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अमर उजाला पोल: राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में आना चाहिए

Tue, 29 May 2018 08:06 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 29 May 2018 08:06 PM IST
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Political parties should come under the Right to Information Act
अमर उजाला पोल
चुनाव आयोग ने कहा है कि राजनीतिक दल सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून के दायरे से बाहर हैं। यह आदेश केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के उन निर्देशों के उलट है, जिनके अनुसार छह राष्ट्रीय दल इस पारदर्शी कानून के तहत आते हैं। 
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चुनाव आयोग ने एक आरटीआई आवेदन के जवाब में यह बात कही है। इसमें सीआईसी द्वारा जून 2013 में छह राष्ट्रीय दलों को आरटीआई के तहत लाने के बाद उन्हें मिले चंदे की जानकारी मांगी गई थी। केंद्रीय जन सूचना अधिकारी के बयान का जिक्र करते हुए अपीली आदेश में कहा गया है, ‘आवश्यक सूचना आयोग के पास उपलब्ध नहीं है। यह राजनीतिक दलों का मामला है। वे आरटीआई के दायरे से बाहर हैं। वे इलेक्टोरल बांड के माध्यम से जुटाए चंदे या धन की सूचना वित्त वर्ष 2017-18 की कंट्रीब्यूशन रिपोर्ट में चुनाव आयोग को सौंप सकते हैं। इसके लिए अंतिम तारीख 30 सितम्बर 2018 है। 
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पुणे के विहार ध्रुवे ने आरटीआई के माध्यम से छह राष्ट्रीय दलों, भाजपा कांग्रेस, बसपा, राकांपा, भाकपा और माकपा के अलावा समाजवादी पार्टी द्वारा इलेक्टोरल बांड से जुटाए गए चंदे की जानकारी मांगी थी। प्रथम अपीलीय अधिकारी और चुनाव आयोग में प्रमुख सचिव केएफ विलफ्रेड ने अपने आदेश में लिखा, वह सीपीआईओ के विचारों से सहमत हैं। 
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जिन सात राजनीतिक दलों के बारे में सूचना मांगी गई है उनमें से छह राष्ट्रीय दलों को आयोग की पूर्ण पीठ तीन जून 2013 को आरटीआई कानून के दायरे में लाई थी। इस आदेश को ऊपरी अदालत में चुनौती नहीं दी गई लेकिन राजनीतिक दलों ने आरटीआई आवेदनों को स्वीकारने से इनकार कर दिया। कई कार्यकर्ताओं ने सीआईसी के आदेश का पालन नहीं करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, जहां मामला लंबित है। 

इस विषय पर अमर उजाला डॉट.कॉम ने पोल कराया और पाठकों से सवाल पूछा कि 'क्या राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में आना चाहिए?' सवाल के जवाब में पाठकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।


कुल 3348 पाठकों ने पोल में हिस्सा लिया। 94.89 फीसदी (3177 वोट) पाठकों ने माना कि राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में आना चाहिए। जबकि 5.11 फीसदी (171) पाठकों ने माना कि राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में नहीं आना चाहिए। 
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