दहेज उत्पीड़न: क्या है 498-ए और कब क्या हुए बदलाव, पुरुषों के साथ महिलाओं के लिए भी जानना है जरूरी
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सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न (498-ए) कानून में बदलाव करते हुए ऐसे मामलों में बाहरी समितियों से जांच का अधिकार वापस लेते हुए पुलिस को सौंप दिया है। जिसके तहत पुलिस तय करेगी कि वह आरोपी पति और उसके परिवार को तुरंत गिरफ्तार करेगी या नहीं।
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सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न (498-ए) कानून में बदलाव करते हुए ऐसे मामलों में बाहरी समितियों से जांच का अधिकार वापस लेते हुए पुलिस को सौंप दिया है। जिसके तहत पुलिस तय करेगी कि वह आरोपी पति और उसके परिवार को तुरंत गिरफ्तार करेगी या नहीं।
यानि अगर पुलिस को खतरा है कि आरोपी उसकी जांच में मदद नहीं करेगा या फिर भाग जाएगा तो वह उसे गिरफ्तार कर सकती है। वहीं सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला कितना सही है इसे बेहतर तरीके से जानने के लिए इस कानून में हुए पुराने बदलाव जानने भी आवश्यक हैं।
क्या है 498-ए?
जिस कानून में हुए बदलावों के बारे में हम आपको बता रहे हैं, उससे पहले आपका उस कानून के बारे में जानना आवश्यक है। दहेज उत्पीड़न कानून यानि 498-ए महिला को पति और उसके परिवार के उत्पीड़न से बचाने के लिए साल 1984 में बनाया गया।
कानून में उत्पीड़न और क्रूरता के बारे में बताते हुए कहा गया है कि यदि किसी महिला को गंभीर चोट आए, मानसिक और शारीरिक तौर पर उसका शोषण हो, वह आत्महत्या की स्थिति में पहुंच जाए या फिर जान को खतरा हो।
इसके अलावा यदि दहेज की मांग की जा रही हो, जिसके लिए पति और उसका परिवार महिला और उसके परिवार को परेशान कर रहा हो तो प्रताड़ित महिला मामले की शिकायत पुलिस में दर्ज करवा सकती है। मामले में दोषी साबित होने पर आरोपियों को अधिकतम तीन साल तक की कैद का प्रावधान है। चलिए अब आपको बताते हैं इस कानून में हुए बदलाव-
पहला बदलाव
सुप्रीम कोर्ट ने 2 जुलाई, 2014 को अरनेश कुमार और बिहार सरकार के मामले में फैसला सुनाया। अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि जिन अपराधों में सात साल से कम की सजा है, उनमें पुलिस तत्काल गिरफ्तारी नहीं करेगी। इस बदलाव के तहत पीड़ित महिला पहले शिकायत लेकर पुलिस के पास जाएगी। पुलिस उसका आवेदन स्वीकार कर लेगी और आरोपियों को नोटिस भेज देगी। जिसके बाद आरोपियों से पूछताछ की जाएगी। आरोप सही पाए गए तो उसके आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाएगी।
गिरफ्तारी का कारण बताना होगा
मामले में पुलिस तुरंत गिरफ्तारी नहीं कर सकती। अगर पुलिस को लगता है कि आरोपी देश छोड़कर भाग सकता है या फिर जांच में सहयोग न दे रहा हो तो उसकी गिरफ्तारी भी की जा सकती है।
लेकिन पुलिस को आरोपियों को लेकर तुरंत मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होगा और कारण बताना होगा। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सात साल से कम की सजा वाले मामले सुनने वाले ट्रायल कोर्ट को भी तुरंत जमानत देने को कहा है। अगर कोर्ट जमानत नहीं देता तो उसे भी इसके पीछे का कारण बताना होगा।
दूसरा बदलाव
सुप्रीम कोर्ट ने कानून में दूसरा बदलाव 27 जुलाई 2017 को किया। जिसमें कहा गया कि जिले का विधिक सहायता प्राधिकरण तीन सदस्यों की एक समिति बनाएगा। पीड़िता द्वारा पुलिस को की गई शिकायत इस समिति के पास जाएगी। इसके बाद समिति मामले की जांच करेगी और अगर जांच सही पाई गई तो मामले में एफआईआर दर्ज होगी और गिरफ्तारी भी। सुप्रीम कोर्ट ने राजेश कुमार बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के मामले में ये फैसला सुनाया था।
तीसरा बदलाव
समिति नहीं करेगी जांच, अपने ही फैसले में किया बदलाव
सुप्रीम कोर्ट ने कानून में तीसरा बदलाव 14 सितंबर 2018 को किया। इस फैसले में कोर्ट ने कहा कि दहेज से संबंधित मामले भारतीय दंड संहिता के हैं तो ऐसे में किसी बाहरी समिति को जांच का अधिकार नहीं दिया जा सकता।
कोर्ट ने अपने 2017 में दिए फैसले में बदलाव किया। इस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि पुलिस के पास आई शिकायत की जांच समिति करेगी। यानि विधिक सहायता प्राधिकरण द्वारा बनाई गई तीन सदस्यों की समिति दहेज उत्पीड़न के मामलों की जांच नहीं करेगी। कोर्ट के इस बदलाव से कानून पहले जैसा ही हो गया।
पुलिस को ही जांच का अधिकार दिया गया। यानि 7 दिनों में मामले की जांच के बाद ही पुलिस एफआईआर दर्ज करने और गिरफ्तारी से संबंधित फैसला लेगी।
वहीं कानून ने गिरफ्तारी से बचने के लिए आरोपी को अग्रिम जमानत का विकल्प दिया है। वह सुप्रीम कोर्ट से केस खारिज करने की मांग भी कर सकता है।