कानों देखी: क्या सीएम नीतीश कुमार बाजी समेटने में लगे हैं?
कभी वह आरसीपी ही थे जो न केवल राज्यसभा में आए, बल्कि मोदी सरकार-2 में मंत्री भी हो गए। अब वही आरसीपी हैं, जो राज्यसभा का टिकट भी नहीं पा सके और पार्टी ने संपत्ति के ब्यौरे और उस पर सफाई मांग ली। जिसके जवाब में आरसीपी यानी रामचंदर बाबू ने पार्टी से अपना नाता तोड़ लिया...
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राजनीति है तो राजनीति की बात होगी। चाल, चरित्र, चेहरा भी होगा। ताजा मामला बिहार का है। जहां इसके कई रंग देखने को मिल रहे हैं। कभी दिल पर राज करने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह अब जदय़ू से ही बाहर हैं। कभी वह आरसीपी ही थे जो न केवल राज्यसभा में आए, बल्कि मोदी सरकार-2 में मंत्री भी हो गए। अब वही आरसीपी हैं, जो राज्यसभा का टिकट भी नहीं पा सके और पार्टी ने संपत्ति का ब्यौरा और उस पर सफाई मांग ली है। जिसके जवाब में आरसीपी यानी रामचंदर बाबू ने पार्टी से अपना नाता तोड़ लिया। जदयू वाले कहते हैं कि पहले दिल्ली वाले साझा दल के नेता ने बाजी शुरू की थी। अब पटना वाले नेता जी इस बाजी को समेट रहे हैं। कभी उनमें जदयू को रब दिखता था। नालंदा से बस दो कुर्मी नेता थे। अब आरसीपी में 'एकनाथ शिंदे' दिखता है। रही बात अंदरखाने की तो इसे ललन सिंह (राजीव रंजन सिंह) से बेहतर कौन समझ सकता है। वहीं भाजपा है कि हाथ बांधकर किनारे खड़ी है।
भाजपा मौन: बिना आग लगे धुआं नहीं उठता स्मृति जी
केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की बेटी जोइश ईरानी गोवा के रेस्त्रां और बार के बहाने सफल आंत्रपेन्योर हैं या नहीं? इसका जवाब जांच के बाद ही मिलेगा, लेकिन देश के चौथे स्तंभ ने केंद्रीय मंत्री को आईना दिखा दिया है। इस आईना को केंद्रीय मंत्री ने कितना देखा, कह नहीं सकते। लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने जरूर संज्ञान में लिया होगा। भाजपा के नेताओं ने इसे न केवल संज्ञान में लिया है, बल्कि अंदरखाने में ईरानी का नाम आते ही चर्चा करते हैं। उत्तर प्रदेश के एक भाजपा सांसद कहते हैं कि बिना आग लगे, धुआं कैसे उठ सकता है। भाजपा मुख्यालय के एक वरिष्ठ नेता से इस बारे में प्रतिक्रिया लेने पर उन्होंने साफ कहा कि आपको कोई और काम नहीं है? आप नेशनल हेराल्ड केस में हुए घोटाले पर सवाल क्यों नहीं पूछते? बाद में पता चला कि पार्टी ने अपने नेताओं को इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देने से बचने की सलाह दी है। बताते हैं कि एक तरफ प्रवर्तन निदेशालय ने शिवसेना के नेता संजय राउत के खिलाफ जांच तेज करते हुए उन्हें गिरफ्तार किया है। आम आदमी पार्टी के मंत्री सत्येंद्र जैन जेल में हैं। एनसीपी के दो मंत्री अनिल देशमुख और नवाब मलिक जेल में हैं। नेशनल हेराल्ड केस में ईडी अपना काम कर रही है। ऐसे में भाजपा के नेता और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के मामले में खुलकर कैसे खड़े हो सकते हैं? बताते हैं इसलिए इस मामले को स्मृति ईरानी के विवेक पर छोड़ दिया गया है। साथ में यह भी कि वह (ईरानी) सावधानी रखना न भूलें।
राहुल गांधी को अब कानूगोलू पर है भरोसा
कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भी गजब हैं। कब किसे सिर पर चढ़ा लें और कब उसे जमीन पर उतार दें, वही जानते हैं। इन दिनों सुनील कानूगोलू का क्रेज है। कभी यही रुतबा के राजू, अलंकार सवाई, संदीप सिंह, पीएल पूनिया को हासिल था। कांग्रेस छोड़कर भाजपा के प्रवक्ता बने शहजाद पूनावाला तो मनचाहे तरीके से बात कर लेते थे। कौशल विद्यार्थी को छोड़ दें तो राहुल के निजी सचिवालय से पार्टी के कोर ग्रुप में इन-आउट की सूची निराली है। संदीप सिंह ही थे जिन्होंने राहुल गांधी से चौकीदार चोर बुलवा दिया था। अब सुनील कानूगोलू नए-नए प्रयोग करा रहे हैं। हालांकि सुनील कानूगोलू चुनाव प्रचार अभियान के रणनीतिकार हैं। राहुल गांधी को उनमें प्रशांत किशोर नजर आते हैं। वह कानूगोलू ही हैं जिन्होंने कर्नाटक के प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार की किरकिरी करा दी है। वहीं डीके शिवकुमार जो कांग्रेस अध्यक्ष के पूर्व राजनीतिक सचिव अहमद पटेल के इशारे पर फिरकी की तरह नाचते थे, जिन्होंने भाजपा के कोर नेताओं से पंगा लेने में संकोच नहीं किया और जिनके रिजॉर्ट में कभी कांग्रेस के विधायकों को सुरक्षित रखा गया था। लेकिन कानूगोलू की कानाफूसी पर राहुल गांधी अब उन्हें जरा कम भाव देते हैं। यह बात अलग है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट की तरह ही सोनिया गांधी डीके शिवकुमार को भी अपने बेटे जैसा मानती हैं।
ईडी की पूछताछ और आम आदमी पार्टी का दर्द
दर्द भी ऐसा कि न कहा जाए, न सहा जाए। इस बार यह दर्द आम आदमी पार्टी के नंबर दो के नेता मनीष सिसोदिया को हो रहा है। दर्द के पीछे की बड़ी वजह दिल्ली में शराब की नीति है। इस नीति ने जहां चमकती दुकानों पर पियक्कड़ों की लाइन लगा दी है, वहीं दिल्ली के आमजन इससे नाराज हैं। इसे यूं कह लें कि 2014 के बाद पहली बार भाजपा के हाथ में कोई ठोस मुद्दा आया है। वहीं आम आदमी पार्टी के नेता और मंत्री सत्येंद्र जैन पहले से ही जेल में हैं। इस दर्द की एक वजह और है। ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) अपनी जांच में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को भी नहीं छोड़ रहा है। सीबीआई का हाल भी कोई राहत देने वाला नहीं है। ऐसे में जब से दिल्ली की शराब नीति को लेकर भाजपा हल्ला मचा रही है और उप राज्यपाल जांच का शिकंजा कसने की तैयारी कर रहे हैं, तब से पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल और सिसोदिया का ब्लड प्रेशर भी बढ़ रहा है। सिसोदिया पहले से ही टारगेट पर हैं। हर राज्य के चुनाव में आम आदमी पार्टी दिल्ली में स्कूल सुधार और मुफ्त बिजली-पानी का प्रचार करने से नहीं चूकती। स्कूल सुधार के मुख्य किरदार तो सिसोदिया ही हैं। सिसोदिया को फंसाने को लेकर अरविंद केजरीवाल दो-तीन बार भविष्यवाणी भी कर चुके हैं। लेकिन कहते हैं कि आंच है तो जलाएगी ही। अब जैसे-जैसे आबकारी नीति की परतें, अध्ययन रिपोर्ट खुल रही है, एसी में बैठे नेताओं को पसीना आ रहा है। अब आम आदमी पार्टी के नेता नंबर-दो ने नई शराब नीति का ठीकरा पूर्व उपराज्यपाल अनिल बैजल पर फोड़ दिया है। भाजपा के नेता इसे उनकी बौखलाहट के तौर पर देखने लगे हैं।
मंहगाई पर कांग्रेस का दम और भाजपा का राष्ट्रवाद
मंहगाई, जीएसटी को लेकर कांग्रेस पार्टी ने अपना दम दिखा दिया। कराहती जनता से सीधे कनेक्ट होते मुद्दे पर दम दिखाने में सबसे अहम रणनीति रही। संसद से राहुल गांधी ने, तो 24, अकबर रोड से प्रियंका गांधी वाड्रा ने मोर्चा संभाला। आईटी सेल से लेकर कांग्रेस के नेताओं को इसके बाबत बाकायदा तरीके बताए गए। संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया। पांच अगस्त के दिन का चुनाव और विरोध के लिए काले रंग के कपड़े नें भाजपा आला कमान के माथे पर पसीना ला दिया। सबसे बड़ी बात खुद सोनिया गांधी का उत्साह रहा। बड़े अर्से बाद किसी प्रदर्शन में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने स्वास्थ्य कारणों की परवाह न करते हुए हिस्सा लिया। हिस्सा लेने में वह इस कदर उत्साहित थीं कि लोकसभा के वेल में चली गईं। हारकर सीट पर बैठे कार्ति चिदंबरम और शशि थरूर को भी वेल में आना पड़ा। बताते हैं कांग्रेस पार्टी के मंहगाई, जीएसटी पर विरोध की भनक केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और रणनीतिकारों को लग गई थी। लिहाजा उन्हें आजादी के 75 साल के उपलक्ष्य में मनाए जाने वाले अमृत महोत्सव को राष्ट्र उत्सव का रूप देने की पहल थोड़ा पहले करनी पड़ी।
अखिलेश यादव के दिल में क्या चल रहा है?
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव इन दिनों थोड़ा परेशान चल रहे हैं। अखिलेश के करीबी नेता बताते हैं कि कई तरह की चुनौतियां हैं। ऊपर से भाजपा के रणनीतिक तरीके ने मूल्यों की राजनीति को बड़ा झटका दे दिया है। भरोसे के नेताओं का टोटा है। चाचा शिवपाल का रंग अखिलेश ने समय रहते भांप लिया था। उन्हें लग रहा था कि एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकतीं। बाद में ओम प्रकाश राजभर ने झटका दे दिया। अपना दल की नेता और अनुप्रिया पटेल की मां कृष्णा पटेल को भी कुछ चाहिए। यहां तक कि रालोद के जयंत चौधरी को लेकर भी वह सतर्क निगाह लगाए हैं। जयंत चौधरी राज्यसभा सदस्य हो गए हैं। उन्हें अखिलेश ने यह सीट अपनी पत्नी डिंपल के स्थान पर दी थी। इसके लिए जयंत की पत्नी चारू ने डिंपल से सीधे बात की थी। अब जयंत के सलाहकार कई जाट नेता उन्हें समझाने में लगे हैं कि वह पॉवर पॉलिटिक्स को समझकर भविष्य का फैसला करें। भाजपा के रणनीतिकारों को भी जयंत में उम्मीद दिखाई देती है। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल से उनकी अच्छी निभती है। इस तरह की तमाम खबरें भी आए दिन अखिलेश के पास पहुंचती रहती हैं। हालांकि जयंत अभी शाहजहां रोड का बंगला आवंटित होने के बाद से खामोश हैं।