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कानों देखी: पीएम मोदी के ऑपरेशन बालाकोट की नकल करने में फंस गए राष्ट्रपति ट्रंप!

Fri, 10 Jan 2020 04:18 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 10 Jan 2020 04:18 PM IST
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political gossip: US President Donald Trump trapped in copying of Balakot strike done by PM Modi
अमेरिकी सैनिकों के साथ डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : PTI (File)
क्या जुमला है? खूब चल रहा है। विदेश मंत्रालय के अधिकारी से लेकर रक्षा मंत्रालय और विभिन्न मंत्रालय के अफसरों के चेहरे पर सुनकर हंसी आ जाती है। जैसे ही कहिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऑपरेशन बालाकोट की नकल करने में राष्ट्रपति ट्रंप फंस गए, सब इस कदर मुस्करते हैं, मानो बात सच हो। इसका कारण भी है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के आतंकियों के ठिकाने पर हमला किया था। जब यह हमला हुआ तो उस समय भारत में लोकसभा चुनाव 2019 का बुखार बढ़ रहा था। राजनीतिक गलियारे में माना जाता है कि 2016 में भारतीय थल सेना के कमांडो की गई सर्जिकल स्ट्राइक की तरह इस आपरेशन ने पूरे देश में राष्ट्रवाद की लहर फैला दी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा 303 सीटें लेकर आ गई। यही अमेरिका में भी दिखाई दे रहा है।

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वहां भी राष्ट्रपति चुनाव होना है। राष्ट्रपति ट्रंप को दूसरा कार्यकाल चाहिए। ट्रंप अमेरिका में राष्ट्रवादी नेता के तौर पर पसंद किए जा रहे हैं। ईरान के सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी और उनके डिप्टी चीफ समेत अन्य को मानव रहित विमानों की गाइडेड बमबारी में मार गिराने के बाद ट्रंप की टीआरपी और बढ़ रही है।
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वह खुद कह रहे हैं उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े आतंकी, अमेरिका का नुकसान करने वाले सुलेमानी को मार गिराया। यानी राष्ट्रवाद की हवा को धार दे रहा हैं। यह बात अलग है कि अमेरिकी कांग्रेस ने राष्ट्रपति ट्रंप के ईरान के खिलाफ युद्ध लेने के अधिकार को सीमित कर दिया है।

डा. जोशी ने फिर पढ़ाया पीएम मोदी को पाठ

डा. मुरली मनोहर जोशी की स्पष्टवादिता से उनके प्रशंसक भी परेशान हैं। डा. जोशी से सच कहे बिना रहा नहीं जाता। उनके प्रशंसकों का मानना है कि वह ऐसा करके बिना बजह का बैर मोल रहे हैं। ताजा मामला जेएनयू में छात्रों के विरोध से जुड़ा है। डा. जोशी ने देखा कि तावा पूरी तरह से गरम हैं, तो उन्होंने केंद्र सरकार को नैतिकता का पाठ पढ़ा दिया।

उन्होंने कहा कि जेएनयू के कुलपति एम जगदीश कुमार को पद से हटा दिया जाना चाहिए। जोशी के ट्वीट करते ही यह मुद्दा जंगल में आग की तरह फैल गया है। बताते हैं भाजपा के एक बड़े वर्ग से डा. जोशी का यह ट्वीट हजम नहीं हो रहा है। इससे पहले भी डा. जोशी ने मोदी सरकार के चार साल पूरा होने पर सरकार को आईना दिखाया था।

इंदौर के एक कार्यक्रम में जब मीडिया ने केंद्र सरकार के चार साल के कार्यक्रम पर डा. जोशी से 10 अंक में से कितना नंबर देने का सवाल पूछा तो डा. जोशी ने कहा था कि परीक्षार्थी ने कॉपी में जब कुछ लिखा ही नहीं तो वह कौन सा नंबर दें। गंगा सफाई अभियान पर भी डा. जोशी ने सवाल खड़ा किया है।

हालांकि डा. जोशी भाजपा के संस्थापक नेताओं में हैं और उनका कहना है कि वरिष्ठ नेता के तौर पर पार्टी और सरकार को रास्ता दिखाना उनका दायित्व है।

 

आखिर सीडीएस जनरल रावत कौन सा तीर मारेंगे?

पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल प्रकाश कटोच समेत तमाम सैन्य अधिकारी मौजूदा सीडीएस के स्ट्रक्चर को लेकर हैरान हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि केंद्र सरकार ने सेना को सीडीएस का पद दे दिया। पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत को पहला सीडीएस भी नियुक्त कर दिया गया है, लेकिन आखिर वह तीर कौन सा मारेंगे?

टिप्पणी तो यह भी चल रही है कि यह मानद उपाधि जैसा पद है। इससे तीनों सैन्य बलों की आपरेशनल क्षमता, समन्वय, संवाद में कोई गुणात्मक परिवर्तन होने की संभावना नहीं है। इतना ही नहीं मौजूदा सीडीएस समेत सैन्य बलों पर पहले की तरह ही नौकरशाही का दबदबा बना रहेगा।

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक सीडीएस के स्टाफ में भी दो संयुक्त सचिव, 12 डिप्टी सेक्रेटरी, 22 अंडर सचिव स्तर के सिविल अधिकारी हैं। पूर्व सैन्य कमांडरों का कहना है कि जब सिविलियन डंडे से सेना को हांकना है, तो फिर ऐसे सीडीएस की क्या जरूरत?

वे तो रक्षा मंत्री या रक्षा सचिव के सलाहकारभर रह जाएंगे? वैसे भी सीडीएस जनरल रावत को भी तीनों सैन्य प्रमुखों की तरह रक्षा सचिव को ही रिपोर्ट करना है।

 

महाराष्ट्र-झारखंड के नतीजों से विपक्ष लगा है मुस्कराने

महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की खूब किरकिरी हुई। हरियाणा के चुनाव में भी भाजपा जादू नहीं दिखा सकी। झारखंड के चुनाव में भाजपा को मुंह की खानी पड़ी। इससे कांग्रेस समेत आम आदमी पार्टी, राजद, तृणमूल कांग्रेस, बसपा सभी चेहरे खिल गए हैं।

ममता बनर्जी तो अब एक बार फिर तेवर दिखाने लगी हैं। समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव को भी लग रहा है कि भाजपा से जनता की नाराजगी फिर तेजी से बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से जनता की नाराजगी 'दिन दूनी, रात चौगुनी' गति से बढ़ रही है। लिहाजा अखिलेश अपनी साइकिल झाड़ने-पोंछने में जुट गए हैं।

उनके चाचा शिवपाल घर की खिड़की से अखिलेश के बुलावे की राह देख रहे हैं। कांग्रेस को भी लग रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता भले धीरे-धीरे गिर रही हो, लेकिन उनके नाम पर अब राज्यों में सफलता मिलने का पैमाना कमजोर हो गया है।

राजद के तेजस्वी यादव भी यही सोच रहे हैं। हालांकि भाजपा के प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल का कहना है कि गलतफहमी में भी लोगों का जीने का अधिकार है। इसे हम कैसे दूर कर सकते हैं।

 

सबसे ज्यादा हमले राहुल गांधी पर

कांग्रेस के रणनीतिकारों को एक बात चौंका रही है। कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी अभी भी सत्ता पक्ष के नेताओं के सबसे अधिक निशाने पर हैं। हालांकि राहुल के मुकाबले प्रियंका गांधी की तरफ निशाना तेजी से शिफ्ट हुआ है, लेकिन राहुल पर भी हमला बना है। जबकि राहुल गांधी इस समय केवल कांग्रेस पार्टी के कवल सांसदभर हैं।

दरअसल सोनिया गांधी के खराब स्वास्थ्य को देखते हुए सत्ताधारी दल भाजपा मानकर चल रही है कि इस साल कांग्रेस को नया अध्यक्ष मिलेगा। यह पद फिर राहुल गांधी ही संभालने वाले हैं। राहुल गांधी की युवा ब्रिगेड भी इसी आस में अपने सुनहरे दिन का सपना देख रही है।

कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि यही वजह है, भाजपा के मुख्य निशाने पर राहुल ही हैं। ताकि राहुल गांधी कभी भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को टक्कर न दे पाएं।

 

दिल्ली चुनाव : लोहा लोहे से ही कटेगा

भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी तीनों एक ही सिद्धांत पर विधानसभा चुनाव में उतरने की रणनीति बना रही हैं। विधानसभा चुनाव घोषणा पत्र में सभी पार्टियां बड़े-बड़े वादे करने की तैयारी कर रही हैं। इन वादों में मकान, बिजली, पानी अपनी जगह बनाए हुए हैं। सब जनता को मुफ्त की सौगात देने के नाम पर ही सत्ता में आने का सपना देख रही हैं।

भाजपा के नेताओं का मानना है कि भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाकर इसी तरकीब से अरविंद केजरीवाल ने शीला दीक्षित के तैयार किए मजबूत किले को ढहा दिया था। इसलिए टेक्निक केजरीवाल से ही आम आदमी पार्टी की दिल्ली की दिवार गिराई जा सकती है। चुनावी प्रबंधकों का मानना है कि इसमें राष्ट्रवाद का मुद्दा जरूर हथियार बनेगा, लेकिन इससे या फिर प्रधानमंत्री समेत किसी की छवि से कुछ खास नहीं होने वाला है।
 

कुछ इसी तरह का विचार कांग्रेस का भी है। कांग्रेस पार्टी अपने मजबूत नेताओं का कंधा खोज रही है। समझा जा रहा है कि 14 जनवरी के बाद प्रत्याशियों की घोषणा शुरू हो जाएगी। नेताओं को उम्मीद है कि जनता की नाराजगी, शीला दीक्षित की सरकार के कामकाज और जनता को सौगात का नारा कुछ भला कर सकता है।
 

आम आदमी पार्टी सौगातों के सिलसिले को जारी रखेगी। उसे भरोसा है कि जनता उसके वादे पर विश्वास करेगी, क्योंकि उसने पांच साल में जनता को काफी कुछ मिलता हुआ दिखा दिया है। आम आदमी पार्टी के नेता इस बात से खुश हैं कि भाजपा के पास बारात तो पूरी है, लेकिन इस बारात में दूल्हे का अता-पता नहीं है।

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