केंद्र और राज्य की सियासत में सूखे खेत, फंसे किसान और खत्म हुआ रोजगार
- 18 नंवबर, 2015 को उत्तर प्रदेश ने सूखे की मार झेल रहे 50 जिलों को सूखा पीड़ित घोषित किया
- वर्ष 2015 में कृषि संबंधी कारणों के चलते 2,806 किसानों ने आत्महत्या कर ली
- देश के मुख्य 91 जलाशयों में अब सिर्फ 25 फीसदी पानी ही बचा
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विस्तार
देश भर में भले ही लाखों किसान सूखे से जूझने के चलते अपने लिए दो समय की रोटी न जुटा पा रहे हों। पर केंद्र और राज्य सरकार को समय पर कभी कुछ दिखता ही नहीं है। राजधानियों, तहसीलों, कस्बों और गांवों में सरकारी एजेंसियां काम करती रहती हैं लेकिन कभी भी वो अपनी आंखों से किसानों के कष्टों को देखने की कोशिश नहीं करती हैं। किसान रोते हैं, उनका खेत रोता है और साथ में रोता है वो परिवार जो अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए दिन-रात खेतों को संवारने में लगा होता है। ऐसे हालातों में जब किसान रोते हैं तो पर उनके आंसू नहीं निकलते हैं। क्योंकि उनका दर्द उन आंसुओं को सोख लेता है। थक हारकर किसान चिल्लाते हैं। अपनी पीड़ा बयां करते हैं। फिर भी उनकी आवाज नहीं सुनी जाती है। किसानों के ऊपर कर्जा होता है जो खेतों के भरोसे लिया जाता है। खेत सूख जाते हैं और किसान की अपना कर्जा वापस करने की उम्मीद टूट जाती है। अंत में किसानों के पास कोई चारा नहीं बचता है और उसका नतीजा ही ये खतरनाक किसानों की आत्महत्या के रूप में सामने आती है।
पिछले दो सालों से देश की कम बारिश की वजह से खेती को होने वाले नुकसान को झेल रहा है। इसका सबसे बड़ा खामियाजा देश के लाखों किसानों को भुगतना पड़ रहा है। खराब मानसून के चलते पिछले साल 18 नंवबर, 2015 को उत्तर प्रदेश ने सूखे की मार झेल रहे 50 जिलों को सूखा पीड़ित घोषित किया। उत्तर प्रदेश सरकार ने सूखे पर नियंत्रण पाने के लिए केंद्र सरकार से 6,000 करोड़ रुपए की मदद मांगी थी। पर अभी भी केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार की आपसी खींचतान में किसानों को उनका असल मुआवजा नहीं मिल पाया है।
देश भर में किसानों के लिए फसल बीमा योजना को लागू किया गया। पर इसका लाभ भी देशभर में किसानों को कम ही संख्या में मिल सका। उदाहरण के तौर पर सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही 10 फीसदी किसान फसल बीमा योजना का लाभ ले पा रहे हैं। बड़े किसान जागरूकता और धन की कमी न होने के कारण ऐसी योजनाओं का लाभ ले लेते हैं। पर छोटे किसानों के पास इतना पैसा ही नहीं होता है कि वो फसल बीमा योजना का प्रीमियम भी भर सकें।
खुद नहीं जागती हैं केंद्र और राज्य सरकार
उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड , महाराष्ट्र के मराठावाड़ा, लातूर, विदर्भ, मध्यप्रदेश, उत्तरी कर्नाटक, हरियाणा, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना जैसे राज्यों में किसानों की हालत ऐसी ही है। किसानों की हालत की चर्चा जब सुप्रीम कोर्ट में हुई तो केंद्र और राज्य सरकारों को जगाया तो अचानक ही सरकार में तेजी दिखाई देने लगी। 9 अप्रैल, 2016 को केंद्र सरकार ने सूखे की हालत पर उच्च स्तरीय बैठक करने के बाद उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र को सूखे के निपटने के निर्देश जारी किए। सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद पीएमओ तक हरकत में आ गया और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड की हालत पर काबू पाने के लिए निर्देश जारी किए।
पीएमओ की तरफ से उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया गया कि जनवरी में केंद्र सरकार की तरफ से राष्ट्रीय आपदा राहत कोष में दिए गए 1304 करोड़ रुपए के फंड को एक सप्ताह के भीतर सूखा पीड़ित किसानों के खातों में जमा कराया जाए। यह फंड जनवरी में केंद्र सरकार की तरफ से जारी किया गया था। पर अभी तक इसे किसानों की मदद के लिए रिलीज नहीं किया गया।
आपको बताते चलें कि देश भर के 11 राज्यों को वर्ष 2015 में खरीफ सत्र के दौरान सूखाग्रस्ता घोषित कर दिया गया था। यह लगातार दूसरा साल था जब पूरे देश ने सूखे की गर्मी की आंच को महसूस किया था।
पिछले साल नवंबर में उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने यहां सूखा घोषित कर दिया था, वहीं खरीफ सीजन के पांच माह गुजर जाने के बाद गुजरात ने अप्रैल में अपने यहां सूखा घोषित किया। हरियाणा और बिहार ने अभी भी अपने यहां सूखे को लेकर कोई घोषणा नहीं की थी। राज्यों के इस रूख पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि 'यह कोई पिकनिक नही है, यह लोगों की जिंदगी से जुड़ा मसला है।'
कोर्ट ने यह टिप्पणी स्वयंसेवी संस्था स्वराज अभियान की तरफ से दाखिल की गई जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कही थी। संस्था ने इस बात को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी कि किसानों को समय पर कृषि ऋण नहीं मिल रहा है, सूखे के मुआवजे का भुगतान नहीं हो रहा है। साथ ही जल नीति के एकीकरण को लागू नहीं किया जा रहा है।
अगर सरकार की योजनाएं समय से लागू हो जाएं तो किसानों को परेशानी का सामना ही नहीं करना पड़ेगा। 9 अप्रैल, 2016 को शनिवार को अपनी समीक्षा में उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव आलोक रंजन ने आपातसमय के लिए प्लान तैयार किया जा चुका है। उन्होंने बताया कि सरकार के पास बुंदेलखंड के बांदा, महोबा और चित्रकूट में पीने के पानी की व्यवस्था की पूरी योजना तैयार है। पर यह योजना जमीन पर कैसे खरी उतरेगी, यह तो भंयकर गर्मी के दौरान लोगों की प्यास ही बताएगी।
100 साल में चौथी बार आया ऐसा संकट
सूखे की हालत को देखते हुए केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश सरकार को अनुमति दी है कि ग्रामीण रोजगार गांरटी योजना के तहत सूखा ग्रस्त क्षेत्रों में लोगों को मिलने वाले रोजगार की संख्या को 100 से बढ़ाकर 150 दिन किया जा सकता है। पीएमओ ने साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार को यह भी कहा है कि मनरेगा के तहत श्रमिकों को किए जाने वाले भुगतान के लिए जारी किए गए 700 करोड़ रुपए का भुगतान योग्य लोगों को इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट सिस्टम के तहत किया जाए।
केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश को यह निर्देश भी जारी किए हैं कि पाइप लाइन के जरिए पानी घरों तक पहुंचाने की योजना पर सबसे पहले काम हो। साथ ही कुओं और तालाबों को बनाने के काम में भी तेजी लाई जाए। साथ ही अधिक से अधिक किसानों को फसल बीमा योजना के दायरे में लाया जाए।
ताजा आंकड़ो के मुताबिक उत्तर प्रदेश के सिर्फ 7-10 फीसदी किसान और बुंदेलखंड के 30 फीसदी किसान ही फसल बीमा योजना के तहत स्कीम का फायदा पा रहे हैं। सूखे को लेकर देश की हालत पर पीएमओ ने भी बयान जारी करते हुए कहा कि ' को-ऑपरेटिव फेडरलिज्म के तहत केंद्र सरकार राज्यों के साथ मिलकर काम कर रही है।
इससे पहले देश में वर्ष 1986-87 में देश को ऐसे हालात से गुजरना पड़ा था। पूरी शताब्दी में यहां चौथा ऐसा मौका था जब देश को लगातार दो साल कम बारिश के कारण कमजोर मानसून से जूझना पड़ा।
दुख की बात है कि 4 मार्च, 2016 को केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय ने संसद में खुद बताया कि वर्ष 2015 में कृषि संबंधी कारणों के चलते 2,806 किसानों ने आत्महत्या कर ली थी। देश में सबसे ज्यादा आत्महत्या के मामले महाराष्ट्र(1,841), पंजाब (449), तेंलगाना (342), कर्नाटक (107), आंध्र प्रदेश (58) में दर्ज किए गए हैं।
वहीं उड़ीसा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश ने यह जानकारी केंद्र को नहीं दी कि उनके राज्यों में कितने किसानों ने खुदकुशी की है। पर मीडिया के मुताबिक इन राज्यों में भी किसानों की आत्महत्या के कई मामले सामने आए हैं।
मौसम विभाग अपनी रिपोर्ट में पहले ही यह बता चुका है कि अप्रैल से जून के दौरान देश भर में भीषण गर्मी पड़ेगी।
वहीं केंद्रीय जल संसधान, नदी विकास और गंगा सरंक्षण मंत्रालय के मुताबिक मार्च, 2016 तक के आंकड़े बताते हैं कि देश के मुख्य 91 जलाशयों में अब सिर्फ 25 फीसदी पानी ही बचा है। रिपोर्ट के मुताबिक उत्तरी कर्नाटक, महाराष्ट्र का मराठावाड़ा क्षेत्र, बुंदेलखंड क्षेत्र के साथ उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कई इलाकों में पीने के पानी का संकट हो सकता है।
आखिर मनरेगा के जरिए क्यों सूखाग्रस्त इलाकों में किसानों को क्यों नहीं मिली राहत
क्या सिर्फ भारत में ही ऐसा होता है कि सही समय पर निर्णय नहीं लिए जाते हैं या फिर दुनिया बहुत से ऐसे देश है जहां पर निर्णय लेने में देरी कर दी जाती है?
देश में गरीबों को सबसे ज्यादा रोजगार देने वाली योजना मनेरगा को आखिर सहीं समय पर लागू क्यों नहीं किया गया। अगर इस योजना को सही से लागू किया गया होता तो सूखाग्रस्त इलाकों की तस्वीर कुछ और ही होती। ऐसे कई कारण दिए जा सकते हैं जिसमें केंद्र सरकार के दावों की पोल खोलते हैं। पर तस्वीर उसके उलट ही नजर आती है। मोदी सरकार भले ही फंड का रोना रोए पर आंकड़े उसकी दूसरी तस्वीर बयां करते हैं।
सवाल यह भी उठता है कि सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पीड़ित लोगों को जब सबसे ज्यादा मदद की जरूरत है तब सरकार उनकी मदद क्यों नहीं कर रही है?
सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि 'आखिर सरकार ने मनरेगा के लिए दी जाने वाली धनराशि को क्यों जारी नहीं किया है? कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि 'सरकार को सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए तुरंत फंड जारी करना चाहिए जहां पर मनरेगा के तहत श्रमिक काम कर रहे हैं।'
मनेरगा के तहत कामगारों का उन्हीं के क्षेत्र में साल में 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराया जाता है। मनरेगा के तहत दिए जाने वाला रोजगार एक तरह से सूखा ग्रस्त क्षेत्रों में तेजी से सुधार लाने की एक व्यवस्था के तहत भी काम करता है। सूखा आने के समय स्थानीय लोगों को रोजगार देकर सूखे से निपटने वाली योजनाओं पर तेजी से काम किया जाता है। इसमें तालाब और कुएं बनाने से लेकर अन्य योजनाएं तक शामिल हैं।
6 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने न्यायधीश एमबी लोकुर और न्यायधीश एनवी रमन्ना ने केंद्र सरकार को आदेश देते हुए कहा 'सरकार को तुरंत फंड जारी करना चाहिए और एक साल के लिए नहीं रूकना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि 'अगर अभी फंड जारी नहीं किया गया तो कोई भी इस योजना में काम करना पसंद नहीं करेगा।'
7 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने फिर से इस मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि 'ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने को लेकर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों अपनी-अपनी दलील दे रहे हैं। यहां तो पहले अंडा आया या फिर मुर्गी वाली स्थिति बन गई है। केंद्र सरकार कह रही है कि राज्यों की तरह से गांवों में ज्यादा काम किए जाने की कोई रिपोर्ट नहीं आ रही है। वहीं राज्य सरकारें कर रही हैं कि रोजगार कार्यक्रम को सही से लागू करने के लिए केंद्र सरकार फंड नहीं जारी कर रही है।
मनरेगा के तहत 150 दिन काम करने का नोटिफिकेशन खत्म हो गया
वित्त वर्ष 2016-17 का बजट पेश करते हुए अरूण जेटली ने दावा किया था कि उनकी सरकार ने सबसे ज्यादा 38,500 करोड़ रुपए का आवंटन मनरेगा स्कीम के लिए किया है। पर जब तथ्य सामने आए तो पता चला कि वर्ष 2006 में नरेगा नाम से शुरू की गई इस स्कीम के लिए सबसे ज्यादा बजट 40,100 करोड़ का आवंटन वर्ष 2010-11 में किया गया था।
आपको बताते चले कि इस साल भले ही केंद्र सरकार ने बजट में इतना आवंटन किया तो पर पूर्व में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद यूपीए-1 के शासनकाल में शुरू की गई योजना को कांग्रेस सरकार की असफलता बता रहे थे।
इस साल को हटा दिया जाए तो पिछले पांच सालों में इस स्कीम के बजट में लगातार कमी की गई। लोगों को 100 दिन को रोजगार देकर सूखे पड़ने के समय उनसे काम करवाया गया। पर समय आने पर जब कामगारों को परिश्रामिक का भुगतान करने की बारी आई तो कुछ फंड की ही कमी पड़ गई।
पूर्व में केंद्र सरकार के ऊपर 2012-13 के दौरान 3,378 करोड़ रुपए और वर्ष 2015 की 5,513 करोड़ रुपए की देनदारी बाकी है। केंद्र सरकार के ऊपर मनरेगा को लेकर 12,483 करोड़ रुपए का कुल बाकाया है जिसका उसे भुगतान करना है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जब आने वाले सप्ताह में केंद्र सरकार 11,030 करोड़ रुपए के फंड का भुगतान करेगा तो यह पैसा कामगारों को उनका मेहनताना देने के काम में चला जाएगा। पिछले साल सरकार ने 7,983 करोड़ रुपए का बजट मनरेगा में काम करने वाले लोगों के लिए जारी किया था। पैसा जारी करने के बाद भी राज्यों के पास अब इतना पैसा नहीं बना है कि मनरेगा के तहत नए कामों को शुरू किया जा सके।
पर ऐसे में उन लोगों का क्या होगा जो सूखा पड़ने के समय गांवों में तालाब खोदने और कुएं बनाने का काम करते थे। सूखा पड़ने वाले क्षेत्रों में ऐसे लोग भी हैं जो काम न होने की वजह से दूसरे राज्यों में काम की तलाश में पलायन कर गए हैं।
पिछले वर्ष 2015 में आठ राज्यों ने अपने यहां सूखा घोषित किया था। इन राज्यों में उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उड़ीसा और तेलंगाना शामिल थे। इसके बाद केंद्र सरकार ने मनरेगा के तहत सूखाग्रस्त इलाकों में 100 दिन के रोजगार को बढ़ाकर 150 दिन कर दिया। पर केंद्र सरकार ने इस अतिरिक्त 50 दिनों के काम का परिश्रामिक देने का फंड नहीं दिया। इसका असर यह हुआ कि उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश में सरकारों के पास मौजूद मनरेगा का फंड नेगेटिव में पहुंच गया। और अब सूखे को लेकर देश में परिस्थितियां जब और ज्यादा खराब हो रही हैं तो मनरेगा के तहत 150 दिन काम करने का नोटिफिकेशन खत्म हो गया है।
सूखे की मार: समय पर न पानी मिला और न मिला मुआवजा
अकाल बुंदेलखंड की चौखट पर मुंह बाए खड़ा है। ललितपुर जिला सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में से एक है। जिला कृषि विभाग के ताजा आंकड़े बताते हैं कि सत्तर फीसदी खेत बिना बुआई के वीरान पड़े हैं। कई किसान बदहाली के शिकार होकर अपनी स्वभाविक मौत मर चुके हैं तो कुछ एक खुदकुशी की भी खबरें हैं। इतने संवेदनशील मुद्दे पर भी सरकारी अमला कितने संवेदनहीन तरीके से काम करता है, उसकी बानगी है पीड़ित किसानों को राहत पहुंचाने के इरादे से उठाए गए कुछ कदम। इलाके में बदहाली की तमाम आहटों के बावजूद अव्वल तो प्रशासन देर से जागा, फिर जागा तो राहत के नाम पर ऐसे नियम-कायदे बना दिए जो किसानों के हरे जख्मों पर नमक छिड़कने जैसे हैं।
सरकार ने हाल ही में किसानों को अनुदान (सब्सिडी) पर बीज देने की घोषणा की है। इसके तहत रबी की फसल के अलग-अलग बीजों पर केंद्र और राज्य सरकार की तरफ से सब्सिडी दी जा रही है। गेहूं के बीज पर केंद्र सरकार की तरफ से एक हजार रुपए, राज्य सरकार द्वारा देय 400 रुपए और राज्य सरकार द्वारा अतिरिक्त देय 600 रुपए कुल मिलाकर 2000 रुपए अनुदान दिया जा रहा है। इसी तरह चना के बीज पर केंद्र सरकार की तरफ से 2500 रुपए, राज्य सरकार द्वारा 800 रुपए, राज्य सरकार द्वारा अतिरिक्त देय 1700 रुपए और कुल मिलाकर 5,000 रुपए अनुदान दिया जा रहा है। मटर के बीच के लिए केंद्र सरकार की तरफ से 2500 रुपए, राज्य सरकार की तरफ से 800 रुपए और राज्य सरकार की ही तरफ से अतिरिक्त देय 1700 रुपए व कुल मिलाकर 5,000 रुपए अनुदान दिया जा रहा है। इसी प्रकार मसूर के बीज पर केंद्र सरकार द्वारा 2500 रुपए, राज्य सरकार द्वारा 800 रुपए और राज्य सरकार द्वारा 1700 रुपए का अतिरिक्त अनुदान समेत कुल 500 रुपए का अनुदान दिया जा रहा है।
सरकार ने सब्सिडी पर बीज देने का फैसला तो किया है लेकिन इस मामले मे पेंच ये है कि किसानों को पहले बीज की पूरी कीमत का एक चेक कृषि विभाग के नाम से जमा कराना होगा। पूरी धनराशि का चेक जमा करने के बाद किसानों को बीज मुहैया करा दिया जाएगा और बाद में जिस बीज पर जितनी सब्सिडी है, उतनी राशि चेक के माध्यम से ही वापस की जाएगी। किसानों का तर्क है कि यदि उनके पास चेक बनवाने के लिए पर्याप्त पैसा होता तो उन्हें अनुदान की कोई जरूरत ही नहीं थी।
पहली बात तो ये कि दिसंबर के महीने में बीज खरीदी पर अनुदान की घोषणा करना किसानों के साथ मजाक करने जैसा है। जो साधन संपन्न किसान बुआई करने में सक्षम थे वो अक्टूबर के महीने तक कर चुके थे। जो नहीं कर पाए करीब सत्तर फीसदी उनके लिए अब बहुत देर हो चुकी है। अगर कोई किसान बीज खरीदना भी चाहे तो पहले पूरी कीमत का चेक बनाकर जमा कराना होगा जो उनके लिए किसी मुसीबत से कम नहीं। इस पैसे के इंतजाम के लिए उन्हें फिर सूदखोरों के चंगुल में फंसना होगा। तो फिर सरकार की तरफ से की जा रही मदद का क्या औचित्य रह जाएगा। सरकार केवल रस्मी कदम उठाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान बैठी है। जरूरतमंद किसानों को इसका कितना फायदा मिल रहा, उससे उनका कोई लेना-देना नहीं। सरकार में बैठे 'धरतीपुत्रों' को धरातल पर उतरकर कुछ ऐसे उपाय करने की जरूरत है जिससे बुंदेलखंड में स्थिति को भयावह होने से रोका जा सके।