सपा के घमासान के बीच यूं पल-पल बढ़ता रहा अखिलेश का कद
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समाजवादी पार्टी में मचे घमासान के बीच अब पार्टी पूरी तरह दो फाड़ हो गई है। अखिलेश यादव ने रविवार को लखनऊ में बुलाए अधिवेशन में मुलायम को हटाकर खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल ली। हालांकि पिता का मान सम्मान रखते हुए अखिलेश ने उन्हें संरक्षक तो बनाया लेकिन शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटाने में देर नहीं की।
अब मुलायम और शिवपाल सपा में अपनी साख बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं तो अखिलेश पार्टी पर कमान की। फिलहाल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सामने मुलायम-शिवपाल दोनों असहाय दिख रहे हैं। राजनीति के जानकारों की मानें तो अखिलेश का कद पार्टी में अचानक ही नहीं बढ़ा, बल्कि पार्टी के भीतरी घमासान के बीच वह लगातार खुद को मजबूत करते रहे।
खासकर इस दौरान उनके कई सख्त निर्णयों ने उनका कद बढ़ाने में बहुत मदद की। आइए, अखिलेश के राजनीतिक करियर और इसके बाद लगातार बढ़ते गए उनके कद पर डालते हैं एक निगाह।
साल 2000 में कन्नौज से सांसद बनकर की थी राजनीति की शुरूआत
इसके बाद साल 2004 के चुनावों में वह एक बार फिर कन्नौज से ही जीतकर लोकसभा पहुंचे। इस दौरान वह कई समितियों के सदस्य भी रहे। इसके बाद साल 2009 में हुए लोकसभा चुनावों में उन्होंने तीसरी बार संसद पहुंचकर जीत की हैट्रिक पूरी की।
साल 2004 से 2012 तक अखिलेश यादव संसद की ग्रामीण विकास समिति, विभिन्न विभागों के लिए कंप्यूटर का प्रावधान करने संबंधी समिति, विज्ञान और तकनीकी मामलों की समिति और वन और पर्यावरण मामलों की समिति के भी सदस्य रहे।
अपनी वाकपटुता और राजनीतिक कौशल के चलते पिता मुलायम सिंह ने साल 2011 में उन्हें एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी। मुलायम ने शिवपाल को हटाकर अखिलेश यादव को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया।
इसके बाद अखिलेश ने राजनीतिक रूप से खुद को काफी मजबूत किया। वह पहली बार तब सुर्खियों में आए जब नवंबर 2011 में प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी की सरकार के खिलाफ तीन दिवसीय प्रदेश स्तरीय आंदोलन की शुरूआत की। इसके बाद मायावती सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जिसके विरोध में भड़के सपा कार्यकर्ताओं ने उनकी रिहाई की मांग को लेकर ख्ाूब हंगामा हुअा।
2011 में पिता अखिलेश ने बनाया प्रदेश अध्यक्ष
इसके बाद अखिलेश की लोकप्रियता में तेजी से इजाफा हुआ और वो युवाओं में जबरदस्त लोकप्रिय हुए। अखिलेश ने इसके बाद प्रदेश सरकार के खिलाफ प्रदेशव्यापी आंदोलन चलाया और युवाओं को खुद से जोड़ने के लिए उनसे तमाम वादे किए। जिनमें चुनाव जीतने पर 12वीं पास करने वाले छात्रों को फ्री लैपटॉप और कन्याविधा धन जैसे लोकप्रिय वादे भी थे, जिन्होंने उन्हें सत्ता में लाने में काफी मदद की।
इसके बाद सूबे में हुए आम चुनावों में अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी ने ऐसा करिश्माई प्रदर्शन किया कि अच्छे अच्छे राजनीतिक पंडित हैरान रह गए। ये ऐसा चमत्कार था जिसे तीन बार मुख्यमंत्री रहे उनके पिता मुलायम सिंह यादव भी कभी नहीं कर पाए। अखिलेश के राजनीतिक कौशल की बदौलत सपा ने पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सूबे में अपने दम पर सरकार बनाई। इसके बाद 38 साल की उम्र में उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लोकसभा सीट छोड़कर वह विधान परिषद से विधान सभा में पहुंचे।
हालांकि शुरूआती चार साल पार्टी में सबकुछ ठीक ठाक चलता रहा, लेकिन साल 2016 के मध्य में पूर्वांचल के डॉन मुख्तार अंसारी की पार्टी के सपा में विलय को लेकर अखिलेश की अपने ही परिवार के लोगों से ठन गई। आलम ये रहा कि अखिलेश ने चाचा शिवपाल को भी मंत्रीमंडल से बर्खास्त कर डाला। बदले में उनके पिता मुलायम सिंह ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटा दिया। इसके बाद सपा की राजनीति में ऐसा तूफान आया कि अभी तक थमने का नाम नहीं लिया। लेकिन इस बीच अखिलेश लगातार खुद को मजबूत करते रहे।
मुलायम को हटाकर खुद बने राष्ट्रीय अध्यक्ष
इसके बाद प्रदेश अध्यक्ष बने शिवपाल यादव ने अखिलेश के नजदीकियों को पार्टी से बाहर करना शुरू कर दिया, इस दौरान थोक के भाव अखिलेश समर्थकों के टिकट काटकर शिवपाल ने अपने करीबियों को दे दिए। इस बात ने चाचा भतीजे के बीच नई अदावत शुरू कर दी।
शिवपाल ने मुलायम की सहमति से 350 से ज्यादा प्रत्याशियों की सूची जारी की जिसमें अखिलेश समर्थकों को एक बार फिर बाहर कर दिया गया। नतीजा ये हुआ कि अखिलेश ने चुनावों के लिए अपने प्रत्याशियों की नई लिस्ट जारी कर दी। इसके बाद पिता और राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह ने उन्हें और रामगोपाल को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया।
इसके एक दिन बाद ही अखिलेश ने फिर अपनी ताकत जुटाई और मुख्यमंत्री कार्यालय पर सपा विधायकों और जनप्रतिनिधियों की बैठक बुलाई। जिसमें भारी संख्या में सपा नेता और जनप्रतिनिधि पहुंचे। अखिलेश की ताकत देख 20 घंटे में ही मुलायम सिंह को अपना निर्णय वापस लेना पड़ा और अखिलेश-रामगोपाल का निष्कासन खत्म करना पड़ा।
वहीं साल की नई सुबह में समाजवादी पार्टी ने राजनीति का नया सूरज देखा, जब अखिलेश ने जनेश्वर मिश्र पार्क में बुलाए गए पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में मुलायम को हटाकर खुद को राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया। मुलायम को पार्टी का संरक्षक बनाया गया। शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटा दिया गया।