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उत्तर प्रदेश की सियासत: ब्राह्मणों का साथ, पार्क बनाने से तौबा और बाहुबलियों से दूरी, ये हैं बसपा के चरित्र बदलने के संकेत
Fri, 10 Sep 2021 05:50 PM IST
प्रतिभा ज्योति
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
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Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Fri, 10 Sep 2021 05:50 PM IST
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मायावती और मुख्तार अंसारी
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
पूर्वांचल के माफिया डॉन के तौर पर बदनाम बसपा के बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी को बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस बार टिकट देने से इनकार कर दिया है। मायवती के इस फैसले से राजनीतिक पंडित कुछ हैरान हैं। पिछले कुछ समय से लगातार मायावती ऐसे एलान कर रही हैं जिससे उनके बदले-बदले से होने का एहसास हो रहा है। बसपा ने शुक्रवार को विधानसभा चुनाव से जुड़ा बड़ा फैसला करते हुए कहा कि पार्टी का प्रयास होगा कि आगामी विधानसभा चुनाव में बसपा किसी भी बाहुबाली या माफिया से जुड़े आदमी को टिकट नहीं दे।
कहा जा सकता है कि मजबूरी में ही सही, पर मायावती की पार्टी ने अब मूर्तियों और स्मारकों के बाद अब माफियाओं से दूरी बनाने का फैसला कर लिया है। पार्क और मूर्तियां बनवाकर जनता के पैसों को पानी की तरह बहाने का आरोप झेलने वाली बसपा अपने चाल-चरित्र और चेहरे में बदलाव कर खुद को मजबूत विकल्प के तौर पर पेश करने की तैयारी में जुट गई है। सात सितंबर को लखनऊ में पार्टी कार्यालय पर आयोजित ब्राह्मण सम्मेलन में मायावती ने कहा कि 2022 में सरकार बनने पर वह पार्क, मूर्ति व संग्रहालय नहीं बनवाएंगी।
वहीं ‘तिलक तराजू और तलवार...... ” का नारा देने वाली बसपा का इस चुनाव में ब्राह्मणों पर ज्यादा प्यार उमड़ रहा है। वे ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ने की कवायद भी इसलिए कर रही हैं क्योंकि माना जा रहा है कि ब्राह्मण भाजपा से नाराज हैं। इसलिए बसपा ब्राह्मणों को उम्मीदवार बनाकर और चुनाव में उन्हें खड़ा करके 2022 के चुनाव में भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही हैं। आखिर मायावती और बसपा के इतना बदल जाने की वजह क्या है?
बसपा के लिए करो या मरो की लड़ाई
जानकार बताते हैं कि मायावती 2022 चुनाव के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती हैं, क्योंकि यह चुनाव बसपा के अस्तित्व को बचाए रखने की भी एक लड़ाई है। मायवती जानती हैं कि यह उनके लिए 'करो या मरो' की स्थिति है। मुख्तार को बसपा से बाहर करने की रणनीति भी इसलिए बनाई है ताकि भाजपा से मुकाबला करने में कोई कोर-कसर न रह जाए। योगी सरकार इन दिनों माफियाओं-बाहुबलियों और दूसरे अपराधियों के खिलाफ चलाए सख्ती बरत रही है। बसपा को डर है कि भाजपा पार्टी चुनाव में अपराध मुक्त शासन को बड़ा मुद्दा बना सकती है। ऐसे में मुख्तार अंसारी जैसे दागियों को बढ़ावा देने से भाजपा उस पर सियासी हमला कर सकती है।
दूसरी तरफ बसपा यह भी समझ रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह के विकास का मॉडल पेश किया है और भाजपा शासित राज्यों में जिस तरह के विकास कार्य हो रहे हैं, वहां अब जनता को मूर्तियों और पार्कों से नहीं बहलाया जा सकता। इसलिए विकास की राजनीति की बात करना अभी के सियासत की पहली जरूरत बन गई है।
बसपा सुप्रीमो मायावती
- फोटो :
amar ujala
यह बसपा का इमेज मेकओवर
उत्तर प्रदेश की राजनीति पर पकड़ रखने वाले बीबीसी के पूर्व पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी इसे बसपा का इमेज मेकओवर करार देते हैं। वे कहते हैं कि जैसे रंगमंच के कलाकार अपना रूप बदलते रहते हैं वैसे ही राजनीतिक पार्टियां भी बदलती हैं। मायावती पर पैसे लेकर टिकट बेचने और अपनी जनता का पैसा अपनी मूर्तियों और पार्क बनाने पर खर्च करने के लगते रहे हैं, जिसकी वजह से जनता ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया।
अब मायावती को अपनी गलतियों का एहसास हुआ है और वे उन गलतियों को दुहराना नहीं चाहती हैं। इसलिए उनमें यह बदलाव देखा जा रहा है। अपराधियों से दूर रहकर इमेज बदलने की यही कोशिश पिछले चुनाव में सपा ने की थी। दूसरी बात है कि यूपी में अभी एक धारणा बनी हुई है कि बसपा तीसरी नंबर पर खिसक गई है और इस बार चुनाव में मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा के बीच में है। मायावती इस तरह के पैंतरे अपनाकर खुद को इस मुकाबले में लाना चाहती हैं। बसपा इस संदेश को आगे बढ़ाना चाहती है कि आगामी चुनाव में मायावती एक प्रमुख दावेदार है।
बदलाव वक्त का तकाजा
वहीं बसपा संस्थापक कांशीराम के जमाने से पार्टी के साथ रहे बसपा नेता सुधीर गोयल कहते हैं बदलाव वक्त का तकाजा होता है। ‘जिसकी संख्या भारी, उसकी इतनी हिस्सेदारी’, ‘वोट हमारा राज तुम्हारा नहीं चलेगा’, यह सब नारा अब बदल गया है। अब बदलाव की राजनीति का वक्त है।
वहीं बसपा नेता सुधींद्र भदौरिया कहते हैं, ‘पार्टी में कोई बदलाव नहीं आया है। बसपा अपने सिद्धांतों पर चलने वाली पार्टी है। मुख्तार अंसारी को टिकट नहीं देने का फैसला अपराधीकरण को रोकने की हमारी पुरानी परंपरा का ही हिस्सा है। दूसरे दलों को भी यह करना चाहिए कि बसपा की तर्ज पर अपराधियों को टिकट नहीं दें। पार्क और मूर्तियां नहीं बनाने की बात पर वे तर्क देते हैं दलित नेताओं के सम्मान में जो मूर्तियां और पार्क हमें बनवानी थीं, वो बन गई हैं। अब मूर्तियां नहीं बनानी हैं। हमें उत्तर प्रदेश का विकास करना है।
भदौरिया इस बात से इंकार करते हैं कि भाजपा के विकास म़ॉडल ने बसपा को इस बदलाव के मजबूर किया है। वे कहते हैं उन्नाव कांड के मुख्य गुनहगार कुलदीप सेंगर भी तो भाजपा के विधायक थे और हाथरस कांड भी भाजपा के शासन काल में हुआ तो भाजपा किस विकास के मॉडल की बात कर रही है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति पर पकड़ रखने वाले बीबीसी के पूर्व पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी इसे बसपा का इमेज मेकओवर करार देते हैं। वे कहते हैं कि जैसे रंगमंच के कलाकार अपना रूप बदलते रहते हैं वैसे ही राजनीतिक पार्टियां भी बदलती हैं। मायावती पर पैसे लेकर टिकट बेचने और अपनी जनता का पैसा अपनी मूर्तियों और पार्क बनाने पर खर्च करने के लगते रहे हैं, जिसकी वजह से जनता ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया।
अब मायावती को अपनी गलतियों का एहसास हुआ है और वे उन गलतियों को दुहराना नहीं चाहती हैं। इसलिए उनमें यह बदलाव देखा जा रहा है। अपराधियों से दूर रहकर इमेज बदलने की यही कोशिश पिछले चुनाव में सपा ने की थी। दूसरी बात है कि यूपी में अभी एक धारणा बनी हुई है कि बसपा तीसरी नंबर पर खिसक गई है और इस बार चुनाव में मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा के बीच में है। मायावती इस तरह के पैंतरे अपनाकर खुद को इस मुकाबले में लाना चाहती हैं। बसपा इस संदेश को आगे बढ़ाना चाहती है कि आगामी चुनाव में मायावती एक प्रमुख दावेदार है।
बदलाव वक्त का तकाजा
वहीं बसपा संस्थापक कांशीराम के जमाने से पार्टी के साथ रहे बसपा नेता सुधीर गोयल कहते हैं बदलाव वक्त का तकाजा होता है। ‘जिसकी संख्या भारी, उसकी इतनी हिस्सेदारी’, ‘वोट हमारा राज तुम्हारा नहीं चलेगा’, यह सब नारा अब बदल गया है। अब बदलाव की राजनीति का वक्त है।
वहीं बसपा नेता सुधींद्र भदौरिया कहते हैं, ‘पार्टी में कोई बदलाव नहीं आया है। बसपा अपने सिद्धांतों पर चलने वाली पार्टी है। मुख्तार अंसारी को टिकट नहीं देने का फैसला अपराधीकरण को रोकने की हमारी पुरानी परंपरा का ही हिस्सा है। दूसरे दलों को भी यह करना चाहिए कि बसपा की तर्ज पर अपराधियों को टिकट नहीं दें। पार्क और मूर्तियां नहीं बनाने की बात पर वे तर्क देते हैं दलित नेताओं के सम्मान में जो मूर्तियां और पार्क हमें बनवानी थीं, वो बन गई हैं। अब मूर्तियां नहीं बनानी हैं। हमें उत्तर प्रदेश का विकास करना है।
भदौरिया इस बात से इंकार करते हैं कि भाजपा के विकास म़ॉडल ने बसपा को इस बदलाव के मजबूर किया है। वे कहते हैं उन्नाव कांड के मुख्य गुनहगार कुलदीप सेंगर भी तो भाजपा के विधायक थे और हाथरस कांड भी भाजपा के शासन काल में हुआ तो भाजपा किस विकास के मॉडल की बात कर रही है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व बसपा सुप्रीमो मायावती।
- फोटो :
amar ujala
बाहुबलियों से पीछा छुड़ाने का बसपा पर दबाव
सूत्रों का कहना है कि अपराधियों से दूर रहने की रणनीति मायावती ने तब बनाई जब इस साल अप्रैल महीने के योगी सरकार ने मुख्तार अंसारी को उत्तर प्रदेश की बांदा जेल ले आई। इसके अलावा योगी सरकार ने आपरेशन माफिया, आपरेशन नेस्तनाबूत समेत कई अभियान चलाकर जनता की वाहवाही लूटी। इससे बसपा पर अंसारी से पीछा छुड़ाने का नैतिक दबाव बढ़ गया।
उत्तर प्रदेश की राजनीति के जानकार बताते हैं कि सिर्फ बसपा ही नहीं बल्कि सपा भी समझ गई कि माफियाओं और बाहुबलियों से दोस्ती को बीजेपी चुनावी मुद्दा बनाकर उन पर हमला कर सकती है, जो उनके चुनावी नुकसान की बड़ी वजह बन सकती है। मायावती और उनकी पार्टी यूपी में अपने चार बार के अपने कार्यकाल को बेहतर कानून व्यवस्था की दुहाई अब तक देती है। ऐसे में मुख्तार अंसारी आगामी चुनाव में पार्टी के लिए बड़ी मुसीबत का सबब बन सकती थी। इसलिए पार्टी ने अंसारी से पीछा छुड़ाने में ही अपनी भलाई समझी।
2022 का चुनाव बसपा का भविष्य तय करेगी
रामदत्त्त त्रिपाठी कहते हैं पिछले कुछ वर्षों में निराशाजनक चुनावी प्रदर्शन और राज्य में भाजपा के शानदार प्रदर्शन के साथ-साथ बसपा के मुख्य वोट बैंक में भी सेंध लगी है 2022 का चुनाव से मायावती की प्रासंगिकता के साथ साथ-साथ दलितों की मुख्यधारा की इस पार्टी का भविष्य भी तय करेगी।
मायावती ने 2007 के उत्तर प्रदेश चुनाव में तूफानी प्रदर्शन करते हुए सबको चौंका दिया था। उन्होंने 403 में से 206 सीटों पर 30 प्रतिशत वोट शेयर के साथ जीत हासिल की थी। 2002 के चुनाव में बसपा ने 98 सीटें जीती थीं और उसका कुल 23 प्रतिशत वोट शेयर था। 2007 में मुसलमानों के साथ दलितों और ब्राह्मणों के बसपा के गठजोड़ को सोशल इंजीनियरिंग का नाम दिया गया।
2012 के विधानसभा चुनाव में, बसपा की सीटें सिमटकर 80 पर रह गईं और वोट शेयर 25.9 प्रतिशत था। 2017 में उसका वोट शेयर 22.2 प्रतिशत रहा और पार्टी महज 19 सीटों पर सिमट गई। लोकसभा चुनाव में भी पार्टी को खास फायदा नहीं मिला। 2009 में जहां बसपा को 21 सीटें मिली वहीं 2014 में शून्य पर पहुंच गई। 2019 में सपा के साथ गठबंधन करने पर पार्टी को 10 सीटें हासिल हुई। कह सकते हैं मायावती के लिए यह मुश्किल सफर रहा है।
सूत्रों का कहना है कि अपराधियों से दूर रहने की रणनीति मायावती ने तब बनाई जब इस साल अप्रैल महीने के योगी सरकार ने मुख्तार अंसारी को उत्तर प्रदेश की बांदा जेल ले आई। इसके अलावा योगी सरकार ने आपरेशन माफिया, आपरेशन नेस्तनाबूत समेत कई अभियान चलाकर जनता की वाहवाही लूटी। इससे बसपा पर अंसारी से पीछा छुड़ाने का नैतिक दबाव बढ़ गया।
उत्तर प्रदेश की राजनीति के जानकार बताते हैं कि सिर्फ बसपा ही नहीं बल्कि सपा भी समझ गई कि माफियाओं और बाहुबलियों से दोस्ती को बीजेपी चुनावी मुद्दा बनाकर उन पर हमला कर सकती है, जो उनके चुनावी नुकसान की बड़ी वजह बन सकती है। मायावती और उनकी पार्टी यूपी में अपने चार बार के अपने कार्यकाल को बेहतर कानून व्यवस्था की दुहाई अब तक देती है। ऐसे में मुख्तार अंसारी आगामी चुनाव में पार्टी के लिए बड़ी मुसीबत का सबब बन सकती थी। इसलिए पार्टी ने अंसारी से पीछा छुड़ाने में ही अपनी भलाई समझी।
2022 का चुनाव बसपा का भविष्य तय करेगी
रामदत्त्त त्रिपाठी कहते हैं पिछले कुछ वर्षों में निराशाजनक चुनावी प्रदर्शन और राज्य में भाजपा के शानदार प्रदर्शन के साथ-साथ बसपा के मुख्य वोट बैंक में भी सेंध लगी है 2022 का चुनाव से मायावती की प्रासंगिकता के साथ साथ-साथ दलितों की मुख्यधारा की इस पार्टी का भविष्य भी तय करेगी।
मायावती ने 2007 के उत्तर प्रदेश चुनाव में तूफानी प्रदर्शन करते हुए सबको चौंका दिया था। उन्होंने 403 में से 206 सीटों पर 30 प्रतिशत वोट शेयर के साथ जीत हासिल की थी। 2002 के चुनाव में बसपा ने 98 सीटें जीती थीं और उसका कुल 23 प्रतिशत वोट शेयर था। 2007 में मुसलमानों के साथ दलितों और ब्राह्मणों के बसपा के गठजोड़ को सोशल इंजीनियरिंग का नाम दिया गया।
2012 के विधानसभा चुनाव में, बसपा की सीटें सिमटकर 80 पर रह गईं और वोट शेयर 25.9 प्रतिशत था। 2017 में उसका वोट शेयर 22.2 प्रतिशत रहा और पार्टी महज 19 सीटों पर सिमट गई। लोकसभा चुनाव में भी पार्टी को खास फायदा नहीं मिला। 2009 में जहां बसपा को 21 सीटें मिली वहीं 2014 में शून्य पर पहुंच गई। 2019 में सपा के साथ गठबंधन करने पर पार्टी को 10 सीटें हासिल हुई। कह सकते हैं मायावती के लिए यह मुश्किल सफर रहा है।