संतों की धर्मसभा हो या किसान आंदोलन, मुद्दों पर हमेशा भारी पड़ जाती है राजनीति
रविवार 9 दिसंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में विश्व हिंदू परिषद ने विशाल धर्म सभा का आयोजन किया। संतों की इस धर्मसभा का उद्देश्य अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए केंद्र सरकार पर कानून बनाने के लिए दबाव डालना था। लेकिन इसी मंच से प्रमुख हिंदू संत स्वामी हंसदेवाचार्य ने कहा कि जब तक राममंदिर निर्माण का कार्य पूरा नहीं हो जाता, वे नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद से उतरने नहीं देंगे।
उनके इस बयान को विपक्ष ले उड़ा और कहा जाने लगा कि धर्मसभा मंदिर नहीं, भाजपा को सत्ता में वापस लाने के लिए हो रही थी। मंच से भी दो संतों ने इसका विरोध किया। ऐसा ही तब भी हुआ था जब संतों ने 3-4 नवंबर को तालकटोरा मैदान में धर्मसंसद आयोजित की थी। वहां भी हंसदेवाचार्य ने अगले लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को पीएम बनाने के लिए हिंदुओं को वोट देने की अपील की थी। यानी असली मुद्दे में मंदिर गायब होकर चुनाव आ गया।
इसी प्रकार, 29-30 नवंबर को आल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति ने 207 किसान संगठनों के साथ दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़ा प्रदर्शन किया था। लेकिन इस प्रदर्शन के दूसरे दिन राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, सीताराम येचुरी, शरद यादव और अतुल अंजान जैसे विपक्षी दलों के शीर्ष नेता आए और किसानों के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को उखाड़ फेंकने की बात कहने लगे।
मीडिया में इसे लोकसभा चुनाव से पहले ‘विपक्षी दलों की एकता’ के रूप में दिखाया। सत्ता पक्ष ने भी इस आंदोलन के पीछे विपक्षी दलों का ‘निहित राजनीतिक स्वार्थ’ बताया और किसानों का मूल मुद्दा पीछे छूट गया।
क्या कहते हैं आंदोलन के कर्ता-धर्ता
धर्मसभा के राजनीतिकरण पर जब विश्व हिंदू परिषद से प्रतिक्रिया ली गई तब उसके नेता डॉ. सुरेंद्र जैन ने कहा कि उनके मंदिर आंदोलन को भाजपा, नरेंद्र मोदी या अगले लोकसभा चुनाव से जोड़ना बिलकुल गलत है। क्योंकि उनकी सभा के मंच पर एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जिसे राजनेता कहा जा सकता हो।
दूसरी बात, राममंदिर का आंदोलन उस समय शुरू हो गया था जब आरएसएस, विहिप या भाजपा का कोई अस्तित्व ही नहीं था। आखिर उस समय किस राजनीतिक दल के लाभ के लिए आंदोलन किया जा रहा था। उन्होंने कहा कि संतों की इस सभा को राजनीतिक दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। हमारी मांग मंदिर बनाने की है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कांग्रेस आगे आए, हम उनका भी समर्थन करने के लिए तैयार हैं।
आल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति के संयोजक सरदार वीएम सिंह ने भी किसान आंदोलन के राजनीतिकरण से इनकार किया। उन्होंने कहा कि उनकी मांग संसद में किसानों के मुद्दे पर कानून बनाने के लिए है। जाहिर है कि यह काम राजनीतिक दल, राजनेता और सांसद ही करेंगे। ऐसे में उनके मंच पर उन दलों का आना स्वाभाविक था।