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सुप्रीम कोर्ट: जम्मू-कश्मीर में हिंदुओं-सिखों के नरसंहार में शामिल अपराधियों की पहचान के लिए एसआईटी की मांग, जानें पूरा मामला
Sun, 27 Mar 2022 05:48 PM IST
अभिषेक दीक्षित
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अभिषेक दीक्षित
Updated Sun, 27 Mar 2022 05:48 PM IST
सार
याचिका में उन हिंदुओं और सिखों की गणना करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है, जो जम्मू-कश्मीर में नरसंहार का शिकार हुए हैं या इससे बच निकलने में कामयाब हुए हैं और अब भारत के विभिन्न हिस्सों में रह रहे हैं।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : amar ujala
विस्तार
जम्मू-कश्मीर में 1989-2003 के दौरान हिंदुओं और सिखों के नरसंहार को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका लगाई गई है। याचिका में इस घटना में शामिल अपराधियों की पहचान करने के लिए एक विशेष जांच दल यानी एसआईटी बनाने की मांग की गई है। याचिका 'वी द सिटिजंस' नाम के एक एनजीओ ने दायर की है।
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याचिका में उन हिंदुओं और सिखों की गणना करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है, जो जम्मू-कश्मीर में नरसंहार का शिकार हुए हैं या इससे बच निकलने में कामयाब हुए हैं और अब भारत के विभिन्न हिस्सों में रह रहे हैं। याचिका में ऐसे लोगों के पुनर्वास के निर्देश की भी मांग की गई है।
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याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता ने कश्मीर के प्रवासियों से जुड़ी किताबों और लेखों को पढ़कर शोध किया है। याचिकाकर्ता ने जिन प्रमुख किताबों की जांच की है, उनमें जगमोहन की 'माई फ्रोजन टर्बुलेंस इन कश्मीर' और राहुल पंडिता की 'अवर मून हैज ब्लड क्लॉट्स' शामिल हैं। ये दो किताबें 1990 में भयानक नरसंहार और कश्मीरी हिंदुओं एवं सिखों के पलायन का प्रत्यक्ष विवरण देती हैं।
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अधिवक्ता बरुण कुमार सिन्हा के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है कि तत्कालीन सरकार और पुलिस प्रशासन की विफलता और संवैधानिक तंत्र के पूर्ण रूप से बिखरने को उन किताबों में समाहित किया गया है। तत्कालीन सरकार और राज्य मशीनरी ने हिंदुओं और सिखों के जीवन की रक्षा के लिए बिल्कुल भी प्रयास नहीं किया और देशद्रोहियों, आतंकवादियों, असामाजिक तत्वों को पूरे कश्मीर पर नियंत्रण करने की अनुमति दे दी। जिसके परिणामस्वरूप हिंदू और सिख नागरिकों ने सरकार में विश्वास खो दिया और वे पलायन करके भारत के अन्य हिस्सों में बसने के लिए मजबूर किए गए।