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Politics: यूपी में ब्राह्मण बनाम यादव पर घमासान; किसको होगा फायदा, किसका होगा नुकसान?
सार
यूपी में एक कथावाचक के साथ हुई अभद्रता के बाद प्रदेश में सियासी वबाल मचा हुआ है। अभद्रता का मामला अब जातियों की लड़ाई बन गया है। वहीं राज्य के प्रमुख राजनीतिक दल भी खुलकर इस मामले में सामने आ गए हैं।
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भाजपा-सपा
- फोटो : सोशल
विस्तार
यूपी में एक कथावाचक के साथ हुई अभद्रता के बाद इस पूरे मामले को 'ब्राह्मण बनाम यादव' का रंग देने की कोशिश की जा रही है। यादव समर्थक कुछ संगठनों ने इसे अपने स्वाभिमान का मुद्दा बनाते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लड़ाई तेज कर दी है। अखिलेश यादव ने पीड़ित कथावाचक को बुलाकर सम्मानित किया और इसे 'पीडीए का अपमान' बता दिया। इससे इस मामले पर राजनीति तेज हो गई है। भाजपा ने आरोप लगाया है कि अखिलेश यादव जातियों के आधार पर समाज में बंटवारा कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहे हैं।
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प्रदेश में राजनीतिक पार्टियां जातियों के नाम राजनीति करती रही हैं। जब मायावती ने 2007 में एससी और मुसलमानों के साथ ब्राह्मणों को अपने साथ लिया तो बसपा अकेले दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफल हो गई। इसी तरह जब 2012 में समाजवादी पार्टी ने यादव-मुसलमानों के साथ ब्राह्मणों को अपने साथ लिया तो वह पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में जा पहुंची। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि यदि ब्राह्मण और यादव समुदाय में दूरी पैदा होती है तो इससे अखिलेश यादव को राजनीतिक लाभ नहीं होगा। यूपी का राजनीतिक इतिहास तो यही बताता है।
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केवल यादवों के नेता होने से अखिलेश यादव को हुआ नुकसान
राजनीतिक पंडित मानते हैं कि 2012 में जब अखिलेश यादव यूपी के मुख्यमंत्री बने थे, तब उनकी सरकार ने बेहतर कामकाज किया था। जनता के बीच उनकी छवि एक पढ़े लिखे आधुनिक नेता की थी और इसलिए हर वर्ग की जनता से उन्हें खूब साथ दिया। लेकिन आरोप यही लगता है कि अखिलेश यादव की सरकार आने के बाद यादव समाज ने अपने आपको ज्यादा आक्रामक और प्रभावी ढंग से दिखाने की कोशिश की। आरोप यह भी है कि 'सत्ता में बैठे ऊपर के शीर्ष लोगों से पड़े दबाव' के कारण शासन-प्रशासन ने ऐसे अराजक लोगों पर उचित कार्रवाई नहीं की। इसका सबसे बड़ा नुकसान स्वयं अखिलेश यादव को हुआ। उनकी छवि यादव समाज के एक नेता की बनती चली गई।
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अखिलेश यादव की एक जाति वाले नेता के रूप में छवि बनते ही उनसे गैर जाटव दलित मतदाता दूर हो गए। समाज में तथाकथित दबंग जातियों की राजनीति से सबसे ज्यादा पीड़ित वही गैर जाटव दलित वर्ग था जिसकी राजनीति पीडीए के माध्यम से आज अखिलेश यादव करने की कोशिश कर रहे हैं। 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव का परिणाम बताता है कि दलित वर्गों के मन में समाजवादी पार्टी की राजनीति को लेकर आशंकाएं कमजोर नहीं पड़ी हैं।
अखिलेश को यहां से मिली उम्मीद
हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव के परिणामों ने समाजवादी पार्टी के मन में एक आशा का संचार अवश्य किया है। संविधान के मुद्दे पर राहुल गांधी के द्वारा खड़ी की गई लड़ाई का सीधा लाभ अखिलेश यादव को हुआ और सपा ने शानदार सीटों पर सफलता हासिल की। अब पीडीए की राजनीति को हवा देकर अखिलेश यादव लोकसभा चुनावों की सफलता को विधानसभा चुनावों में भी हासिल करना चाहते हैं। लेकिन ब्राह्मणों को दूर रखने की राजनीति उन्हें नुकसान पहुंचा सकती है।
भाजपा को भी नुकसान
यदि ब्राह्मण बनाम यादव जैसा विवाद गहराता है तो इससे भाजपा को भी नुकसान होगा। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने पश्चिम के सबसे कठिन मोर्चे पर भी शानदार प्रदर्शन किया था। इसका सबसे बड़ा कारण था कि भाजपा नेता अमित शाह ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट, गुर्जर और यादव सहित तमाम जातियों को राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के मुद्दे पर एकजुट करने में सफलता पाई थी।
2024 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा पूर्वी उत्तर प्रदेश की तुलना में पश्चिमी यूपी में ज्यादा सफल रही थी। यह जाटों, गुर्जरों और यादवों के साथ के बिना संभव न था। ऐसे में यदि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण बनाम यादव जैसा विवाद गहराता है तो इससे भाजपा को भी नुकसान ही होगा।
जातिवादी जहर बो रहे अखिलेश यादव- भाजपा
भाजपा प्रवक्ता एसएन सिंह ने अमर उजाला से कहा कि एक सामान्य विवाद को अखिलेश यादव जिस तरह जातियों की राजनीति में परिवर्तित करना चाहते हैं, उससे यही साबित होता है कि वे समाज में जातिगत बंटवारा कर इसका राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उन्हें भूलना नहीं चाहिए कि उनकी इसी विभाजनकारी सोच के कारण जनता ने 2017 से लेकर आज तक नकार दिया है।
एसएन सिंह ने कहा कि इस देश की शक्ति हर वर्ग के एक साथ चलने से है। यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार हर वर्ग, हर जाति को एक साथ लेकर आगे चल रही है और सबको एक समान रूप से योजनाओं का लाभ मिल रहा है। लेकिन कुछ लोगों को यूपी का यह ऐतिहासिक विकास पसंद नहीं आ रहा है। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव की इस विभाजनकारी राजनीति का कोई लाभ नहीं मिलेगा और जनता ही उनको सबसे सटीक जवाब देगी।
समाजवादी पार्टी में है ब्राह्मणों का सम्मान- सपा
सपा प्रवक्ता मो. आजम खान ने अमर उजाला से कहा कि उनकी पार्टी पर जातिगत राजनीति करने के आरोप लगाना पूरी तरह गलत है। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी अपने जन्म से लेकर आज तक हर वर्ग को साथ लेकर आगे चलती रही है। मुलायम सिंह यादव ने इसी आधार पर सबको साथ लेकर अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की थी जिसे अखिलेश यादव भी आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सपा पीडीए के साथ-साथ पूरे समाज और हर वर्ग को अपने साथ लेकर चलने की बात करती है।
मोहम्मद आजम खान ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार में ब्राह्मणों का अपमान हो रहा है। भाजपा के संगठन में भी ब्राह्मणों को उचित भागीदारी नहीं दी जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस तरह योगी सरकार में ब्राह्मणों का शासन-प्रशासन द्वारा उत्पीड़न बढ़ा है, वह भी यही इशारा कर रहा है कि यूपी सरकार ब्राह्मणों को अपने साथ नहीं लेकर चल रही है। सपा नेता ने कहा कि 2012 की तरह सपा हर वर्ग को साथ लेकर चुनाव में उतरेगी और जीत हासिल करेगी।