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कानों देखी: क्या खतरे में है गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा की कुर्सी?

Tue, 14 Dec 2021 07:46 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Tue, 14 Dec 2021 07:46 PM IST
सार

अजय मिश्रा उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या से नजदीकी रिश्ता रखते हैं और अंदरखाने में यह राजनीतिक पाइप केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से जुड़ती है। बताते हैं कि किसान आंदोलन समाप्त कराने में भी केंद्र  सरकार के रणनीतिकारों ने लखीमपुर खीरी का मुद्दा और टेनी की बर्खास्तगी की मांग पर जोर न देने की शर्त रखी थी। केंद्र सरकार इस मामले को ठंडे बस्ते में डालना चाहती है...

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Political Gossip: SIT report in Lakhimpur kheri violence case has raised the political temperature by calling the violence a well-planned conspiracy
केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र टेनी के साथ अमित शाह। - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

भाजपा नेताओं के कान में खुजली हो रही है। खुजली का कारण लखीमपुर हिंसा मामले में एसआईटी की रिपोर्ट है। इस रिपोर्ट में एसआईटी ने हिंसा की घटना को सुनियोजित साजिश बताकर सियासी पारा चढ़ा दिया है। विपक्ष इसको लेकर हमलावर है और भाजपा के नेता तथा उत्तर प्रदेश के मंत्री खामोश। सभी को पता है कि लखीमपुर खीरी कांड के मुख्य आरोपी आशीष मिश्रा केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी का बेटा है। अजय मिश्रा उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या से नजदीकी रिश्ता रखते हैं और अंदरखाने में यह राजनीतिक पाइप केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से जुड़ती है। बताते हैं कि किसान आंदोलन समाप्त कराने में भी केंद्र  सरकार के रणनीतिकारों ने लखीमपुर खीरी का मुद्दा और टेनी की बर्खास्तगी की मांग पर जोर न देने की शर्त रखी थी। केंद्र सरकार इस मामले को ठंडे बस्ते में डालना चाहती है। जबकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी सरकार पर कोई तोहमत नहीं लगने देना चाहते। इसके पीछे दो बड़े कारण हैं, पहला तो यह कि टेनी की लखीमपुर खीरी के एक भाजपा नेता नहीं पटती और उन्हें मुख्यमंत्री की छाया प्राप्त है। दूसरे, इस जांच प्रक्रिया पर उच्चतम न्यायालय की भी नजर है और एसआईटी का गठन भी अदालत के निर्देश पर हुआ है।

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कांग्रेस और बसपा को छोड़कर उत्तर प्रदेश में दिखेगी विपक्ष की राजनीतिक एकता

अभी गोमती नदी में खूब पानी बहने वाला है। सूबे के कोने-कोने से रथयात्रा को लेकर अखिलेश जब पार्टी मुख्यालय लखनऊ पहुंचेंगे तो विपक्ष की राजनीतिक एकता दिखाई देने के संकेत हैं। ममता बनर्जी के राजनीतिक सलाहकार प्रशांत किशोर ने कोशिश शुरू कर दी हैं। तृणमूल कांग्रेस के पश्चिम बंगाल के सूत्र बताते हैं कि अभिषेक बनर्जी भी कुछ ऐसा ही चाहते हैं। लालू प्रसाद यादव ने तेजस्वी की शादी में अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश विजयी भव का आशीर्वाद दे दिया है। तेजस्वी भी इसी मंशा के बताए जा रहे हैं। शरद यादव के अनुयाइयों ने समाजवादी पार्टी में जनता दल और समाजवाद का अक्स देखना शुरू किया है। शिवसेना के उद्धव ठाकरे और एनसीपी के शरद पवार को भी लग रहा है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की रफ्तार को धीमा करना जरूरी है। अगर अखिलेश यादव एक-दो सीट वाम दलों को दे दें, तो मामला इधर से भी बन जाएगा। कोशिशें तेज हो गई हैं। इतने सारे अवसर देखकर अब अखिलेश यादव के रणनीतिकार भी कन्फ्यूज होने लगे हैं। कन्फूयज होने की वजह भी है। अखिलेश की रथयात्रा में उमड़ रही भीड़ ने कुछ ज्यादा ही उत्साहित कर दिया है। सपाई कहने भी लगे हैं कि कांग्रेस और बसपा को छोड़कर अब तो सब हमारे साथ हैं। आखिर सूबे की जनता को और क्या चाहिए?

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विपक्ष चाहे जितना सिर पीटे, लेकिन आएंगे योगी और मोदी

आप इसे भाजपा का अति विश्वास कह सकते हैं, लेकिन बात में थोड़ा दम है। भाजपा के लिए राज्यों में चुनाव के लिए सर्वे, सोशल मीडिया पर अभियान समेत तमाम प्रयासों से जुड़े रणनीतिकार ने यह दावा किया है। प्रचार अभियान से जुड़े रणनीतिकार को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का भी 2016 से निरंतर आशीर्वाद प्राप्त है। दावा है कि 2022 में उत्तर प्रदेश में योगी और 2024 में केंद्र में मोदी ही आएंगे। वजह भाजपा और भाजपा की केंद्र तथा राज्य सरकारों के कामकाज की लय के अलावा बहुत कुछ है। बताते हैं कि चार कारणों से सरकार विरोधी लहर पैदा होती है और सत्ता बदलती है। पहला कारण अपनी पार्टी और सरकार के नेता, दूसरा कारण प्रशासनिक ढांचा, व्यवस्था, तीसरा विपक्षी दलों के नेताओं की सक्रियता और चौथा तथा आखिरी कारण अखबार, टीवी, मीडिया है। सूत्र का कहना है कि इन चारों कारणों पर केंद्र सरकार और भाजपा का विशेष ध्यान है। भाजपा और केंद्र सरकार में सभी एक साथ, एक सुर में प्रधानमंत्री मोदी के मार्गदर्शन में चल रहे हैं। यही हाल राज्यों का भी है। इसलिए प्रधानमंत्री और भाजपा के खिलाफ सरकार विरोधी लहर का बड़े पैमाने पर बन पाना मुश्किल है।  

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उत्तराखंड में भाजपा को लग रहा है कांग्रेस का रोग

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का विश्वास जीत लिया है। केंद्रीय नेताओं का कहना है कि धामी सही ढंग से योजनाओं को लागू कर रहे हैं। जनता से कनेक्ट भी हो रहे हैं। देहरादून से मुख्य सचिव सुखवीर सिंह संधू भी केंद्र सरकार को गुड न्यूज दे रहे हैं। संधू प्रधानमंत्री मोदी की गुडबुक वाले अधिकारी हैं। दिल्ली के ईशारे पर ही संधू को जुलाई 2021 में उत्तराखंड का मुख्य सचिव बनाया गया था। इससे पहले वह एनएचएआई के चेयरमैन और उससे पहले स्मृति ईरानी के समय में शिक्षा मंत्रालय में सक्रिय थे। लेकिन दूसरे पटल पर तमाम भाजपाई नेता, मंत्री तंग हैं। दो पूर्व भाजपाई मुख्यमंत्रियों को भी धामी शासन कम रास आ रहा है। धामी भी इस भितरखाती राजनीति को लेकर तंग हैं। बताते हैं कि जल्द ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा इसे प्रमुखता से लेने वाले हैं। नड्डा का मानना है कि पार्टी है तो सबसे पहले पार्टी के कार्यकर्ताओं का अनुशासन जरूरी है। नड्डा ने यह लाइन भी अपने पूर्व अध्यक्ष अमित शाह से ही ली है। कुल मिलाकर ध्यान कांग्रेसी रोग से भाजपा को मुक्ति दिलाने की है।  

नाम ही नरोत्तम है, काम उत्तम क्यों नहीं होगा

मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा काफी सक्रिय हैं। जहां मुख्यमंत्री और मध्यप्रदेश के बच्चों के मामा शिवराज सिंह चौहान राजनीति में घुन की तरह चाल देने में माहिर हैं, वहीं नरोत्तम का भी अपना स्टाइल है। वह उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी भाजपा के लिए प्रचार की योजना बना रहे हैं। नरोत्तम जितनी सक्रियता बढ़ाते जा रहे हैं, भोपाल से लेकर दिल्ली के नेताओं के पेट में उसी रफ्तार से दर्द बढ़ रहा है। अच्छी बात यह भी है कि प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा ने गूढ़ समीकरण बनाने वाले नरोत्तम के बारे में भाजपा के राज्यसभा सांसद विनय सहस्रबुद्धे अच्छी राय रखते हैं। जब मुकाबले में केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया हों, मुख्यमंत्री की कुर्सी पर शिवराज सिंह चौहान हों तो ऐसे समय में नरोत्तम का उत्साही होना भाजपा के कुछ दमदार नेताओं को भी अच्छा लग रहा है। क्योंकि एक उम्मीद की लौ जिंदा है। वह यह कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के बाद केंद्रीय नेतृत्व मध्यप्रदेश में सब कुछ ठीक करने का कदम उठा सकता है। ठीक करने का कदम उठाना ही किसी के लिए अवसर है।

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