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Supreme Court: मोहम्मद फैजल की लोकसभा सदस्यता बहाल करने को 'सुप्रीम' चुनौती, पढ़ें शीर्ष कोर्ट की अहम खबरें

Wed, 26 Apr 2023 10:18 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Wed, 26 Apr 2023 10:18 PM IST
सार

कावरत्ती की एक अदालत ने एनसीपी सांसद मोहम्मद फैजल को हत्या के एक मामले में दोषी ठहराया था और उन्हें 10 साल की सजा सुनाई थी। जनप्रतिनिधि कानून के तहत 2 साल या उससे ज्यादा की सजा होने पर संसद सदस्य या विधानसभा सदस्य की सदस्यता रद्द हो जाती है। ऐसे में कानून के तहत मोहम्मद फैजल की संसद सदस्यता रद्द हो गई थी।

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Plea in Supreme Court challenges restoration of Lok Sabha membership of Lakshadweep MP news and updates in hi
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राकांपा नेता मोहम्मद फैजल की लोकसभा सदस्यता बहाल करने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। अधिवक्ता अशोक पांडे ने यह याचिका दायर की है। इसमें उन्होंने पूछा है कि क्या एक अभियुक्त की दोषसिद्धि पर अदालत द्वारा लगाई गई रोक के आधार पर लोकसभा सदस्य की अयोग्यता को रद्द किया जा सकता है? 

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 शीर्ष अदालत ने 29 मार्च को राकांपा नेता की सदस्यता बहाल करने की लोकसभा सचिवालय की अधिसूचना के मद्देनजर संसद सदस्य के तौर पर उनकी अयोग्यता के खिलाफ दायर याचिका का निस्तारण कर दिया था। 29 मार्च को लोकसभा सचिवालय द्वारा अधिसूचना को रद्द करने की मांग करते हुए अधिवक्ता अशोक पांडे ने अपनी याचिका में तर्क दिया है कि यदि एक बार संसद या राज्य विधानमंडल के सदस्य ने संविधान के अनुच्छेद 102 और 191 के तहत अपना पद खो दिया है तो ऐसे में अदालत द्वारा उसे जब तक आरोपों से बरी नहीं किया जाता तब तक उस व्यक्ति को अयोग्य ही घोषित किया जाएगा।
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याचिका में उन्होंने कहा है कि कृपया इस मुद्दे का फैसला करें कि क्या किसी अभियुक्त की दोषसिद्धि को अपील की अदालत द्वारा रोका जा सकता है? और अगर ऐसा है तो क्या दोषसिद्धि पर रोक के आधार पर ऐसा व्यक्ति जिसे अयोग्यता का सामना करना पड़ा है, संसद के सदस्य के रूप में दोबारा योग्य हो जाएगा?   उन्होंने कहा कि फैजल ने अपनी लोकसभा सदस्यता तब खो दी थी जब उन्हें एक आपराधिक मामले में आईपीसी की धारा 307 के तहत दोषी ठहराया गया था। बाद में उन्हें इस मामले में दस साल की सजा सुनाई गई थी।  
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उन्होंने कहा कि इस याचिका को दायर करने की आवश्यकता तब पैदा हुई जब लोकसभा अध्यक्ष ने केरल के हाई कोर्ट के एक आदेश के आधार पर  सजा के आदेश पर रोक लगाते हुए मोहम्मद फैजल की संसद सदस्यता को बहाल कर दिया। 

क्या है पूरा मामला
कावरत्ती की एक अदालत ने एनसीपी सांसद मोहम्मद फैजल को हत्या के एक मामले में दोषी ठहराया था और उन्हें 10 साल की सजा सुनाई थी। जनप्रतिनिधि कानून के तहत 2 साल या उससे ज्यादा की सजा होने पर संसद सदस्य या विधानसभा सदस्य की सदस्यता रद्द हो जाती है। ऐसे में कानून के तहत मोहम्मद फैजल की संसद सदस्यता रद्द हो गई। 11 जनवरी 2023 को अदालत ने मोहम्मद फैजल को हत्या का दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई और 13 जनवरी को लोकसभा सचिवालय ने नोटिफिकेशन जारी कर उनके संसद सदस्यता के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। 

वहीं स्थानीय अदालत के फैसले के खिलाफ मोहम्मद फैजल ने केरल हाईकोर्ट में अपील दायर की, जहां से 25 जनवरी को उनकी सजा पर स्टे लग गया। इसके बाद मोहम्मद फैजल ने लोकसभा सचिवालय से अपनी संसद सदस्यता बहाल करने की मांग की थी। 

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सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : ANI

शीर्ष कोर्ट ने इको-सेंसिटिव जोन पर 2022 के आदेश में किया संशोधन 
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को संरक्षित वनों, राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास कम से कम एक किलोमीटर के इको-सेंसिटिव जोन (ईएसजेड) के भीतर विकास कार्य पर लगा पूर्ण प्रतिबंध हटा दिया है। अदालत ने पिछले साल जून में पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों के भीतर विकास या निर्माण कार्य पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। हालांकि, अब उस आदेश में संशोधन किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह संशोधन केंद्र सरकार द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए किया। इस याचिका में तर्क दिया गया था कि यदि निर्देशों को संशोधित नहीं किया गया तो ESZ में रहने वाले लाखों लोगों को भारी कठिनाई होगी। सरकार ने तर्क दिया था कि उसने 9 फरवरी, 2011 को राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभ्यारण्यों के आसपास इको-सेंसिटिव जोन (ईएसजेड) की घोषणा के लिए पहले ही दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं, जिन्हें राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड से परामर्श करने के बाद तैयार किया गया था।  

इस महीने की शुरुआत में मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा था कि वन्यजीव अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों के आसपास पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों के भीतर विकास पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। अदालत ने कहा कि वह आदेश में संशोधन करना चाहती है। कोर्ट ने कहा, "अगर इस फैसले को लागू किया जाता है, तो हर राज्य में प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) के पास स्थायी संरचनाओं के निर्माण के लिए व्यक्तिगत ग्रामीणों के अनुरोधों पर विचार करने के अलावा कोई अन्य काम नहीं बचेगा।" 

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला, इंदौर

आरोपी को स्वत: जमानत से वंचित करने के लिए जांच पूरी किए बिना आरोप पत्र दायर न करे जांच एजेंसी: सुप्रीम कोर्ट
 सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि किसी आरोपी को स्वत: जमानत से वंचित करने के लिए जांच एजेंसी को बिना जांच पूरी किए अदालत में आरोप पत्र दायर नहीं करना चाहिए। जस्टिस कृष्ण मुरारी और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने कहा, अगर कोई जांच एजेंसी जांच पूरी किए बिना चार्जशीट दाखिल करती है, तो इससे अभियुक्त के स्वत: जमानत पाने का अधिकार खत्म नहीं हो जाएगा।

शीर्ष अदालत का यह फैसला एक आपराधिक मामले के आरोपी को जमानत देते हुए आया। बता दें कि सीआरपीसी की धारा 167 के अनुसार, अगर जांच एजेंसी रिमांड की तारीख से 60 दिन के भीतर आरोप पत्र दायर नहीं करती है तो आरोपी स्वत: जमानत का हकदार होता है। कुछ श्रेणी के अपराधों के लिए, निर्धारित अवधि को 90 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है।

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छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

PMLA को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा छत्तीसगढ़ 
धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की संवैधानिक वैधता को छत्तीसगढ़ ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इसके बाद छत्तीसगढ़ ऐसा करने वाला वाला पहला राज्य बन गया। भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत इस कानून को चुनौती दी है। बता दें कि संविधान का अनुच्छेद 131 किसी राज्य को केंद्र या किसी अन्य राज्य के साथ विवाद के मामलों में सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है।

इससे पहले, निजी व्यक्तियों और पक्षों द्वारा विभिन्न आधारों पर मनी लॉन्ड्रिंग अधिनियम और इसके प्रावधानों को चुनौती दी गई थी, लेकिन कानून की वैधता को पिछले साल शीर्ष अदालत की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने बरकरार रखा था। अब पहली बार किसी राज्य सरकार द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग अधिनियम और इसके प्रावधानों को चुनौती दी गई है। 

 छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार द्वारा लाए गए मामले में कहा गया है कि राज्य सरकार को उसके अधिकारियों और राज्य के निवासियों की ओर से कई शिकायतें मिल रही हैं कि ईडी जांच की आड़ में उनके साथ यातना, गाली और मारपीट की जा रही है।

मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की पीठ को छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और अधिवक्ता सुमीर सोढ़ी ने कहा कि यह मुद्दा संवैधानिक महत्व का है और इस पर तत्काल सुनवाई की आवश्यकता है। इस पर पीठ ने कहा कि मामले की सुनवाई चार मई को होगी।

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अदालत ने सुनाया फैसला - फोटो : अमर उजाला

दुष्कर्मी पिता को बिना किसी छूट के 20 साल की सजा 
सुप्रीम कोर्ट ने नौ साल की बेटी से दुष्कर्म के दोषी एक व्यक्ति को बिना किसी छूट के 20 साल की कैद काटने का आदेश है। शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा कि उसके अय्याश और भयानक कृत्यों से रिश्ते की पवित्रता नष्ट हो गई।

एक विशेष फास्ट ट्रैक अदालत ने 2013 में व्यक्ति को दोषी ठहराया था। उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार), 377 (अप्राकृतिक अपराध) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दोषी ठहराते हुए जुर्माने के साथ 20 की न्यूनतम अवधि के आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2017 में व्यक्ति की दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा था। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दोषी ने संविधान के अनुच्छेद 136 का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अनुच्छेद 136 विशेष अनुमति याचिकाओं की अनुमति देने के लिए शीर्ष अदालत को विवेकाधीन शक्तियां प्रदान करता है।

जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने कहा कि व्यक्ति को अपनी ही बेटी के साथ सबसे ‘भयानक और भयावह’ अपराधों में से एक का दोषी पाया गया। वारदात के वक्त बहुत ही कम उम्र की थी। इस मामले में यदि वह सिर्फ 14 साल जेल में गुजारने के बाद रिहाई हासिल कर लेता है तो 20 या इसके कुछ अधिक उम्र की बेटी के जीवन में उसका फिर से दखल हो जाएगा जोकि उसे और आघात पहुंचा सकता है तथा उसके जीवन को मुश्किल बना सकता है। पीठ ने कहा कि पर्याप्त रूप से लंबी अवधि के लिए उसकी कैद न केवल यह सुनिश्चित करेगी कि उसे उसका न्यायोचित अधिकार मिले, बल्कि उसकी बेटी को अधिक समय और परिपक्वता भी मिले और वह अपने जीवन के साथ आगे बढ़े, भले ही उसके खलनायक पिता को रिहा कर दिया गया हो।

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया

SC ने गुजरात HC के आदेश को खारिज किया
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को आयुर्वेद चिकित्सकों को एलोपैथी डॉक्टरों के बराबर मानने के गुजरात उच्च न्यायालय के  आदेश को खारिज कर दिया। अपने आदेश में गुजरात उच्च न्यायालय ने कहा था कि सरकारी अस्पतालों में कार्यरत आयुर्वेद चिकित्सकों के साथ एलोपैथी डॉक्टरों के बराबर व्यवहार किया जाना चाहिए। साथ ही हाईकोर्ट ने  उन्हें समान वेतन का हकदार भी बताया था। 

शीर्ष अदालत 2012 के गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली अपीलों की एक बैच की सुनवाई कर रही थी। इसमें कहा गया था कि आयुर्वेद चिकित्सक एमबीबीएस डिग्री वाले डॉक्टरों के बराबर व्यवहार करने के हकदार हैं।

धर्म आधारित आरक्षण जारी नहीं रखने का विवेकपूर्ण फैसला किया: कर्नाटक सरकार
कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि उसने केवल धर्म के आधार पर आरक्षण जारी नहीं रखने का विवेकपूर्ण निर्णय लिया है। यह असंवैधानिक है। इसलिए मुस्लिम समुदाय के लिए चार प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान को समाप्त किया गया। राज्य सरकार ने 27 मार्च के उसके दो आदेशों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना जवाब दायर किया। याचिकाओं में अन्य पिछड़ी जातियों की 2बी श्रेणी में मुसलमानों के लिए चार प्रतिशत आरक्षण को निरस्त करने को चुनौती दी गई है। सरकार ने इस चार फीसदी को सरकारी शिक्षण संस्थानों में दाखिले और नौकरियों में वोक्कालिगा और लिंगायत समुदाय के लोगों के बीच बराबर-बराबर बांट दिया था।

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