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चिंताजनक: हिमालय क्षेत्रों में बने प्लास्टिक पहाड़, 71% रिसाइकल योग्य नहीं; मौजूदा हालात पर्यावरण के लिए घातक

Sat, 10 May 2025 04:56 AM IST
शुभम कुमार अमर उजाला नेटवर्क
अमर उजाला नेटवर्क Published by: शुभम कुमार Updated Sat, 10 May 2025 04:56 AM IST
सार

हिमालयी क्षेत्रों में प्लास्टिक कचरे का अंबार बढ़ रहा है, जिसमें 80% से ज्यादा हिस्सा सिंगल-यूज फूड और बेवरेज पैकेजिंग का है। टीएससी 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक 71% प्लास्टिक रिसाइकल नहीं हो सकता, जिससे कंपनियों का पर्यावरण जिम्मेदारी का दावा झूठा साबित होता है।

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Plastic mountains formed in Himalayan regions, 71% not recyclable News In Hindi
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Freepik

विस्तार

भारत के हिमालयी क्षेत्रों में प्लास्टिक कचरे के पहाड़ बढ़ते जा रहे हैं। ये प्लास्टिक कचरा 80 फीसदी से अधिक प्लास्टिक कचरा सिंगल-यूज फूड और बेवरेज पैकेजिंग से उत्पन्न हो रहा है। इस कचरे का लगभग 71 फीसदी हिस्सा ऐसा है, जिसे रिसाइकल नहीं किया जा सकता। 
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द हिमालयन क्लीनअप (टीएचसी) 2024 की रिपोर्ट कंपनियों के उस प्रचार को झुठलाती है, जिसमें वे खुद को पर्यावरण के लिए उत्तरदायी बताने का दावा करते हैं। अध्ययन में यह भी सामने आया कि इन क्षेत्रों में मिलने वाले कचरे में रिसाइक्लिंग योग्य प्लास्टिक जैसे पीईटी (पॉलीइथाइलीन टेरेफ्थेलेट) की हिस्सेदारी सिर्फ 18.5 फीसदी है।
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सिक्किम, दार्जिलिंग और लद्दाख जैसे पहाड़ी इलाकों में कचरे की भारी मात्रा को देखते हुए, टीएचसी की रिपोर्ट ने यह भी संकेत दिया है कि कंपनियों की ओर से रिसाइक्लिंग का प्रचार केवल एक भ्रम है क्योंकि अधिकांश प्लास्टिक कचरे को रिसाइकल नहीं किया जा सकता। जमीनी सच्चाई यह है कि उनके उत्पादों से निकला अधिकतर प्लास्टिक कचरा पर्यावरण में हमेशा के लिए रह जाता है।
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बड़े प्रदूषक ब्रांड्स
रिपोर्ट में प्रमुख प्लास्टिक प्रदूषकों में वाई-वाई, मामा और मीमी जैसे इंस्टेंट नूडल्स ब्रांड्स और मैगी हैं। स्टिंग (पेप्सिको) की खाली बोतले तीसरे स्थान पर है, जो अकेले कुल कचरे का 20.3% हिस्सा हैं। इसके अलावा, सेंटरफ्रेश (परफेटी), बिंगो (आईटीसी), लेज, कुरकुरे, फ्रूटी, एप्पी, कोका कोला, बिसलेरी जैसी कंपनियों के उत्पादों की पन्नियां और बोतलें बड़ी मात्रा में मिलीं।


मल्टी लेयर्ड प्लास्टिक पर लगे प्रतिबंध
रिपोर्ट में समाधान के लिए कई ठोस सुझाव दिए गए हैं। इनमें मल्टी लेयर्ड प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। इसके साथ ही प्रदूषणकारी कंपनियों की जवाबदेही तय की जाए। स्कूलों के पास जंक फूड और एनर्जी ड्रिंक्स की बिक्री पर रोक लगे। फ्रंट-ऑफ-पैकेज लेबलिंग को अनिवार्य किया जाए। इसके अतिरिक्त रिसाइक्लिंग से आगे बढ़कर डिजाइन आउट वेस्ट नीति लागू की जाए, जिससे उत्पाद पर्यावरण पर न्यूनतम प्रभाव डालें। पर्वतीय क्षेत्रों के लिए अलग कचरा प्रबंधन संसाधन उपलब्ध कराए जाएं।

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सेहत के लिए भी नुकसानदायक
रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमालयी क्षेत्र में बढ़ता प्लास्टिक कचरा न केवल पारिस्थितिक तंत्र के लिए गंभीर संकट पैदा कर रहा है बल्कि इससे स्थानीय समुदायों के स्वास्थ्य और जीवनशैली पर भी नकारात्मक असर पड़ रहा है। सरकार, उद्योग और समाज मिलकर इस संकट का समाधान निकालें, वरना आने वाली पीढ़ियों के लिए घातक सिद्ध होगा।
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