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Polio Cases: दो हफ्ते बाद पोलियो के मामले में आई बड़ी खबर, मेघालय में मिला था वायरस का मामला
Wed, 04 Sep 2024 08:49 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Wed, 04 Sep 2024 08:49 PM IST
सार
अगस्त के आखिरी सप्ताह में मेघालय के वेस्ट गारो हिल्स जिले के एक गांव में 2 साल के बच्चे में पोलियो के लक्षण पाए गए थे। इन लक्षणों के सामने आने के बाद उसका इलाज असम के सरकारी अस्पताल में शुरू किया गया था। मामले की जानकारी मिलते ही केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस पूरे मामले में जांच के आदेश दिए थे।
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पोलियो।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
तकरीबन 2 हफ्ते पहले मेघालय के एक जिले के गांव में पोलियो का मामला सामने आया था। इस मामले के सामने आने के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय तक में हड़कंप मच गया था। दरअसल, यह हड़कंप इसलिए मचा क्योंकि 10 साल पहले ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत को पोलियो मुक्त घोषित कर दिया था। फिलहाल 10 साल बाद इस मामले के सामने आने के साथ जिस लॉट की वैक्सीन मेघालय के इस बच्चे को दी गई थी वह लॉट कितने बच्चों को लगाई गई और कहां-कहां लगाई गई थी। इसको जांचने के आदेश दिए गए थे। दो सप्ताह तक सघन जांच के बाद बुधवार को राहत भरी एक बड़ी खबर सामने आई है। जांच में पता चला है कि जो वैक्सीन बच्चों को दी गई थी इसका असर अन्य बच्चों में नहीं देखने को मिला है। फिलहाल इस रिपोर्ट को विश्व स्वास्थ्य संगठन से भी साझा किया जा चुका है।
अगस्त के आखिरी सप्ताह में मेघालय के वेस्ट गारो हिल्स जिले के एक गांव में 2 साल के बच्चे में पोलियो के लक्षण पाए गए थे। इन लक्षणों के सामने आने के बाद उसका इलाज असम के सरकारी अस्पताल में शुरू किया गया था। मामले की जानकारी मिलते ही केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस पूरे मामले में जांच के आदेश दिए थे। इस पूरे मामले की जांच कर रहे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि जिस लॉट की वैक्सीन पोलियो के लक्षण मिलने वाले मरीज बच्चों को लगाई गई थी। इस सीरीज की वैक्सीन कुछ अन्य बच्चों में भी दी गई थी। चूंकि यह मामला सामने आया तो इस पूरे मामले में उन सभी बच्चों की स्वास्थ्य की जांच और मॉनिटरिंग की गई जिनको इस सीरीज की वैक्सीन लगाई गई थी। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि एक-एक बच्चे को मॉनिटर किया गया है। किसी भी अन्य बच्चों में पोलियो जैसे लक्षण सामने नहीं आए हैं।
शुरुआती दौर में इस बात की भी जांच की गई की कहीं ऐसा तो नहीं की दी गई वैक्सीन की कोल्ड चेन टूट गई हो। जांच के दौरान कोल्ड चेन की पूरी प्रक्रिया और वैक्सीनेशन सेंटर से शुरू होकर मरीज को लगाए जाने तक की पूरी पड़ताल की गई। इस दौरान भी किसी तरीके की कोई लापरवाही फिलहाल सामने नहीं आई है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि मेघालय स्वास्थ्य विभाग की ओर से इस पूरे मामले में एक विशेष अभियान चलाया गया। जिसमें न सिर्फ इस सीरीज की वैक्सीन बल्कि अन्य लॉट की वैक्सीन का भी सैंपल लिया गया है। जांच करने वाले अधिकारियों का कहना है कि इस पूरे मामले की जो वजह सामने निकल कर आई है उसको केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ साझा किया जा चुका है। इस पूरे मामले में खास बात यह है कि एक विशेष टाइप के पोलियो के लक्षण के अलावा और कोई भी लक्षण किसी भी मरीज में नहीं मिले हैं।
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दरअसल मेघालय में एक मामले के सामने आने के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस बात पर चिंता जाहिर की थी कि 10 साल पहले पोलियो मुक्त हो चुके भारत में यह मामला कैसे सामने आया है। इसको लेकर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के वरिष्ठ सदस्य और असम मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के रिटायर्ड डॉक्टर केएल बनर्जी कहते हैं कि क्योंकि देश 10 साल पहले ही पोलियो मुक्त हो चुका है। लगातार मॉनिटर किए जाने के बाद भी कोई के सामने नहीं आया है। लेकिन मेघालय के एक विशेष मामले में पता यही चला है कि यह सामान्य पोलियो का केस नहीं है। डॉ गुप्ता कहते हैं कि इसको वैक्सीन डिराइव्ड पोलियो वायरस (VDPC) कहते हैं। उनका कहना है कि कुछ बीमारियों में इस तरह की स्थितियां होती है और वीडीपीसी डेवलप हो जाता है। ऐसा तब होता है जब वैक्सीन में वायरस के खिलाफ कमजोर स्ट्रेन डाला जाता है और ऐसे में वायरस पर वैक्सीन की डोज प्रभावी नहीं होती है।
दरअसल विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2014 में भारत को पोलियो मुक्त घोषित कर दिया था। डॉ गुप्ता के मुताबिक आखिरी मामला भारत में पोलियो का 2011 में सामने आया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रोटोकॉल के मुताबिक अगर 3 साल तक कोई भी मामला लगातार वैक्सीनेशन के बाद सामने नहीं आता है तो उसे बीमारी से उसको मुक्त कर दिया जाता है। भारत को भी इसी प्रोटोकॉल के तहत विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से पोलियो मुक्त घोषित किया जा चुका है। दरअसल इसके पीछे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से चलाए गया बड़ा पल्स पोलियो अभियान सबसे ज्यादा कारगर साबित हुआ था। देश को पोलियो मुक्त होने के बाद लगातार यह अभियान केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और राज्य स्वास्थ्य विभाग की ओर से लगातार चलाया जाता रहा है। फिलहाल मेघालय में इस एक विशेष प्रकार के पोलियो के मामले के सामने आने के बाद वहां पर बड़े स्तर पर पल्स पोलियो अभियान भी चलाया गया।
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अगस्त के आखिरी सप्ताह में मेघालय के वेस्ट गारो हिल्स जिले के एक गांव में 2 साल के बच्चे में पोलियो के लक्षण पाए गए थे। इन लक्षणों के सामने आने के बाद उसका इलाज असम के सरकारी अस्पताल में शुरू किया गया था। मामले की जानकारी मिलते ही केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस पूरे मामले में जांच के आदेश दिए थे। इस पूरे मामले की जांच कर रहे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि जिस लॉट की वैक्सीन पोलियो के लक्षण मिलने वाले मरीज बच्चों को लगाई गई थी। इस सीरीज की वैक्सीन कुछ अन्य बच्चों में भी दी गई थी। चूंकि यह मामला सामने आया तो इस पूरे मामले में उन सभी बच्चों की स्वास्थ्य की जांच और मॉनिटरिंग की गई जिनको इस सीरीज की वैक्सीन लगाई गई थी। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि एक-एक बच्चे को मॉनिटर किया गया है। किसी भी अन्य बच्चों में पोलियो जैसे लक्षण सामने नहीं आए हैं।
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शुरुआती दौर में इस बात की भी जांच की गई की कहीं ऐसा तो नहीं की दी गई वैक्सीन की कोल्ड चेन टूट गई हो। जांच के दौरान कोल्ड चेन की पूरी प्रक्रिया और वैक्सीनेशन सेंटर से शुरू होकर मरीज को लगाए जाने तक की पूरी पड़ताल की गई। इस दौरान भी किसी तरीके की कोई लापरवाही फिलहाल सामने नहीं आई है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि मेघालय स्वास्थ्य विभाग की ओर से इस पूरे मामले में एक विशेष अभियान चलाया गया। जिसमें न सिर्फ इस सीरीज की वैक्सीन बल्कि अन्य लॉट की वैक्सीन का भी सैंपल लिया गया है। जांच करने वाले अधिकारियों का कहना है कि इस पूरे मामले की जो वजह सामने निकल कर आई है उसको केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ साझा किया जा चुका है। इस पूरे मामले में खास बात यह है कि एक विशेष टाइप के पोलियो के लक्षण के अलावा और कोई भी लक्षण किसी भी मरीज में नहीं मिले हैं।
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दरअसल मेघालय में एक मामले के सामने आने के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस बात पर चिंता जाहिर की थी कि 10 साल पहले पोलियो मुक्त हो चुके भारत में यह मामला कैसे सामने आया है। इसको लेकर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के वरिष्ठ सदस्य और असम मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के रिटायर्ड डॉक्टर केएल बनर्जी कहते हैं कि क्योंकि देश 10 साल पहले ही पोलियो मुक्त हो चुका है। लगातार मॉनिटर किए जाने के बाद भी कोई के सामने नहीं आया है। लेकिन मेघालय के एक विशेष मामले में पता यही चला है कि यह सामान्य पोलियो का केस नहीं है। डॉ गुप्ता कहते हैं कि इसको वैक्सीन डिराइव्ड पोलियो वायरस (VDPC) कहते हैं। उनका कहना है कि कुछ बीमारियों में इस तरह की स्थितियां होती है और वीडीपीसी डेवलप हो जाता है। ऐसा तब होता है जब वैक्सीन में वायरस के खिलाफ कमजोर स्ट्रेन डाला जाता है और ऐसे में वायरस पर वैक्सीन की डोज प्रभावी नहीं होती है।
दरअसल विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2014 में भारत को पोलियो मुक्त घोषित कर दिया था। डॉ गुप्ता के मुताबिक आखिरी मामला भारत में पोलियो का 2011 में सामने आया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रोटोकॉल के मुताबिक अगर 3 साल तक कोई भी मामला लगातार वैक्सीनेशन के बाद सामने नहीं आता है तो उसे बीमारी से उसको मुक्त कर दिया जाता है। भारत को भी इसी प्रोटोकॉल के तहत विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से पोलियो मुक्त घोषित किया जा चुका है। दरअसल इसके पीछे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से चलाए गया बड़ा पल्स पोलियो अभियान सबसे ज्यादा कारगर साबित हुआ था। देश को पोलियो मुक्त होने के बाद लगातार यह अभियान केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और राज्य स्वास्थ्य विभाग की ओर से लगातार चलाया जाता रहा है। फिलहाल मेघालय में इस एक विशेष प्रकार के पोलियो के मामले के सामने आने के बाद वहां पर बड़े स्तर पर पल्स पोलियो अभियान भी चलाया गया।