राजनीति में अवसरवाद: 'जगजीवन राम' और 'वीपी सिंह' बनने के चक्कर में पाला बदल रहे 'नेता', लेकिन जनता नहीं करती भरोसा
राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ एवं जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. आनंद कुमार कहते हैं, जो नेता, लोगों की परवाह किए बिना पार्टी छोड़ रहे हैं, उन्हें एक बात सदैव ध्यान रखनी चाहिए कि रावण को मारने में 'विभीषण' ने भले ही राम की मदद की थी, लेकिन आज भी समाज में विभीषण का सम्मान नहीं है...
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देश में अगले साल सात राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के मद्देनजर राजनीतिक हलचल शुरू हो गई है। खासतौर पर, उत्तर प्रदेश और पंजाब में नेताओं के पाला बदलने की खबरें मिल रही हैं। कोरोनाकाल में जनता क्या चाहती है, उसे कैसा राजनीतिक नेतृत्व चाहिए, इस बात को 'नेताजी' दरकिनार करते हुए धड़ल्ले से उस पार्टी में कूद पड़ रहे हैं, जहां उन्हें मनमाफिक सुविधा की गारंटी मिल रही है। कांग्रेस व भाजपा के अलावा क्षेत्रीय दलों के नेता भी पाला बदलकर खुद को 'जगजीवन राम और वीपी सिंह' बनाना चाह रहे हैं।
राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ एवं जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. आनंद कुमार कहते हैं, इन नेताओं को मालूम होना चाहिए कि 'जगजीवन राम और वीपी सिंह' ने कुछ सिद्धांतों और मुद्दों को लेकर पार्टी छोड़ी थी। सुविधा के लिए वे अवसरवादी नहीं बने थे। जो नेता, लोगों की परवाह किए बिना पार्टी छोड़ रहे हैं, उन्हें एक बात सदैव ध्यान रखनी चाहिए कि रावण को मारने में 'विभीषण' ने भले ही राम की मदद की थी, लेकिन आज भी समाज में विभीषण का सम्मान नहीं है।
कोरोना संक्रमण के बाद देश की राजनीति बदल गई है ...
डॉ. आनंद कुमार ने नेताओं के पाला बदलने को लेकर अमर उजाला डॉम के साथ एक खास बातचीत में कहा, कोरोना संक्रमण के बाद देश की राजनीति बदल गई है। नेताओं को यह बात जितना जल्दी समझ में आ जाए, उतना ही अच्छा है। अब लोगों तीन मुद्दों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। पहला, दवाई का मुद्दा है। लोगों ने कोरोना की पहली और दूसरी लहर में ये देख लिया है कि देश में स्वास्थ्य सुविधाओं का स्तर कैसा है। अब उन्हें अस्पताल, वैक्सीन और तीसरी लहर से बचाने वाले नेताओं की जरूरत है। लोगों की सोच है कि जब उनका जीवन सुरक्षित नहीं है तो वे परंपरागत राजनीति में खुद को क्यों उलझाएंगे। दूसरा विषय कमाई का है। सरकारी कर्मियों से लेकर प्राइवेट संगठनों का हाल जनता के सामने है। नौकरियों पर संकट है। वेतन काटा जा रहा है। लंबे समय से डीए जैसे भत्तों पर रोक लगी है। असंगठित क्षेत्रों का तो और भी बुरा हाल है। मजदूरी किसे मिली और किसे नहीं, ऐसी खबरें लोगों को पढ़ने के लिए मिल जाती हैं। सरकार को नगद राशि और मुफ्त अनाज देने की घोषणा करनी पड़ी है।
पढ़ाई की भूख को क्या नेताजी महसूस कर पा रहे हैं
प्रो. कुमार ने कहा, कोरोनाकाल में तीसरा अहम तथ्य पढ़ाई का है। अभिभावक यह महसूस कर रहे हैं कि बच्चों में पढ़ाई की भूख है। वे अपने करियर को लेकर संजीदा हैं। ऑनलाइन पढ़ाई तो मुट्ठीभर प्राइवेट स्कूलों में ही संभव हो पा रही है। अनेक जगहों पर तो औपचारिकता ही है। सामान्यकाल में ही जब पढ़ाई और उसके तरीके पर सवाल खड़े हो रहे थे तो अब कोरोना में जब कक्षा ही नहीं लग रही हैं तो स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। देश में तीस फीसदी लोगों के पास इंटरनेट ही नहीं है। इन तीन बातों को लेकर लोग अपना राजनीतिक नेतृत्व तय करेंगे। जो पार्टी या नेता, इन बातों पर खरा उतरेगा, उसे समर्थन और वोट दिया जाएगा। अवसरवादिता वाले नेताओं को जनता स्वीकार करेगी, इसमें बहुत संशय है।
दूसरे दलों के नेताओं को पचा पाना आसान नहीं है...
आजकल, तमाम पार्टियों में इधर-उधर जाने का सिलसिला शुरू हुआ है। राजनीतिक दलों में भी ऐसे नेताओं को शामिल करने की होड़ मची है। ऐसा भी नहीं कि राजनीतिक दलों को इसका परिणाम नहीं मालूम। अतीत में ऐसे अनेकों उदाहरण रहे हैं, जहां इन नेताओं के साथ 'माया मिली न राम' वाली कहावत चरितार्थ हुई है। पश्चिम बंगाल में भाजपा ने दूसरे दलों के नेताओं को अपना बनाने के लिए बहुत जल्दबाजी दिखाई थी। जब चुनाव का नतीजा आया तो पार्टी को सबक मिल गया कि दूसरे दलों के नेताओं को वे तो स्वीकार कर सकते हैं, मगर जनता के लिए उन्हें पचा पाना मुश्किल होता है। अवसरवादी नेता का विश्वास खत्म हो जाता है। जनता में यह संदेश पहुंच जाता है कि वह नेता अंदर से कमजोर है। कोरोनाकाल के बाद जनता आसमान तक पहुंचने की हिम्मत रखने वाले घोड़े पर दांव लगाएगी।