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भारत की एक और कूटनीतिक जीत, मालदीव चीन के साथ रद्द कर सकता है यह समझौता

Mon, 17 Jun 2019 08:45 AM IST
Sneha Baluni न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Sneha Baluni Updated Mon, 17 Jun 2019 08:45 AM IST
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PM Modi visits Maldives and after that country might scrap deal with China to build observatory
नरेंद्र मोदी-इब्राहिम सोलह (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

मालदीव के साथ चीन ने हिंद महासागर में एक वेधशाला (ऑब्जरवेटरी)  बनाने के लिए समझौता किया था। माना जा रहा है कि यह समझौता अब टूट सकता है। मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के नेतृत्व में मालदीव की चीन से नजदीकियां बढ़ीं थीं। इसी दौरान चीन द्वारा वेधशाला बनाए जाने की संभावना और समझौता होने की बात सामने आई थी। हालांकि मालदीव में सत्ता बदलने और राष्ट्रपति इब्राहिम सोलिह के सत्ता संभालने के बाद से इस रिश्ते में खटास आती नजर आ रही है और भारत के साथ रिश्ते मजबूत होते दिखाई दे रहे हैं। 

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टाइम्स ऑफ इंडिया ने माले में स्थित उच्च सरकारी सूत्रों के हवाले से लिखा है कि यामीन ने चीन के साथ 2017 में समझौता किया था जिससे भारत की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई थीं। यामीन ने 'प्रोटोकॉल ऑन इस्टेबलिशमेंट ऑफ ज्वाइंट ओशियन ऑब्जर्वेशन स्टेशन बिटवीन चाइना एंड मालदीव्स' नाम का समझौता किया था। इस समझौते का मतलब चीन को मुकुनुथू में एक वेधशाला बनाने की इजाजत देना था। इस समझौते पर बातचीत रुक चुकी है।
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यदि चीन और मालदीव के बीच यह समझौता होता तो चीनियों को हिंद महासागर के महत्वपूर्ण रास्ते पर अहम अड्डा मिल मिल जाता जिसके जरिए कई व्यापारिक और दूसरे जहाजों की आवाजाही होती है। यह भारत की समुद्री सीमा से बहुत करीब है। इसके अलावा मालदीव के साथ संबंधों के मद्देनजर यह बहुत चुनौतीपूर्ण साबित होता। तत्कालीन विदेश सचिव एस जसशंकर ने इस मुद्दे पर मालदीव के तत्कालीन  राजनयिक अहमद मोहम्मद से चर्चा की थी। राजनयिक ने स्पष्ट किया था कि चीन केवल मौसम संबंधी महासागर अवलोकन केंद्र बनाना चाहता है।
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यामीन सरकार ने इस समझौते को कभी सार्वजनिक नहीं किया। विवाद होने पर चीन ने इसपर सफाई देते हुए कहा था कि वेधशाला का इस्तेमाल सैन्य उद्देश्य के लिए नहीं होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल ही में मालदीव के दौरे पर गए थे। जहां उन्होंने चीन पर निशाना साधते हुए कहा कि भारत की विकासात्मक साझेदारी दूसरों को सशक्त बनाने के लिए थी न कि उनकी भारत पर निर्भरता बढ़ाने और उन्हें कमजोर करने के लिए। माना जाता है कि मालदीव पर जो कर्ज है उसका आधे से ज्यादा चीन का है।

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