PM Modi Interview: अमर उजाला से बोले प्रधानमंत्री, काशीवासियों के प्रेम का मैं कर्जदार; 10 साल में बना बनारसी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी व्यस्तताओं के बीच समय निकालकर अमर उजाला के साथ विस्तार से बातचीत की। डॉ इन्दुशेखर पंचोली के साथ एक विशेष बातचीत में पीएम मोदी ने काशी के आध्यात्मिक महत्व और अपने विशेष जुड़ाव के अलग-अलग पहलुओं पर बात की। पढ़िए प्रमुख बातें
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विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विशेष साक्षात्कार में कहा कि वे अब बनारसी हो चुके हैं...बनारसी होने के नाते समझते हैं कि इस नगरी में संस्कृति और परंपरा का महत्व क्या है। यही वजह है कि उन्होंने काशी विश्वनाथ कॉरिडोर को भव्य रूप दिया, लेकिन उसके ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व का भी ध्यान रखा। वह कहते हैं कि यह उनका सौभाग्य है कि महादेव की नगरी और मां गंगा की सेवा कर पा रहे हैं। उनकी कोशिश है कि देश दुनिया से काशी आने वालों को काशी वैसी ही दिखाई दे, जैसी उन्होंने पुराणों में पढ़ी और कथाओं में सुनी है। वाराणसी आज दुनिया में शहरी विकास की मॉडल सिटी कही जा सकती है। पढ़िए वाराणसी से उनके जुड़ाव को लेकर कुछ दिलचस्प सवालों के जवाब
सवाल- आपने 2014 के चुनाव में कहा था मुझे मां गंगा ने बुलाया है। इस बार कहा मुझे मां गंगा ने गोद ले लिया है। क्या इसका यह अर्थ लगाया जाए कि काशी अब प्रधानमंत्री की स्थायी कर्मभूमि है?
पीएम मोदी का जवाब- देखिए, वाराणसी मैं बहुत समय से आता रहा हूं। जब पार्टी के संगठन के लिए काम करता था तो बहुत बार यहां आना होता था। मैं जब भी गंगा मां को देखता हूं, तो मुझे आत्मीय अनुभूति होती है।
मुझे मां गंगा का हमेशा सान्निध्य मिला है, और जबसे मेरी मां गई हैं, तबसे तो मेरे लिए गंगा ही मां रह गई हैं। 2014 में जब मैं यहां आया था, तो मैंने कहा था कि मुझे मां गंगा ने बुलाया है। 10 वर्षों में मेरे अंदर यह भावना प्रबल हुई है कि मां गंगा ने मुझे गोद ले लिया है। इसलिए काशी के प्रति मैं अलग तरह की जिम्मेदारी महसूस करता हूं। हर सनातनी के मन में एक बार काशी दर्शन की इच्छा रहती है और यह मेरा सौभाग्य है कि मैं महादेव की नगरी और मां गंगा की सेवा कर पा रहा हूं। यहां के देवतुल्य लोग, उनका स्नेह मेरे लिए सत्ता, संसदीय सीट, एमपी व पीएम पद से कहीं बड़ा है। मैं काशीवासियों के प्रेम का कर्जदार हूं और यह कर्ज मैं अंतिम सांस तक उतारना नहीं चाहता। इसके बदले मैं लगातार उनकी सेवा करना चाहता हूं।
सवाल- वाराणसी में बीते 10 वर्षों में इतने सारे नए प्रोजेक्ट्स पूरे हुए हैं। इतने प्राचीन शहर में इन्फ्रास्ट्रक्चर को लेकर काम करना आपके लिए कितना चुनौतीपूर्ण रहा है।
प्रधानमंत्री का जवाब- वाराणसी आज दुनिया में शहरी विकास की मॉडल सिटी कही जा सकती है। 2014 में जब मैं बनारस आया था, तो यहां का विकास एक बड़ी जिम्मेदारी थी। गलियां संकरी थीं, सड़कों पर काम नहीं हुआ था, रेलवे और अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर भी ऐसे ही थे। हमने चरणबद्ध ढंग से चीजें बदलीं। एक नया मॉडल बनाकर काम किया।
दुनियाभर में बनारस की पहचान उसकी गलियां हैं। हमने गलियों में बिजली के लटके हुए तार हटवाना शुरू किया। गलियों की सफाई के लिए प्रदेश सरकार और स्थानीय प्रशासन से काम शुरू कराए। सीवेज सिस्टम में ऐसी पाइपें थीं, जो अंग्रेजों के जमाने से लगी थीं। इसलिए सीवर ओवरफ्लो से गलियों में, सड़कों पर पानी जमा होता था। उनको बदलवाना शुरू किया। आपको याद होगा, मैंने वाराणसी के अस्सी घाट पर स्वच्छता नवरत्नों की घोषणा की थी। ऐसे ही घाटों, मंदिरों और सार्वजनिक स्थानों की सफाई पर फोकस किया।
इसके बाद काम शुरू हुआ, इन्फ्रास्ट्रक्चर पर। वाराणसी में बाहरी गाड़ियों से जाम न लगे, इसके लिए रिंग रोड बनी। शहर में जो बाहर से आने वाले लोग हैं, उनके लिए नेशनल हाईवे के नेटवर्क को बेहतर किया। बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, बंगाल और एमपी से जो लोग इलाज के लिए बनारस आते हैं, उनके लिए कैंसर हॉस्पिटल और ट्रॉमा सेंटर बना। शहर में ट्रांसपोर्ट सिस्टम सुधारने के लिए कमांड सेंटर बना। रेलवे स्टेशन सुधारे गए, एयरपोर्ट पर काम हुआ। अब रोप-वे बन रहा है, अर्बन ई-बस चल रही है, वंदे भारत जैसी ट्रेन है।
घाटों पर नई सुविधाएं मिल रही हैं। बाबा विश्वनाथ का कॉरिडोर बना। क्रूज सर्विस शुरू कराई गई। दशाश्वमेध घाट पर नया बिजनेस प्लाजा बनाया गया। तो इन सब से बनारस की इकनॉमी को बहुत बल मिला। आज जो टूरिस्ट आते हैं, उनको सभी तरह की सुविधाएं मिलती हैं। बनारस शहर में जाम का संकट एक बहुत बड़ी चुनौती है, क्योंकि शहर का घनत्व बहुत ज्यादा है। लोगों को सहूलियत और स्पीड दोनों कैसे दे सकें, उसके लिए काम कर रहे हैं।
जबसे मेरी मां गई हैं, तबसे गंगा ही मेरे लिए मां रह गई हैं...इसलिए काशी के प्रति मैं अलग तरह की जिम्मेदारी महसूस करता हूं और यहां के विकास के लिए प्रितबद्ध हूं। इसी भावना से यहां की पंरपरा व संस्कृति को ध्यान में रखकर विकास के सभी कार्य किए जा रहे हैं। इस नगरी को दुनिया के अतिथियों के लिए भी तैयार किया गया है।
सवाल- काशी-तमिल संगमम, संसद में सेंगोल की स्थापना, राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा से ठीक पहले आपका भगवान राम से जुड़े दक्षिण भारत के स्थलों का दौरा। इसे किस रूप में देखा जाए? क्या आप देश की सांस्कृतिक पहचान की भी लड़ाई लड़ रहे हैं? या फिर जैसा विपक्ष कहता है कि यह बस दक्षिण में पार्टी का आधार बढ़ाने की राजनीति मात्र है?
आजादी के बाद कांग्रेस ने विदेशी शासकों से सिर्फ सत्ता नहीं ली, बल्कि उनके शासन के मंत्र को भी अपना लिया। बांटो और राज करो की नीति पर चलकर ही कांग्रेस ने दशकों तक राज किया। कांग्रेस की विभाजनकारी राजनीति को धर्म, जाति, भाषा, संप्रदाय और क्षेत्र का बंटवारा शक्ति देता है।
पिछले 10 वर्षों में मेरी सरकार ने एक भारत-श्रेष्ठ भारत की भावना से काम किया है। मैंने तमिल संस्कृति और आजादी के पहले पल के प्रतीक के तौर पर नई संसद में सेंगोल की स्थापना की। लेकिन इसका महत्व एक प्रतीक से कहीं ज्यादा है। यह आज के भारत को अपनी प्राचीन परंपराओं से जोड़ता है। यह भारत के हर नागरिक को गर्व का एहसास कराता है। संसद में सेंगोल की स्थापना उस साजिश पर चोट है, जिसके तहत आजादी के बाद कई पीढ़ियों में देश की संस्कृति को लेकर हीन भावना भर दी गई। आज मैं गर्व से दक्षिण भारत की पोशाक धारण करता हूं। जब नॉर्थ ईस्ट जाता हूं तो गर्व से वहां के कपड़े पहनता हूं। मैं यूएन जाकर तमिल बोलता हूं।
मेरे लिए वह भी बहुत गौरव का क्षण था, जब नौसेना के एपोलेट्स और ध्वज पर शिवाजी की विरासत के चिह्नों को जगह दी गई...जब असम के महान योद्धा लचित बोरफुकन की भव्य और विशाल प्रतिमा स्थापित हुई। भाजपा सरकार के प्रयासों से लचित बोरफुकन की 400वीं जयंती पूरे देश ने मनाई गई। हमारी सरकार आदिवासी गौरव से जन-जन को जोड़ने के लिए जनजातीय संग्रहालय बनवा रही है।
प्राण प्रतिष्ठा से पहले जब मैंने दक्षिण के राज्यों में अनुष्ठान किया तो मैंने पाया कि पूरा देश रामभक्ति के एक ही सूत्र से बंधा है। उनमें भाषा का भेद है, लेकिन भावना एक है। उनके तरीके अलग हो सकते हैं, लेकिन उसमें मूल तत्व एक ही है।
मेरे इन कार्यों के पीछे अगर कोई राजनीतिक उद्देश्य देख रहा है, तो उसे याद दिलाना चाहूंगा कि पुड्डूचेरी में हमारी सरकार है। कर्नाटक में हम सरकार में रह चुके हैं। भाजपा दक्षिण भारत में सबसे बड़ी पार्टी है। हमने दक्षिण में भी वैसे ही प्रचार किया, जैसे देश के दूसरे हिस्सों में किया। और वहां हमें जिस तरह का समर्थन मिल रहा है, उसके आधार पर मैं कह सकता हूं कि दक्षिण भारत के नतीजे लोगों को चौंकाएंगे।
काशी बहुसंस्कृति की नगरी है। यहां अनेक वर्गों, भाषाओं और प्रांतों के लोग रहते हैं। इसी काशी में हमने काशी तमिल संगमम, काशी तेलुगु संगमम जैसे ऐतिहासिक आयोजन किए। इसी काशी में जी-20 की बैठक हुई। इसी काशी में प्रवासी भारतीय सम्मेलन हुआ। ये अतिथि जब काशी आए तो उन्होंने देखा कि दुनिया की सांस्कृतिक राजधानी कितनी अलग है।
सवाल- काशी की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए 10 वर्षों में बहुत सारे प्रयास हुए हैं। संस्कृति को संरक्षित करते हुए विकास करने का काम कैसे किया गया है?
10 साल में बनारस ने मुझे बनारसी बना दिया है, इसलिए मैं बनारसी होने के नाते यह समझता हूं कि मेरी नगरी में संस्कृति और परंपरा का महत्व क्या है। हमने काशी विश्वनाथ कॉरिडोर को भव्य रूप दिया, लेकिन उसके ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व का भी ध्यान रखा। कॉरिडोर में माता अहिल्या की प्रतिमा लगाई गई, मंदिर के गर्भगृह स्वर्ण मंडित हुए, गंगा घाट से बाबा विश्वनाथ का धाम जोड़ा गया। काल भैरव मंदिर से काशी विश्वनाथ और फिर काशी विश्वनाथ से दशाश्वमेध घाट के बीच की जो सड़क थी, उसका सुंदरीकरण किया गया। यानी जो व्यक्ति महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, असम जैसे राज्यों से काशी आए, तो उसे वही काशी दिखाई दे, जैसी उसने पुराणों में पढ़ी और कथाओं में सुनी है।
काशी का दुर्गाकुंड धाम विकसित किया गया। रविदास मंदिर जिस स्थान पर है, उसका विकास किया गया। सारनाथ का स्तूप जहां है, उस इलाके को हेरिटेज सिटी के मॉडल पर विकसित किया गया। अब हम काशी के मणिकर्णिका घाट को भविष्य की जरूरतों के हिसाब से विकसित कर रहे हैं। लेकिन इन सब में हमने उस पौराणिकता, उस भावना का ध्यान रखा है, जिसे मन में लेकर लोग यहां आते हैं। काशी में हमने विकास किया, साथ ही परंपराएं भी संरक्षित की। काशी को दुनिया के सामने रखा, साथ ही काशी को दुनिया के अतिथियों के लिए तैयार भी किया।