{"_id":"627e7a42d500803ee911e692","slug":"place-of-worship-law-supreme-court-has-increased-the-problems-of-the-center-know-everything-about-it","type":"story","status":"publish","title_hn":"उपासना स्थल कानून पर भी चलेगी तलवार!: सुप्रीम कोर्ट बढ़ा चुका है केंद्र की मुश्किलें, जानें इसके बारे में सबकुछ","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
उपासना स्थल कानून पर भी चलेगी तलवार!: सुप्रीम कोर्ट बढ़ा चुका है केंद्र की मुश्किलें, जानें इसके बारे में सबकुछ
सार
अयोध्या विवाद पर फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम 1991 को संविधान की पंथनिरपेक्षता से जोड़कर देखा था। फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी धार्मिक स्थल का विवाद इसके पहले किसी अदालत में चल रहा होगा तब भी उसके स्वरूप में परिवर्तन करना संभव नहीं होगा।
विज्ञापन
फाइल फोटो
- फोटो : सोशल मीडिया
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
देश के अलग-अलग हिस्सों में कई धार्मिक इमारतों पर विवाद हो रहा है। अयोध्या विवाद से शुरू हुआ यह मामला अब ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा, ताजमहल और कुतुबमीनार तक पहुंच चुका है। संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि इन धार्मिक स्थलों का स्वरूप बदलने में उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम 1991 सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरेगा। इस कानून में सभी धार्मिक इमारतों को उनके उसी स्वरूप में बरकरार रखने की बात कही गई है जिनमें वे 15 अगस्त 1947 के दिन थीं।
विज्ञापन
अयोध्या विवाद पर फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम 1991 को संविधान की पंथनिरपेक्षता से जोड़कर देखा था। फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी धार्मिक स्थल का विवाद इसके पहले किसी अदालत में चल रहा होगा तब भी उसके स्वरूप में परिवर्तन करना संभव नहीं होगा। माना जा रहा है कि इस कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट की बेबाक टिप्पणी के कारण अब किसी धार्मिक स्थल को किसी दूसरे धार्मिक स्थल में बदलना संभव नहीं होगा।
विज्ञापन
ऐसा केवल तभी हो सकता है जब केंद्र सरकार उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम 1991 को रद्द या संशोधित करे। तो क्या अब तथाकथित हिंदुत्ववादी केंद्र सरकार पर इस कानून को रद्द करने का दबाव बनाएंगे? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विभिन्न मंचों से केंद्र पर इसका दबाव बनाया जाने लगा है।
विज्ञापन
क्या है उपासना स्थल कानून?
केंद्र सरकार ने 1991 में संसद में एक कानून पारित किया था। इस कानून को ‘उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम 1991’ या बोलचाल की भाषा में ‘उपासना स्थल कानून’ कहा जाता है। इस कानून में कुल सात धाराएं हैं। इस पूरे कानून में तीसरी धारा सबसे महत्वपूर्ण है। इस तीसरी धारा में किसी धार्मिक स्थल के वर्तमान स्वरूप में कोई ढांचागत बदलाव करने को निषिद्ध किया गया है। कानून में सभी धार्मिक स्थलों को उसी रूप में संरक्षित करने को कहा गया है जिसमें वे ‘15 अगस्त 1947’ को यानी देश की आजादी के दिन मौजूद थे, चाहे उनका पुराना इतिहास कुछ भी क्यों न रहा हो।
यानी यदि ऐतिहासिक प्रमाणों से यह सिद्ध भी हो जाए कि किसी वर्तमान धार्मिक स्थल को इतिहास में किसी दूसरे धार्मिक स्थल को तोड़कर बनाया गया था, तो भी उसके वर्तमान स्वरूप को बदला नहीं जा सकता। केंद्र को ऐसे धार्मिक स्थलों को उनके वर्तमान स्वरूप में संरक्षित करने की जिम्मेदारी दी गई है। हालांकि, इस कानून में धारा पांच के द्वारा अयोध्या विवाद को अपवाद के तौर पर अलग रखा गया था।
यहां यह स्पष्ट होना चाहिए कि किसी धर्म के स्थल को किसी दूसरे धर्म के पवित्र धार्मिक स्थल में न बदलने का नियम उसी धर्म के किसी दूसरे पंथ पर भी लागू होता है। यानी यदि कोई धार्मिक स्थल वर्तमान समय में हिंदू धर्म का है, तो उसे हिंदुओं के ही किसी दूसरे पंथ (जैसे आर्यों) के मंदिर में नहीं बदला जा सकता। इसी प्रकार किसी शिया धर्म के धार्मिक स्थल (इमामबाड़ा) को मुसलमानों के ही दूसरे वर्ग सुन्नी या अहमदिया जैसे पंथों के धार्मिक स्थलों में नहीं बदला जा सकता।
इसमें ऐसे धार्मिक स्थल या इमारतें भी शामिल की गई हैं जिनका पूजा-पाठ के लिए इस्तेमाल नहीं होता लेकिन वे किसी धर्म विशेष से जोड़कर देखी जाती हैं और पुरातात्विक महत्व की हैं। इस वर्ग में कुतुबमीनार को रखा जा सकता है। इस कानून का उल्लंघन करने पर इसी कानून की धारा 6 में दोषियों को तीन साल का कारावास और अर्थदंड देने का प्रावधान भी किया गया है।
कांग्रेस ने निभाया था चुनावी वादा
दरअसल, 1991 में दसवीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में वादा किया था कि यदि केंद्र में उसकी सरकार बनती है तो वह संसद से ऐसा कानून पारित करेगी जिससे सभी वर्तमान धार्मिक स्थलों को उसके वर्तमान स्वरूप में संरक्षित किया जाएगा। चूंकि उस समय अयोध्या का राममंदिर आंदोलन अपने चरम पर था, भाजपा इस मुद्दे को जोरशोर से उछाल रही थी और उसके नेता लालकृष्ण आडवाणी रथयात्रा निकालकर पूरे देश में धार्मिक भावनाएं चरम पर ला चुके थे, देश के मुसलमान समुदाय में इस प्रस्तावित कानून को लेकर खासा उत्साह था।
दुर्भाग्य से इसी चुनाव के प्रचार में राजीव गांधी की तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में 21 मई 1991 को हत्या हो गई। लेकिन चुनाव के बाद कांग्रेस की सरकार बनी और परिस्थितियों ने पीवी नरसिंहा राव को भारत का प्रधानमंत्री बना दिया। नरसिंहा राव सरकार में गृहमंत्री शंकरराव चह्वाण ने संसद में बहस के दौरान इस कानून को भारत की धर्मनिरपेक्षता के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण बताया था।
सुप्रीम कोर्ट की अड़चन
अयोध्या विवाद पर फैसला देते हुए पांच सदस्यों की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने जो टिप्पणी की थी, वह बेहद गंभीर है। उस फैसले के आलोक में किसी धार्मिक स्थल को किसी दूसरे धर्म के लोगों को सौंपना बेहद कठिन होगा। चूंकि, सर्वोच्च न्यायालय का फैसला निचली अदालतों पर बाध्यकारी होता है, माना जाता है कि इनसे परे जाकर कोई फैसला देना भी किसी कोर्ट के लिए संभव नहीं होगा।
अयोध्या मामले में फैसला देते हुए पीठ ने उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम 1991 का प्रमुखता के साथ उल्लेख किया है। पीठ ने इस कानून को संविधान की प्रस्तावना में दी गई पंथनिरपेक्षता के साथ जोड़ा है और कहा है कि यह कानून संविधान की पंथनिरपेक्षता की भावना को आगे बढ़ाने वाला है, और यह इस भावना को पूर्णता प्रदान करता है। सर्वोच्य न्यायालय ने कहा है कि देश की पंथनिरपेक्षता कायम ऱखना केवल राज्य का दायित्व नहीं है, बल्कि यह आम जनता का कर्तव्य भी है। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को देखते हुए किसी नए विवाद को इससे परे देखना मुश्किल होगा।
क्या नए विवाद पर लागू होगा कानून?
- अयोध्या विवाद पर फैसला देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति डीवी शर्मा ने कहा था कि इस कानून के लागू होने से पूर्व यदि कोई मामला पहले से ही किसी अदालत में विचाराधीन हो तो यह कानून उस पर लागू नहीं होगा। लेकिन अयोध्या विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपना निर्णय देते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि यदि कोई वाद पहले से भी चल रहा होगा तो भी यह कानून उस पर लागू होगा और इस संदर्भ में चल रहे सभी विवाद निरस्त माने जाएंगे।
- यानी यदि इस कानून के आने के पहले से कोई मामला अदालत में विचाराधीन होगा तो भी उस धार्मिक स्थल को बदला नहीं जा सकता। कानूनविद मानते हैं कि अयोध्या विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के कारण अब किसी नए धार्मिक स्थल पर विवाद खड़ा कर उसे किसी दूसरे धर्म के लोगों को सौंपना संभव नहीं होगा।