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कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा: उपचुनाव के नतीजों और लखीमपुर खीरी कांड ने बदल दी तस्वीर, धैर्य की सियासी जंग में जीते किसान

Sat, 20 Nov 2021 06:06 AM IST
देव कश्यप हिमांशु मिश्र, नई दिल्ली।
हिमांशु मिश्र, नई दिल्ली। Published by: देव कश्यप Updated Sat, 20 Nov 2021 06:06 AM IST
सार

कृषि कानूनों की वापसी पर शीर्ष स्तर पर पिछले चार महीने से मंथन चल रहा था। शुरुआत में सरकार को लगता था कि वह इस लड़ाई को छोटा किसान बनाम बड़ा किसान का रूप देने में कामयाब हो जाएगी। लेकिन इसी बीच हुए लखीमपुर कांड और उपचुनावों के नतीजों से साफ संदेश गया कि जमीनी स्तर पर गहरी नाराजगी है। उपचुनावों में पार्टी हिमाचल प्रदेश में सूपड़ा साफ करवा बैठी, जबकि राजस्थान में उसके प्रत्याशी तीसरे और चौथे स्थान पर रहे। पश्चिम बंगाल में भाजपा का वोट प्रतिशत 40 फीसदी से गिरकर 11 फीसदी रह गया था।

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PM Modi Announces of withdrawal of Farm laws farmers won in the political battle of patience
कानून वापसी की घोषणा के बाद किसानों में खुशी का माहौल - फोटो : ANI

विस्तार

मोदी-शाह युग की भाजपा विभिन्न मुद्दों पर धैर्य की सियासी जंग लड़ती है। कृषि कानूनों के मामले में भी इस जंग में बाजी किसान संगठनों के हाथ लगी। पिछले डेढ़ साल से जारी इस जंग में लोकसभा-विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने खतरे की घंटी बजाई और लखीमपुर खीरी कांड ने सरकार की किरकिरी कराई, चौकन्नी सरकार ने आनन-फानन कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर दी।

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कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा के कई निहितार्थ हैं। इस फैसले से कई राज्यों में सियासी दलों का समीकरण बिगड़ना तय है। पंजाब और पश्चिम उत्तर प्रदेश में क्या असर पड़ेगा? इस मुद्दे पर राजग से नाता तोड़ने वाले अकाली दल और हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का क्या रुख होगा? पश्चिम उत्तर प्रदेश में आरएलडी अब क्या करेगी? फैसले के बाद भाजपा चुनावी राज्यों खासकर यूपी और पंजाब में कितना डैमेज कंट्रोल कर पाएगी?
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फैसले के पीछे यूपी कनेक्शन

  • उत्तर प्रदेश में सत्ता का लंबा वनवास खत्म करने में पश्चिमी यूपी का सबसे बड़ा योगदान रहा है।
  • लोकसभा की दो और विधानसभा के बीते चुनाव में पार्टी ने यहां जाटों के समर्थन से प्रचंड जीत हासिल की थी। यहां तक कि चौधरी अजित सिंह और उनके पुत्र जयंत चौधरी को भी हार झेलनी पड़ी थी।
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  • पार्टी के लिए मुश्किल यह थी कि किसान आंदोलन ने इस क्षेत्र में छिन्न-भिन्न हुई जाट-मुस्लिम एकता को नया जीवन देना शुरू कर दिया था।


इन सवालों का देना होगा जवाब
सरकार को संसद के शीतकालीन सत्र में विपक्ष के कई सवालों के जवाब देने होंगे। जैसे कानून वापस ही लेना था तो इतनी देरी क्यों की? विपक्ष यह भी पूछेगा कि आंदोलन के दौरान सात सौ किसानों की मौत की जिम्मेदारी कौन लेगा? सरकार ने इस कानून को लाने से पहले सहमति क्यों नहीं बनाई? इस फैसले पर सियासी घमासान संसद के शीत सत्र में दिखेगा।

क्या है धैर्य की राजनीति
सत्ता में आने के बाद से ही भाजपा विभिन्न मुद्दों पर धैर्य की राजनीति करती है। मतलब किसी भी मुद्दे को लंबा खींचना और उसके प्रति उदासीन बने रहने का संदेश देना। सीएए, एनआरसी के खिलाफ हुए आंदोलन में सरकार ने ऐसा ही किया। इस धैर्य की लड़ाई में आंदोलनकर्ता नहीं टिके और आंदोलन खत्म हो गया। मगर किसानों से जुड़े दो मुद्दों पर सरकार धैर्य की लड़ाई में हार गई। पहले भूमि अधिग्रहण कानून के मामले में और अब कृषि कानूनों के मामले में।

पहले भूमि अधिग्रहण अब वापस लेने पड़े कृषि कानून
मोदी सरकार के दोनों कार्यकाल में इतिहास ने खुद को दोहराया है। दोनों कार्यकाल में सरकार को किसानों के समक्ष झुकना पड़ा। पहले कार्यकाल में भूमि अधिग्रहण कानून वापस लेना पड़ा था, जबकि मौजूदा कार्यकाल में तीनों नए कृषि कानून पर अपने पांव पीछे खींचने पड़े।



दोनों ही मामलों में सरकार का रवैया एक जैसा था। दोनों मामलों में अध्यादेश लाने से पहले सरकार ने सहमति बनाने के प्रयास नहीं किए। ऐसे प्रावधान जोड़े, जिससे किसानों में कई आशंकाएं घिर गईं। उन्होंने इन कानूनों को जीवन-मरण से जोड़ लिया। साल 2014 में सत्ता में आते ही मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाई। जिसमें अधिग्रहण के लिए किसानों की सहमति के प्रावधान को खत्म कर दिया था। इस क्रम में सरकार ने चार बार अध्यादेश जारी किया। मगर व्यापक विरोध के कारण सरकार को 31 अगस्त 2015 को अध्यादेश वापस लेना पड़ा। अब कृषि कानूनों के मामले में भी यही स्थिति रही। 

कहां है कमी?
पहले कार्यकाल में सरकार में अरुण जेटली शामिल थे, जिनके विपक्ष के साथ बेहतर संबंध थे। जेटली के ही सुझाव पर सरकार ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश वापस लेने का फैसला किया था। दूसरे कार्यकाल में जेटली के स्तर का कोई नेता सरकार में नहीं है जो सभी पक्षों का फीडबैक लेे कर उचित सलाह दे सके। कृषि कानूनों के विरोध में किसान आंदोलन मामले में सरकार ने एक पक्षीय और आक्रामक रुख अपनाया।

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