक निशाने पर बैठा है और 2024 में मोदी की राह आसान नहीं होने वाली।
लेकिन पांच राज्यों के चुनाव परिणामों ने पूरा समीकरण पलट दिया है। भाजपा ने उत्तर भारत के महत्त्वपूर्ण तीन राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बंपर जीत हासिल करने के साथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों पर भी बड़ी कामयाबी पाई। इन चुनाव परिणामों के बाद कहा जा रहा है कि विपक्ष का जातिगत जनगणना का दांव ध्वस्त हो गया है।
मध्यप्रदेश में बढ़ी भाजपा की पकड़
मध्यप्रदेश में विधानसभा की कुल 230 सीटें हैं। इनमें अनुसूचित जातियों के लिए 35 सीटें आरक्षित हैं। भाजपा ने इनमें से 26 सीटों पर जीत हासिल की है। पिछले चुनाव में उसने केवल 18 सीटों पर जीत हासिल की थी। इसी प्रकार राज्य में अनुसूचित जनजातियों के लिए 47 सीटें आरक्षित हैं। इनमें भाजपा को 27 सीटों पर जीत मिली है। पिछले चुनाव में उसे केवल 16 सीटों पर जीत मिली थी।
राजस्थान विधानसभा में कुल 200 सीटें हैं। इनमें 34 सीटें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं। भाजपा को इनमें से 22 सीटों पर जीत मिली है। 2018 के विधानसभा चुनाव में उसे केवल 12 सीटों पर जीत मिली थी। इसी प्रकार राज्य में अनुसूचित जनजातियों के लिए 25 सीटें हैं, जिसमें से भाजपा को 13 सीटों पर जीत मिली है। पिछले चुनाव में यह आंकड़ा केवल नौ था।
छत्तीसगढ़ विधानसभा में कुल 90 सीटें हैं। यहां अनुसूचित जाति के लिए 10 सीटें आरक्षित हैं। भाजपा ने इनमें से चार सीटों पर जीत हासिल की है। पिछले चुनाव में उसे केवल दो एससी सीटों पर जीत मिली थी। इसी प्रकार अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित 29 सीटों में से 17 पर उसे जीत मिली है। पिछले चुनाव में उसे केवल तीन सीटों पर जीत मिली थी।
यानी इन सभी राज्यों में भाजपा का अनुसूचित जातियों-जनजातियों के बीच दबदबा बढ़ गया है। कई स्थानों पर यह दोगुने से भी अधिक हो गया है। यदि यही आंकड़े लोकसभा चुनाव परिणाम में भी तब्दील हो गए, तो मोदी सरकार की वापसी लगभग तय हो जाएगी।
लोकसभा में आरक्षित सीटें
लोकसभा में 84 सीटें अनुसूचित जातियों (एससी कैटेगरी) के लिए और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति (एसटी कैटेगरी) के लिए आरक्षित हैं। छत्तीसगढ़ की कुल 11 लोकसभा सीटों में से चार सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। इसी प्रकार मध्यप्रदेश की 29 लोकसभा सीटों में से छह और राजस्थान की कुल 25 लोकसभा सीटों में से तीन अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। यानी अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित 13 सीटें इन्हीं राज्यों में आती हैं। बदले समीकरणों में भाजपा की दावेदारी इन सीटों पर बढ़ गई है।
कैसे हुआ ये करिश्मा
सीएसडीएस से जुड़े राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार ने अमर उजाला से कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ओबीसी, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों को सत्ता-संगठन में बराबर की भागीदारी दी है। केंद्र सरकार में दूसरे वर्गों के मंत्रियों से इस्तीफे लेकर ओबीसी, दलित और आदिवासी नेताओं को जगह दी। इससे इन वर्गों के मतदाताओं में यह भरोसा बढ़ा है कि सरकार उन्हें मान-सम्मान के साथ सत्ता में भागीदारी देने के लिए तैयार है। इससे जनता में सरकार के लिए भरोसा बढ़ा है।
इसके साथ ही जातीय राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों के नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। भाजपा ने आरोप लगाया है कि इन नेताओं ने जातीय राजनीति के नाम पर केवल एक परिवार या केवल एक जाति को आगे बढ़ाया है, जबकि दूसरी ओबीसी-दलित या आदिवासी जातियों को वोट बैंक के लिए इस्तेमाल किया है। वहीं, केंद्र सरकार ने कल्याणकारी योजनाओं के जरिए इन वर्गों के उत्थान के लिए काम किया है।
चुनाव परिणाम बताते हैं कि इन वर्गों के मतदाताओं ने केंद्र-भाजपा के इस तर्क को स्वीकार किया है। यही कारण है कि इन वर्गों के बीच प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा की स्वीकार्यता बढ़ी है। आगामी लोकसभा चुनाव में भी यह क्रम बना रहे, तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा।